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पुनर्नवा (साटी) Punarnava

पुनर्नवा (साटी) Punarnava
पुनर्नवा ये साधारण सा खरपतवार किडनी को पुनर्जीवन देने के लिए अकेला ही काफी है.

punarnava chronic renal failure, chronic kidney diseases, nephrotic syndrome, urinary tract infection अर्थात kidney की बड़ी से बड़ी बीमारी को अकेले ठीक करने की योग्यता रखती है।
पुनर्नवा का बोटैनिकल नाम BOERHAHAVIA DIFFUSSA है। अंग्रेज़ी में इसे HOG WEED भी कहते है। यह NYCTAGINACEAE FAMILY से आता है। पुनर्नवा के पुरे पोधे में ही औषधीय गुण होते हैं। विशेषकर इसकी जड़ों और पत्तियों में औषधीय गुण काफी मात्र में गुण पाए जाते हैं। खेतों में पैदा होने वाले या अक्सर ही किसी भूमि पर अपने आप उग जाने वाले इस खरपतवार के गुण देख कर आप वाकई हैरान हो जायेंगे। हम आज आपको एक ऐसा ही इसका प्रयोग बताने जा रहें हैं, जिसको करने से किडनी के समस्त रोग सही हो सकता है, यहाँ तक के जिन रोगियों का डायलिसिस चल रहा है, वो भी अपने रोग से मुक्ति पा सकते हैं। अगर यूँ कहें के ये किडनी के समस्त रोगों के लिए रामबाण हैं तो ये गलत नहीं होगा।

आज ओनली आयुर्वेद में श्री बलबीर सिंह जी (Pharmacologist) आपको बता रहें है के ऐसा क्या कारण हैं के ये साधारण सा दिखने वाला पौधा क्यों इतना उपयोगी है। सबसे पहले जानेंगे के पुनर्नवा में क्या रासायनिक संगठन हैं, जिस कारण से ये पौधा किडनी के रोगियों के लिए अमृत समान है।

पुनर्नवा की पहचान और अन्य भाषाओँ में नाम.
वानस्पतिक नाम–Boerhavia Diffusa Linn

संस्कृत–पुनर्नवा, शोथघ्नी, विशाख, श्वेतमूला, दिर्घपत्रिका, कठिल्ल्क,, शशिवाटिका, चिराटका

हिंदी—लाल पुनर्नवा, सांठ, गदहपूरना,

उर्दू–बाषखीरा

कन्नड़–सनाडीका Sanadika

गुजरती–राती साटोडी (Rati Satodi), Vasedo (वसेड़ो)

तमिल – mukurattei, Mukaratte

Telugu–Atianamidi

Bangali–Punarnoba, sveta punarnaba

nepali–onle sag

punjabi–khattan

marathi–punarnava, ghentuli

malyalam–Thazuthama, Tavilama

English–Erect Boerhavia, Spiderling, Spreading hog weed, Horse Purslane, Pigweed,

Arbi–Handakuki, Sabaka

Farsi–Devasapat

पुनर्नवा में पाए जाने वाले मुख्य रसायन:–
PUNARNAVOSIDE, PUNARNAVINE नामक ALKALOID पाए जाते हैं। LIRIODENDRIN नामक lignans पुनर्नवा की जड़ में पाए जाते हैं। Potasium nitrate, ursolic acid, rotenoid भी पुनर्नवा में पाए जाते है। Only Ayurved इसके अतिरिक्त पुनर्नवा के धरती के उपरी हिस्से   में 15 amino acid पाए जाते हैं। जिनमें 6 आवश्यक एमिनो अम्ल हैं, जो हमारे शरीर में नहीं बनते हमें बाहर से भोजन के रूप में लेने पड़ते हैं। पुनर्नवा के जड़ में 14 एमिनो अम्ल पाए जाते है, जिनमें 7 आवश्यक एमिनो अम्ल हैं। जो हमारे शरीर में नहीं बनते और इनको हमें बाहर से ही लेना पड़ता है।

पुनर्नवा के kidney रोगों में लाभ: पुनर्नवा chronic renal failure, chronic kidney diseases, nephrotic syndrome, urinary tract infection अर्थात kidney की बड़ी से बड़ी बीमारी को अकेले ठीक करने की क्षमता रखता है।

पुनर्नवा में मौजूद  punarnavoside जो कि एक alkaloid है, एक बहुत अच्छा diuretic है। Diuretic एक तरह का रसायन होता है जो urine की मात्रा को बढाता है, जिससे urine खुलकर आ जाता है और शरीर में किडनी के बीमारी होने से पैदा होने वाली सूजन (जिसको edema कहा जाता है) कम हो जाती है इसके साथ ही punarnavoside एक बहुत अच्छा antibacterial, anti-inflamatory और antispasmodic antifibronolytic है।

अभी आइये जानते हैं, ऊपर बताये गए Effect की व्याख्या और फायदे।
antibacterial effect–bacterial infection को रोकता है।

anti-inflammatory effect-सुजन को कम करता है जो इन्फेक्शन से हो जाती है।

antispasmodic effect-यह खिचाव को कम करता है, जिससे दर्द कम होता है।

antifibronolytic effect-यह urine में आने वाले blood  को रोकता है जो कि urinary tract इन्फेक्शन में अक्सर हो जाता है। इसे haematuria कहते हैं। जिसमें RBC urine में आना शुरू हो जाते है।

जो कि urinary tract infection मुख्यत: बार—बार होने वाले uti में काफी लाभकारी है। Only Ayurved इसमें मौजूद पोटैशियम नाइट्रेट भी diuretic का काम करता है। जो मूत्र को शरीर से बाहर निकालता है।जिससे kidney failure के मुख्य लक्षण edema में आराम मिलता है।

गर्भावस्था में होने वाले urinary tract इन्फेक्शन में भी पुनर्नवा बहुत उपयोगी है।

Nephrotic sndrome Treatment in Ayurved
यह एक प्रकार की kidney की समस्या होती है। जिसमें शरीर से प्रोटीन urine के माध्यम से बाहर निकलना शुरू हो जाता है और शरीर पर सूजन आ जाती है। kidney का फिल्ट्रेशन system ख़राब हो जाता है। इस समय पुनर्नवा का उपयोग किसी संजीवनी से कम नही है, क्योकि इसमें मोजूद एमिनो अम्ल शरीर में हुए प्रोटीन कि कमी को पूरी करते है तथा urine में होने वाले protein lose को भी कम करते है और kidney dysfunction से होने वाली सूजन जिसे edema कहते है को भी कम करता है।

Kidney Failure Treatment In Ayurved: पुनर्नवा chronic renal failure, chronic kidney diseases, urinary tract infection अर्थात kidney की बड़ी से बड़ी बीमारी को अपने अन्दर पाए जाने वाले विशेष रसायनों की वजह से अकेले ही ठीक करने की क्षमता रखता है।

Dialysis prevention In Ayurveda: पुनर्नवा urine output को काफी बढ़ा देता है, जिससे वो रोगी जो पेशाब ना उतरने की वजह से dialysis करवाते हैं, उनको इसकी  जरुरत भी नहीं पड़ती है।

Prevent Kidney Transplant In Ayurved: अगर आपको डॉक्टर ने किडनी ट्रांसप्लांट करवाने के लिए कह भी दिया हो, तो आप रोजाना इस पुरे पौधे का जड़ समेत रस निकाल कर सुबह शाम पियें। 50 – 50 मि.ली. एक से 6 महीने तक लें, ये अवधि रोगी के रोग की स्थिति के अनुसार कम या बढ़ सकती है और वो इसको अपनी चल रही दवाई के साथ निसंकोच ले सकता है।

control blood presure For Kidney Patient: Nephrotic syndrome, chronic renal failure ओर chronic kidney disease में blood presssure बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, पुनर्नावा में पाए जाने वाला lignane  LIRIODENDRIN एक प्राकर्तिक calcium channel blocker है जोकि blood vessel को relax रखता है जिससे blood pressure नार्मल हो जाता है. Diuretic होने के कारण पुनर्नवा मूत्र की अधिक मात्रा किडनी से निकलता है। इसलिए Blood pressure संतुलित रखता है। यह एलॉपथी में बी पी को कम करने के लिए दी जाने वाली Calcium Channel Blocker–Nifedipine की तरह काम करती है। जो के मुख्यतः किडनी रोगी को Renal Failure के केस में दी जाती है।

कैसे करें सेवन: इसको सुबह खाली पेट इसके पूरे पौधे का स्वरस निकाल कर 50 मिली सुबह और 50 मिली शाम को दीजिये। यह रोगी के रोग के अनुसार 1 से 6 महीने तक दीजिये।

स्वरस निकालने की विधि: किसी भी पौधे का स्वरस निकालने के लिए पहले उसको अच्छे से साफ़ कर लो, उसके बाद में पौधे को अच्छे से पत्थर पर कूट कर इसको चटनी जैसा बना लो, और फिर इसको किसी सूती कपडे से छान लीजिये। या फिर ऐसा करें, घर में मिक्सर ग्राइंडर में अच्छे से थोडा पानी मिला कर ग्राइंड कर लो और फिर इसको किसी सूती कपडे से छान लो और यह ही रोगी को दीजिये।

दोस्तों यह पोस्ट आपको कैसी लगी, हमको ज़रूर बताएं, और जो लोग इस प्रयोग को करें वो अपना रिजल्ट हमसे ज़रूर शेयर करें। धन्यवाद.
http://onlyayurved.com/major-disease/kidney/nephrotic-syndrome/kidney-ke-liye-punarnava-ka-prayog/
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बडी आसानी से मील जाने वाली यह वनस्पती (पुनर्नवा) के गुणों के बारे मे सुन यकीन मानिऐ आप हैरान हो जाऐगे ।

पुनर्नवा का संस्कृत पर्याय 'शोथघ्नी' (सूजन को हरने वाली) है। पुनर्नवा (साटी) या विषखपरा के नाम से विख्यात यह वनस्पति वर्षा ऋतु में बहुतायत से पायी जाती है। शरीर की आँतरिक एवं बाह्य सूजन को दूर करने के लिए यह अत्यंत उपयोगी है।

यह तीन प्रकार की होती हैः सफेद, लाल, एवं काली। काली पुनर्नवा प्रायः देखने में भी नहीं आती, सफेद ही देखने में आती है। काली प्रजाति बहुत कम स्थलों पर पायी जाती है। जैसे तांदूल तथा पालक की भाजी बनाते हैं, वैसे ही पुनर्नवा की सब्जी बनाकर खायी जाती है। इसकी सब्जी शोथ (सूजन) की नाशक, मूत्रल तथा स्वास्थ्यवर्धक है।

पुनर्नवा कड़वी, उष्ण, तीखी, कसैली, रूच्य, अग्निदीपक, रुक्ष, मधुर, खारी, सारक, मूत्रल एवं हृदय के लिए लाभदायक है। यह वायु, कफ, सूजन, खाँसी, बवासीर, व्रण, पांडुरोग, विषदोष एवं शूल का नाश करती है।

पुनर्नवा में से पुनर्नवादि क्वाथ, पुनर्नवा मंडूर, पुनर्नवामूल धनवटी, पुनर्नवाचूर्ण आदि औषधियाँ बनती हैं।
बड़ी पुनर्नवा को साटोड़ी (वर्षाभू) कहा जाता है। उसके गुण भी पुनर्नवा के जैसे ही हैं।
-------------------------औषधि-प्रयोगः------------------------
  1. नेत्रों की फूलीः पुनर्नवा की जड़ को घी में घिसकर आँखों में आँजें।
  2. नेत्रों की खुजलीः पुनर्नवा की जड़ को शहद अथवा दूध में घिसकर आँजने से लाभ होता है।
  3. नेत्रों से पानी गिरनाः पुनर्नवा की जड़ को शहद में घिसकर आँखों में आँजने से लाभ होता है।
  4. रतौंधीः पुनर्नवा की जड़ को काँजी में घिसकर आँखों में आँजें।
  5. खूनी बवासीरः पुनर्नवा की जड़ को हल्दी के काढ़े में देने से लाभ होता है।
  6. पीलियाः पुनर्नवा के पंचांग (जड़, छाल, पत्ती, फूल और बीज) को शहद एवं मिश्री के साथ लें अथवा उसका रस या काढ़ा पियें।
  7. मस्तक रोग व ज्वर रोगः पुनर्नवा के पंचांग का 2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम घी एवं 20 ग्राम शहद में सुबह-शाम देने से लाभ होता है।
  8. जलोदरः पुनर्नवा की जड़ के चूर्ण को शहद के साथ खायें।
  9. सूजनः पुनर्नवा की जड़ का काढ़ा पिलाने एवं सूजन पर लेप करने से लाभ होता है।
  10. पथरीः पुनर्नवामूल को दूध में उबालकर सुबह-शाम पियें।

  11. -----------------------------------विष------------------------------

  1. चूहे का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 2-2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम शहद के साथ दिन में 2 बार दें।
  2. पागल कुत्ते का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 25 से 50 ग्राम रस, 20 ग्राम घी में मिलाकर रोज पियें।
  3. विद्राधि (फोड़ा) : पुनर्नवा के मूल का काढ़ा पीने से कच्चा अथवा पका हुआ फोड़ा भी मिट जाता है।
  4. अनिद्राः पुनर्नवा के मूल का क्वाथ 100-100 मि.ली. दिन में 2 बार पीने से निद्रा अच्छी आती है।
  5. संधिवातः पुनर्नवा के पत्तों की भाजी सोंठ डालकर खायें।
  6. वातकंटकः वायुप्रकोप से पैर की एड़ी में वेदना होती हो तो पुनर्नवा में सिद्ध किया हुआ तेल पैर की एड़ी पर पिसें एवं सेंक करें।
  7. योनिशूलः पुनर्नवा के हरे पत्तों को पीसकर बनायी गयी उँगली जैसे आकार की सोगटी को योनि में धारण करने से भयंकर योनिशूल भी मिटता है।
  8. विलंबित प्रसव-मूढ़गर्भः पुनर्नवा के मूल के रस में थोड़ा तिल का तेल मिलाकर योनि में लगायें। इससे रुका हुआ बच्चा तुरंत बाहर आ जाता है।
  9. गैसः 2 ग्राम पुनर्नवा के मूल का चूर्ण, आधा ग्राम हींग तथा 1 ग्राम काला नमक गर्म पानी से लें।
  10. स्थूलता-मेदवृद्धिः पुनर्नवा के 5 ग्राम चूर्ण में 10 ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम लें। पुनर्नवा की सब्जी बना कर खायें।
  11. मूत्रावरोधः पुनर्नवा का 40 मि.ली. रस अथवा उतना ही काढ़ा पियें। पुनर्नवा के पान बाफकर पेड़ू पर बाँधें। 1 ग्राम पुनर्नवाक्षार (आयुर्वेदिक औषधियों की दुकान से मिलेगा) गरम पानी के साथ पीने से तुरंत फायदा होता है।
  12. खूनी बवासीरः पुनर्नवा के मूल को पीसकर फीकी छाछ (200 मि.ली.) या बकरी के दूध (200 मि.ली.) के साथ पियें।
  13. पेट के रोगः गोमूत्र एवं पुनर्नवा का रस समान मात्रा में मिलाकर पियें।
  14. श्लीपद (हाथीरोग) : 50 मि.ली. पुनर्नवा का रस और उतना ही गोमूत्र मिलाकर सुबह शाम पियें।
  15. वृषण शोथः पुनर्नवा का मूल दूध में घिसकर लेप करने से वृषण की सूजन मिटती है। यह हाड्रोसील में भी फायदेमंद है।
  16. हृदयरोगः हृदयरोग के कारण सर्वांगसूजन हो गयी हो तो पुनर्नवा के मूल का 10 ग्राम चूर्ण और अर्जुन की छाल का 10 ग्राम चूर्ण 200 मि.ली. पानी में काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पियें।
  17. श्वास (दमा) : 10 ग्राम भारंगमूल चूर्ण और 10 ग्राम पुनर्नवा चूर्ण को 200 मि.ली. पानी में उबालकर काढ़ा बनायें। जब 50 मि.ली. बचे तब उसमें आधा ग्राम श्रृंगभस्म डालकर सुबह-शाम पियें।
  18. रसायन प्रयोगः हमेशा उत्तम स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए रोज सुबह पुनर्नवा के मूल का या पत्ते का 2 चम्मच (10 मि.ली.) रस पियें अथवा पुनर्नवा के मूल का चूर्ण 2 से 4 ग्राम की मात्रा में दूध या पानी से लें या सप्ताह में 2 दिन पुनर्नवा की सब्जी बनाकर खायें।
पुनर्नवा में मूँग व चने की छिलकेवाली दाल मिलाकर इसकी बढ़िया सब्जी बनती है। ऊपर वर्णित तमाम प्रकार के रोग हों ही नहीं, स्वास्थ्य बना रहे इसलिए इसकी सब्जी या ताजे पत्तों का रस काली मिर्च व शहद मिलाकर पीना हितकर है। बीमार तो क्या स्वस्थ व्यक्ति भी अपना स्वास्थ्य अच्छा रखने के लिए इसकी सब्जी खा सकते हैं। भारत में यह सर्वत्र पायी जाती है। संत श्री आसारामजी आश्रम (दिल्ली, अमदावाद, सूरत आदि) में पुनर्नवा का नमूना देखा जा सकता है। आपके इलाकों में भी यह पर्याप्त मात्रा में होती होगी।.
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स्रोत : https://desinushkhe.blogspot.in/2013/06/punarnava.html
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पुनर्नवा (NYETAGINACEASE) SPEREADING HOGWEED, BOETHAAVIA DIFFUSA

परिचय : पुनर्नवा का अभिप्राय है यह है कि जो रसायन व रक्तवर्धक होने से शरीर को फिर से नया जैसा बना दे, उसे पुनर्ववा कहते हैं। पुनर्नवा का सूखा पौधा बारिश के मौसम में नया जीवन पाकर फूलने-फलने लगता है। पुनर्नवा पूरे भारत में खासकर गर्म प्रदेशों में बहुतायत से प्राप्त होता है। हर साल बारिश के मौसम में नए पौधे निकलना और गर्मी के मौसम में सूख जाना इसकी खासियत होती है। पुनर्नवा की 2 प्रकार की जातियां लाल और सफेद पाई जाती हैं। इनमें रक्त (खून) जाति वनस्पति का प्रयोग अधिकता से औषधि के रूप में किया जाता है। पुनर्नवा का कांड (तना), पत्ते, फूल सभी रक्त (खून या लाल) रंग के होते हैं। फलों के पक जाने पर वायवीय भाग सूख जाता है। परंतु भूमि में पड़ी रहती है, जो बारिश के मौसम में फिर से उग आती है।

स्वाद : सफेद पुनर्नवा का रस पीने में मधुर (मीठा), तीखा और कषैला होता है।

स्वरूप : पुनर्नवा एक लेटी हुई छत्ताकार जड़ होती है, यह बारिश के मौसम में पैदा होकर बढ़ती है और हेमन्त ऋतु के तुषार से सूख जाती है। श्वेत सांठ के पत्ते, डंठल सफेद तथा लाल होते हैं। रक्त (लाल) के लाल होते हैं। लाल पुनर्नवा के पत्ते श्वेत की अपेक्षा चक्राकार न होकर कुछ लंबे होते हैं पुनर्नवा गांवों में सब्जी के काम में लाई जाती है। पुनर्नवा का पौधा 3 से 6 फुट ऊंचा होता है, जिसका तना लाल रंग लिए कड़ा पतला और गोल होता हैं। इसके जड़ों पर तना कुछ मोटा होता है। पुनर्नवा की शाखाएं अनेक और पत्ते छोटे, बड़े 2 तरह के होते हैं। पुनर्नवा के पत्ते कोमल, मांसल, गोल या अंडाकार और निचला तला सफेद होता है। इसमें पुष्प (फूल) सफेद या गुलाबी छोटे-छोटे, छतरीनुमा लगते हैं। फल आधा इंच के छोटे, चिपचिपे बीजों से युक्त तथा पांच धारियों वाले होते हैं। पुनर्नवा के फूलों और फलों की बहार सर्दी के मौसम में आती है। इसकी जड़ 1 फुट लंबी, उंगली जितनी मोटी, गूदेदार, 2 से 3 शाखाओं से युक्त, तेजगंध वाली तथा स्वाद में तीखी होती है। इसे तोड़ने पर इसमें से दूध बहने लगता है। औषधि प्रयोग के लिए इसकी जड़ और पत्ते काम में आते हैं।

स्वभाव : पुनर्नवा खाने में ठंडी, सूखी और हल्की होती है।

गुण : श्वेत पुनर्नवा भारी, वातकारक और पाचनशक्तिवर्द्धक है। यह पीलिया, पेट के रोग, खून के विकार, सूजन, सूजाक (गिनोरिया), मूत्राल्पता (पेशाब का कम आना), बुखार तथा मोटापा आदि विकारों को नष्ट करती है। पुनर्नवा का प्रयोग जलोदर (पेट में पानी का भरना), मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में परेशानी या जलन), घाव की सूजन, श्वास (दमा), हृदय (दिल) रोग, बेरी-बेरी, यकृत (जिगर) रोग, खांसी, विष (जहर) के दुष्प्रभाव को दूर करता है। यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार पुनर्नवा दूसरे दर्जे की गर्म और रूक्ष होती है। यह गुर्दे के कार्यो में वृद्वि करके पेशाब की मात्रा बढ़ाती है, खून साफ करती है, सूजन दूर करती है, भूख को बढ़ाती है और हृदय के रोगों को दूर करती है। इसके साथ ही यह बलवर्द्धक, खून में वृद्धि करने वाला, पेट साफ करने वाला, खांसी और मोटापा को कम करने वाला होता है।
मात्रा : पुनर्नवा के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर, जड़ का चूर्ण 3 से 5 ग्राम, बीजों का चूर्ण 1 से 3 ग्राम, पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) चूर्ण 5 से 10 ग्राम।
स्रोत : http://naturethehealth.blogspot.in/2012/10/nyetaginacease-spereading-hogweed.html
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रांची के सड़कों के किनारे पनप रहा है पुनर्नवा का पौधा

किडनी के मरीजों में होता है इसका (पुनर्नवा) उपयोग
द्वारा : 
नितीश प्रियदर्शी
रांची के सड़कों के किनारे इस समय औषधीय पोधौं का राजा पुनर्नवा कुछ कुछ स्थानों पर पाया जा रहा है 1 अगर जानकारों की माने तो इस पौधे का इस्तेमाल उन मरीजों पर ज्यादा किया जाता है जो गुर्दे (किडनी) की बीमारी से ग्रसित हैं1 रांची की मिट्टी, चट्टानें एवं जलवायु इस पौधे के लिये काफी उपयूक्त हैं 1 बहुत सारी निजी संस्थाएँ इन पौधों को औषधि के रूप में ऊँचे दामों पर बेचती हैं1 रांची में ये खासकर करमटोली , मोरहाबादी आदि स्थानों में लेखक को ये पौधा दिखा है1

पुनर्नवा पूरे भारत में खासकर गर्म प्रदेशों में बहुतायत से प्राप्त होता है। हर साल बारिश के मौसम में नए पौधे निकलना और गर्मी के मौसम में सूख जाना इसकी खासियत होती है।

पुनर्नवा एक आयुर्वेदिक औषधि है। इस विशेषणात्मक उक्ति की पृष्ठभूमि पूर्णतः वैज्ञानिक है। पुनर्नवा का पौधा जब सूख जाता है तो वर्षा ऋतु आने पर इन से शाखाएँ पुनः फूट पड़ती हैं और पौधा अपनी मृत जीर्ण-शीर्णावस्था से दुबारा नया जीवन प्राप्त कर लेता है । इस विलक्षणता के कारण ही इसे ऋषिगणों ने पुनर्नवा नाम दिया है । इसे शोथहीन व गदहपूरना भी कहते हैं । पुनर्नवा के नामों के संबंध में भारी मतभेद रहा है। भारत के भिन्न-भिन्न भागों में तीन अलग-अलग प्रकार के पौधे पुनर्नवा नाम से जाने जाते हैं । ये हैं-बोअरहेविया डिफ्यूजा, इरेक्टा तथा रीपेण्डा । आय.सी.एम.आर. के वैज्ञानिकों ने वानस्पतिकी के क्षेत्र में शोधकर 'मेडीसिनल प्लाण्ट्स ऑफ इण्डिया' नामक ग्रंथ में इस विषय पर लिखकर काफी कुछ भ्रम को मिटाया है । उनके अनुसार बोअरहेविया डिफ्यूजा जिसके पुष्प श्वेत होते हैं औषधीय पौधे की श्रेणी में आते हैं। पुनर्नवा खाने में ठंडी, सूखी और हल्की होती है।
रक्त पुनर्नवा एक सामान्य पायी जाने वाली घास है जो सर्वत्र सड़कों के किनारे उगी फैली हुई मिलती है । श्वेत पुनर्नवा रक्त वाली प्रजाति से बहुत कम सुलभ है इसलिए श्वेत औषधीय प्रजाति में रक्त पुनर्नवा की अक्सर मिलावट कर दी जाती है ।

इस औषधि का मुख्य औषधीय घटक एक प्रकार का एल्केलायड है, जिसे पुनर्नवा कहा गया है । इसकी मात्रा जड़ में लगभग 0.04 प्रतिशत होती है । अन्य एल्केलायड्स की मात्रा लगभग 6.5 प्रतिशत होती है । पुनर्नवा के जल में न घुल पाने वाले भाग में स्टेरॉन पाए गए हैं, जिनमें बीटा-साइटोस्टीराल और एल्फा-टू साईटोस्टीराल प्रमुख है । इसके निष्कर्ष में एक ओषजन युक्त पदार्थ ऐसेण्टाइन भी मिला है । इसके अतिरिक्त कुछ महत्त्वपूर्ण् कार्बनिक अम्ल तथा लवण भी पाए जाते हैं । अम्लों में स्टायरिक तथा पामिटिक अम्ल एवं लवणों में पोटेशियम नाइट्रेट, सोडियम सल्फेट एवं क्लोराइड प्रमुख हैं । इन्हीं के कारण सूक्ष्म स्तर पर कार्य करने की सामर्थ्य बढ़ती है।

जानकारों के अनुसार, यह पीलिया, पेट के रोग, खून के विकार, सूजन, सूजाक (गिनोरिया), मूत्राल्पता (पेशाब का कम आना), बुखार तथा मोटापा आदि विकारों को नष्ट करती है। पुनर्नवा का प्रयोग जलोदर (पेट में पानी का भरना), मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में परेशानी या जलन), घाव की सूजन, श्वास (दमा), हृदय (दिल) रोग, बेरी-बेरी, यकृत (जिगर) रोग, खांसी, विष (जहर) के दुष्प्रभाव को दूर करता है।

आज भी बहुत कम लोग इस पौधे की चमत्कारी गुणों को जानते हैं. लेखक ने जब इस पौधे की तस्वीर उतरने की कोशिश की तो कई लोग कोतुहल वश इसकी जानकारी चाही. हो सकता है ये आपके घरों के आसपास ही हो और आपको इसकी जानकारी न हो 1 अगर आप इनको पहचान लेते हैं तो इसे बचाने की कोशिश करें ताकि अगले वर्ष बरसात में फिर से उग जाएँ 1 झारखण्ड में वैसे भी औषधीय पौधों का भंडार है जिनकी विस्तृत जानकारी और संगरक्षण जरुरी है.
स्रोत : http://nitishpriyadarshi.blogspot.in/2011/07/1.html
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Monday, June 8, 2015
पथरी का पौधा की सब्जी खाना प्रारम्भ कर दे तब पथरी गल कर बह जाती है |
गिरिजा शंकर शुक्ल : मित्रों यह पथरी है,इसे पहचान लें | पथरी नाम इस लिये नहीं है कि यह पथरी बनाता है वरन इस लिये है कि यह पथरी समाप्त करता है | आज इसके गुणों पर बात करते हैं | यह आजकल गर्मियों में बहुतायत पाया जाता है | वैसे इसे पथरी,पत्थरचूर,(यहां कुछ लोग इसे भी पत्थरट्टा ही कहते हैं) व गदपूरना भी कहते हैं |
1- यदि किसी भाई को पथरी हो जाय तब वह यदि इसकी सब्जी खाना प्रारम्भ कर दे तब उसकी पथरी गल कर बह जाती है |
2- यदि किसी के कोई फोड़ा या बालतोड़ हो जाय तब चिकित्सक के पास जाने पर वह सूमैग दवा की पट्टी बांधता है (पट्टी करने का व्यय लगभग दस रूपये मान लें) जो कभी-कभी दो दिन में पकाती है | तब चीरा लगाता है व सुखाने की दवा बांधता है | यह तो लगभग प्रत्येक भाई-बहन अनुभव किये होंगे | अब यदि कभी फोड़ा फुंसी हो जाय तब यह प्रयोग कीजिये,विधि है- पथरी का पौधा लाकर धो लें व सूखी-सूखी चटनी की तरह पीस लें | फिर सोते समय उस फोड़े पर एक लेप की तरह चिपका दें | यदि अधिक जल्द असर चाहिये तब उस चटनी में थोड़ा नमक मिला लें व सेंक लें | फिर उस फोड़े पर लेप लगा दें | यह लेप तीन तरह से काम करता है ! 
  •  क) यदि वह फोड़ा दबने योग्य होगा तब उसे रात भर में दबाकर गायब कर देगा | 
  •  ख) यदि वह पकाने योग्य होगा तब रातभर में पकाकर बहा देगा | 
  • ग) यदि इस रात नहीं बहा तब,पुनः लगाने पर उसे पूर्णरूपेण पकाकर मुंह बनाकर पूरी तरह मवाद आदि को निकाल देगा | इस प्रकार आप डाक्टरों के चक्कर, व्यर्थ धन व्यय, चीरा, दर्द व शारीरिक कष्ट से बच जाते हैं |
3- इसमें पुनर्नवीन तत्व होता है जो पुनर्नवा की भांति गुणकारी बना देता है इस वनस्पति को | यह लिवर आदि को भी संभवतः मजबूत करता है| इसे लंगूर प्रिय मन से खाते हैं| विशेषतः इसकी सब्जी खाने से पतली दस्त होकर पेट साफ हो जाता है | अतः विशेष परिस्थितियों में ही खायें, परन्तु फोडये आदि के लिये स्वानुभूत रामबाण प्रयोग है |
संस्कृत पुनर्नवा? : यह पुनर्नवा का दूसरा रूप है,पुनर्नवीन इसमें भी होता है | इसमें व पुनरनवा में मुख्य अंतर यह है कि पुनर्नवा शुष्क रूखा व पथरी मांशल व लिसलिसा होता है | यह जमीन पर फैलता है व पुनर्नवा झाड़ियों पर भी चढ़ जाता है |
स्रोत : http://indiahonest.blogspot.in/2015/06/blog-post_14.html
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पुनर्नवा
पुनर्नवा एक ऐसी वनस्पति है, जो हर वर्ष नवीन हो जाती है, इसलिए इसे पुनर्नवा नाम दिया गया है।

सेवन करने वाले के शरीर को यह रसायन और नया कर देता है, इसलिए भी इसका नाम पुनर्नवा सार्थक सिद्ध होता है। 

विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- पुनर्नवा। हिन्दी- सफेद पुनर्नवा, विषखपरा, गदपूरना। मराठी- घेंटूली। गुजराती- साटोडी। बंगला-श्वेत पुनर्नवा, गदापुण्या। तेलुगू- गाल्जेरू। कन्नड़-मुच्चुकोनि। तमिल- मुकरत्तेकिरे, शरून्नै। फारसी- दब्ब अस्पत। इंग्लिश- स्प्रेडिंग हागवीड। लैटिन- ट्रायेंथिमा पोर्टयूलेकस्ट्रम।

गुण : श्वेत पुनर्नवा चरपरी, कसैली, अत्यन्त आग्निप्रदीपक और पाण्डु रोग, सूजन, वायु, विष, कफ और उदर रोग नाशक है।

रासायनिक संघटन : इसमें पुनर्नवीन नामक एक किंचित तिक्त क्षाराभ (0.04 प्रतिशत) और पोटेशियम नाइट्रेट (0.52 प्रतिशत) पाए जाते हैं। भस्म में सल्फेट, क्लोराइड, नाइट्रेट और क्लोरेट पाए जाते हैं।

परिचय : यह भारत के सभी भागों में पैदा होती है। इसकी जड़ और पंचांग का प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है। सफेद और लाल पुनर्नवा की पहचान यह है कि सफेद पुनर्नवा के पत्ते चिकने, दलदार और रस भरे हुए होते हैं और लाल पुनर्नवा के पत्ते सफेद पुनर्नवा के पत्तों से छोटे और पतले होते हैं। यह जड़ी-बूटियां बेचने वाली दुकान पर हमेशा उपलब्ध रहती है।

उपयोग : इस वनस्पति का उपयोग शोथ, पेशाब की रुकावट, त्रिदोष प्रकोप और नेत्र रोगों को दूर करने के लिए विशेष रूप से किया जाता है। आयुर्वेदिक योग पुनर्नवासव, पुनर्नवाष्टक, पुनर्नवा मण्डूर आदि में इसका उपयोग प्रमुख घटक द्रव्य के रूप में किया जाता है। 
* नेत्र रोग की यह उत्तम औषधि है। सफेद पुनर्नवा की जड़ को दूध में घिसकर, यह लेप आँखों में लगाएँ। आँख में फूला हो तो इसे घी के साथ घिसकर लगाएँ। तिमिर रोग के लिए तेल में और बार-बार जल्दी से जल्दी आँसू गिरते हो तो शहद में घिसकर आँखों में आँजना चाहिए। इसकी जड़ को गाय के गीले गोबर के रस में घिस कर आँखों में लगाने से मोतियाबिन्द ठीक होता है।* पुनर्नवा के साथ काली कुटकी, चिरायता और सोंठ समान मात्रा में लेकर जौकुट करके काढ़ा बनाकर 2-2 चम्मच सुबह-शाम पीने से सूजन, एनीमिया में बहुत लाभ होता है।
कामला : इसे पीलिया भी कहते हैं। इस रोग में पित्त को विरेचन द्वारा बाहर निकालने के लिए पुनर्नवा की जड़ का महीन पिसा-छना चूर्ण आधा-आधा चम्मच, ऊपर बताए गए 2-2 चम्मच काढ़े (* पुनर्नवा के साथ काली कुटकी, चिरायता और सोंठ समान मात्रा में लेकर जौकुट करके काढ़ा बनाकर 2-2 चम्मच सुबह-शाम पीने से सूजन, एनीमिया में बहुत लाभ होता है।) और आधा कप पानी के साथ पीने से 2-4 दिन में ही कामला रोग का शमन हो जाता है। इस रोग के लिए इस नुस्खे का प्रयोग निर्भय होकर निरापद रूप से किया जा सकता है।

श्वास (दमा) रोग : जब दमा रोग का दौरा पड़ता है, तब रोगी को पीड़ा और बेचैनी होती है। खासकर इस रोग का दौरा रात में पड़ता है और रोगी को रातभर बैठे रहना पड़ता है। इसके दौरे के वेग को शांत करने के लिए भी इस काढ़े के साथ पुनर्नवा की जड़ का चूर्ण उपरोक्त विधि से सेवन करने पर धीरे-धीरे रोगी को आराम मिल जाता है।

पथरी : गुर्दों में पथरी हो जाए तो संगेयहूद भस्म 2-2 रत्ती और आधा-आधा चम्मच पुनर्नवा की जड़ का चूर्ण, शहद में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से पथरी निकल जाती है।

मासिक धर्म : स्त्रियों के गर्भाशय में शोथ होने पर मासिक ऋतु स्राव में अनियमितता, कमी और अवरोध की स्थिति पैदा हो जाती है, ऋतु स्राव कष्ट के साथ होता है। इस स्थिति में पुनर्नवा और कपास की जड़ का काढ़ा 2-2 चम्मच सुबह-शाम आधा कप पानी में डालकर पीने से लाभ होता है।

पुनर्नवा के आयुर्वेदिक योग :

पुनर्नवाष्टक क्वाथ : पनुर्नवा की जड़, नीम की अंतरछाल, पटोलपत्र, सोंठ, कुटकी, गिलोय, दारुहल्दी और हरड़ ये आठों द्रव्य समान मात्रा में लेकर मोटा-मोटा कूट लें। 2 चम्मच चूर्ण लेकर 2 कप पानी में डालें और काढ़ा करें। जब पानी आधा कप बचे तब उतारकर छान लें व ठंडा करके पी लें। इसी प्रकार शाम को भी काढ़ा बनाकर पिएं। यह योग उत्तम मूत्रल और शोथनाशक औषधि है। इसके सेवन से सर्वांग शोथ, उदर विकार और श्वास-कास में भी लाभ होता है तथा दस्त साफ होता है।

पुनर्नवासव : पुनर्नवा, सोंठ, पीपल, काली मिर्च, हरड़, बहेड़ा, आँवला, दारुहल्दी, गोखरू, छोटी कटेली, बड़ी कटेली, अडूसे के पत्ते, एरण्ड की जड़, कुटकी, गजपीपल, नीम की अंतरछाल, गिलोय, सूखी मूली, धमासा, पटोलपत्र ये 20 द्रव्य 10-10 ग्राम, धाय के फूल 150 ग्राम, मुनक्का 200 ग्राम, मिश्री एक किलो और शहद आधा किलो लें। सब द्रव्यों को कूट-पीसकर शहद सहित 5 लीटर पानी में डालकर काँच के बर्तन में भरकर एक मास तक रखा रहने दें। एक मास बाद मोटे कपड़े से छानकर बोतलों में भर लें। यह पुनर्नवासव है। इसे 2-2 बड़े चम्मच, आधा कप पानी में डालकर सुबह-शाम दोनों वक्त भोजन के बाद पीना चाहिए।

यह योग शोथ, उदर रोग, प्लीहा वृद्धि, यकृत (लीवर) वृद्धि, अम्ल पित्त, गुल्म, ज्वर आदि जैसे कष्टसाध्य रोगों को ठीक करता है। यह उत्तम मूत्रल (पेशाब लाने वाला) और हृदय के लिए हितकारी है। शरीर में किसी भी कारण से आए शोथ को यह योग दूर कर देता है। यदि शोथ बहुत तीव्र हो तो इसके साथ ही सारिवासव 2-2 चम्मच मिलाकर लेना चाहिए।

पुनर्नवा अर्क : पुनर्नवा पंचांग को चौगुने जल में डालकर, अर्क निकालने की विधि से इसका अर्क निकाल लें। इसे दिन में 2-3 बार 2-2 छोटे चम्मच, आधा कप पानी में डालकर पीने से सब प्रकार के शोथ मिट जाते हैं, पेशाब की रुकावट दूर होती है और खुलकर पेशाब होता है। 2-2 बूँद आँखों में डालने से आँखों की शोथ (सूजन), जलन व पीड़ा दूर होती है।
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पुनर्नवा – लाजवाब औषधि

आयुर्वेद में पुनर्नवा का अभिप्राय इस प्रकार बताया है कि ऐसा रसायन जो मानव शरीर को फिर से नया बना दे। पुनर्नवा (English name: Horse Purslane, वानस्पतिक नाम: Boerhaavia diffusa) एक प्रकार का खरपतवार (Weed) है जो बरसात से लेकर हेमंतऋतु तक भारत में लगभग हर जगह सुलभ है.

पुनर्नवा का सूखा पौधा बारिश के मौसम में नया जीवन पाकर फूलने-फलने लगता है। पुनर्नवा पूरे भारत में विशेषत: गर्म प्रदेशों में बहुतायत से प्राप्त होता है। हर वर्ष बरसात के मौसम में नए पौधे निकलना और गर्मी के मौसम में सूख जाना इसकी विशेषता है। पुनर्नवा की 2 प्रकार की जातियां लाल और सफेद पाई जाती हैं। इनमें रक्त जाति वनस्पति का प्रयोग अधिकता से औषधि के रूप में किया जाता है।

पत्तों को छोड़, पुनर्नवा का कांड (तना), फूल सभी लालिमा लिये होते हैं। पत्ते भी पृष्ठ भाग में लालिमा लिये होते हैं. पक जाने पर बाहरी भाग सूख जाता है। परंतु जड़ें भूमि में पड़ी रहती है, जो बरसात के मौसम में फिर से उग आती है।

पहचान

पुनर्नवा लेटी हुई छत्ताकार बेलनुमा होती है; यह बरसात के मौसम में पैदा होकर बढ़ती है और हेमन्त ऋतु में सूख जाती है। इसके दो प्रकार हैं श्वेत व लाल। श्वेत के पत्ते तथा डंठल सफेदी लिये लाल होते हैं। रक्त (लाल) के हल्के लाल होते हैं। लाल पुनर्नवा के पत्ते श्वेत की अपेक्षा चक्राकार न होकर कुछ लंबे होते हैं। इसके पत्ते कोमल, मांसल, गोल या अंडाकार और निचला तला सफेद होता है। इसमें पुष्प (फूल) सफेद या गुलाबी छोटे-छोटे, छतरीनुमा लगते हैं। फल आधा इंच के छोटे, चिपचिपे बीजों से युक्त तथा पांच धारियों वाले होते हैं। इसकी जड़ 1 फुट तक लंबी, उंगली जितनी मोटी, गूदेदार, 2 से 3 शाखाओं से युक्त, तेजगंध वाली तथा स्वाद में तीखी होती है। औषधि प्रयोग के लिए इसकी जड़ और पत्ते काम में आते हैं।
पुनर्नवा के अन्य नाम

रक्त पुनर्नवा, रक्तपुष्पा, शिलाटीका, शोथघ्नी, क्षुद्रवर्षाभू, वर्षकेतू, कठिल्ल्क, विशखपरा, विषकपरा, शरुन्ने, साबुनी, वसु इत्यादि नाम आयुर्वेद भावप्रकाश ग्रन्थ में वर्णित हैं.

पुनर्नवा के औषधीय गुण

पुनर्नवा गांवों में शाक सब्जी के काम में भी लाई जाती है। पुनर्नवा खाने में ठंडी, सूखी और हल्की होती है। पुनर्नवा उष्णवीर्य, तिक्त, रूखी और कफ नाशक होती है। जोड़ों पेट इत्यादि की सूजन (Inflamation), पांडुरोग (Anemia), ह्रदयरोग, लिवरपथरी (Kidney, urinary stone), खांसी, डायबिटीज, उर:क्षत(सीने, फेफड़ों के घाव) आर्थराइटिस और पीड़ा (Pain) के लिये पुनर्नवा संजीवनी मानी जाती है। कुछ शोध पुनर्नवा को कैंसर, पेट के रोगों जैसे amoebiasis में लाभकारी व रोग प्रतिरोधक भी मानते हैं.

पुनर्नवा का मुख्य औषधीय घटक एक एल्केलायड है, जिसे पुनर्नवाइन (Punarnavine) कहा जाता है। इसकी मात्रा जड़ में लगभग 0.04 प्रतिशत होती है। अन्य एल्केलायड्स की मात्रा लगभग 6.5 प्रतिशत होती है। पुनर्नवा के जल में न घुल पाने वाले भाग में स्टेरॉन पाए गए हैं, जिनमें बीटा-साइटोस्टीराल (Beta-cytosterol) और एल्फा-टू (Alfa-2) स्टीराल प्रमुख है।

पुनर्नवा में एक ओषजन युक्त पदार्थ ऐसेण्टाइन भी मिला है। इसके अतिरिक्त कुछ महत्त्वपूर्ण् कार्बनिक अम्ल तथा लवण भी पाए जाते हैं। अम्लों में स्टायरिक तथा पामिटिक अम्ल एवं लवणों में पोटेशियम नाइट्रेट, सोडियम सल्फेट एवं क्लोराइड प्रमुख हैं। इन्हीं के कारण पुनर्नवा सूक्ष्म स्तर पर कार्य करने की सामर्थ्य रखती है।

पुनर्नवा विशेष

पुनर्नवा एक बेहतरीन मूत्रल (Diuretic) औषधि है जिस कारण इसे किडनी व मूत्राशय की पथरी को हरने वाली औषधि माना जाता है. मूत्रल होने के कारण ही इसेउच्च रक्तचाप ( High Blood Pressure) में भी लाभकारी जाना गया है. पुनर्नवा फेफड़ों में कफ़ का निस्सारण करने में भी अत्यंत लाभकारी पायी गयी है. इसके उपयोग से छाती की जकड़न (lungs congestion) में अदभुत लाभ होता है.

पुनर्नवा के एंटीएजिंग (Anti-aging), व शरीर के दर्द निवारक गुणों के कारण बहुत से लोग इसके supplements भी लेते हैं जो amazon जैसे ऑनलाइन स्टोर्स से घर बैठे मंगाए जा सकते हैं. नीचे के लिंक पर पुनर्नवा के प्रोडक्ट्स देखे व खरीदे जा सकते हैं.

कैसे करें उपयोग

पुनर्नवा का साग बना कर खाईये या काढ़ा बना कर सेवन कीजिये. दोनों ही उपयोगी हैं. बस इसमें थोडा सा स्वादानुसार अदरक या अजवायन या दालचीनी; व काली मिर्च अवश्य मिलाएं जिससे इसका वायवीय प्रभाव कम हो जाए व औषधीय उपयोगिता बढ़ जाए।

आयुर्वेद में पुनर्नवा की मात्रा

पुनर्नवा के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर, जड़ का चूर्ण 3 से 5 ग्राम, बीजों का चूर्ण 1 से 3 ग्राम, पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) चूर्ण 5 से 10 ग्राम।
सारशब्द: पुनर्नवा एक मुफ्त में पायी जाने वाली उत्तम औषधि है जिसका उपयोग कर हम फेफड़ों, लिवर, पेट के रोगों व उच्च रक्तचाप, पथरी, त्वचा विकार जैसी विसंगतियों से बचे रह सकते हैं।
स्रोत : http://ayurvedcentral.com/2016/08/19/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%BE-%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AC-%E0%A4%94%E0%A4%B7%E0%A4%A7%E0%A4%BF/

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--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!

--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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नेत्र रोग नैतिक नोनिया नौसादर न्युमोनिया-Pneumonia पक्षघात पढ़ने में मन लगेगा पंतजलि पत्तागोभी-CABBAGE पत्थर फोड़ी पत्थरचट्टा पत्नी पथरी पदार्थ पनीर पपीता पपीता-CARICA PAPPYA पमाड परदेशी लांगड़ी परहेज पराठा परिस्थिति पवाड़ पवाँर पाइल्स पाक-कला पाचक पाचन पाठक संख्या 16 लाख पार पाठक संख्या पंद्रह लाख पायरिया पारिजात पालक पालक-Spinach पित्त पित्ती पिंपल-मुंहासे-Pimples-Acne पिरामिड पीलिया पीलिया-Jaundice पीलिया-कामला-Jaundice पुआड़ पुदीना पुनर्नवा-साटी-सौंटी-Punarnava पुरुष पेचिश पेट के कीड़े पेट दर्द पेट में गैस पेट रोग पेड़ पेशाब में रुकावट पेंसिल थेरेपी-Pencil Therapy पौधे पौरुष पौष्टिक रागी रोटी प्याज-Onion प्यास प्रजनन प्रतिरक्षा प्रतिरक्षा प्रणाली प्रतिरोधक प्रतिरोधक-Resistance प्रदर प्रमेह प्रवाहिका (पेचिश)-Dysentery प्रसव प्रसव सुरक्षा चक्र प्रसव-पीड़ा प्रसूति प्राणायाम प्रेग्नेंसी-Pregnancy प्रेमिका प्रोटीन प्रोटीन का कार्य प्रोटीन के स्रोत प्रोस्टेट ग्रन्थि प्लीहा प्लूरिसी-Pleurisy प्लेटलेट्स फफूंद-Fungi फरास फल फल-Fruit फाइबर फिटकरी फुंसी-Pimples फूलगोभी-CAULIFLOWER फेंफड़े फैट 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