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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' आॅन लाईन होम्योपैथ एवं परम्परागत चिकित्सक, 9875066111

निवेदन : रोगियों की संख्या अधिक होने के कारण, आपको इन्तजार करना पड़ सकता है। कृपया धैर्यपूर्वक सहयोग करें। (Due to the high number of patients, you may have to wait. Please patiently collaborate.)

कायाकल्प


शरीर का कायाकल्प। रोगी को निरोग, बूढ़े को जवान और नामर्द को मर्द बना दे त्रिफला अवलेह का नियमित सेवन।

त्रिफला अवलेह।

3 ग्राम त्रिफला चूर्ण (आंवला, हरड़, बहेड़ा तीनो 1:2:3 के अनुपात से अर्थात एक भाग हरड़, दो भाग बहेड़ा, तीन भाग आंवला के चूर्ण को मिला कर बनाया हुआ चूर्ण) में 1 ग्राम तिल का तेल और 6 ग्राम शहद मिलाकर रोज़ाना खाली पेट गुनगुने पाने के साथ और रात को सोते समय गर्म दूध के साथ ले, इस से पेट और धातु सम्बंधित सब रोग दूर हो कर काय पलट जाती हैं। ऋषियों ने यहाँ तक कहा हैं के एक मास निरंतर प्रयोग करने से रोगी को निरोग, बूढ़े को जवान और नामर्द को मर्द बना देता हैं। इसके सेवन करने से शरीर की चमक बढ़ती हैं, बवासीर, गर्मी, सुजाक, दाद, खांसी, दमा, बुखार, मर्दाना कमज़ोरी, आदि कई बिमारिया जड़ से खत्म हो जाती हैं।
स्रोत : http://onlyayurved.com/supplement/trifla/
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 यह चिकित्सा विधि त्वचा को निखारने के साथ  सभी ऊतकों का कायाकल्प कर उन्हें मजबूती प्रदान करती है ताकि आदर्श स्वास्थ्य और दीर्घायुता प्राप्त हो सके। ‘ओज’ (प्राथमिक उत्साह) को बढ़ाती है और ‘सत्व’ (मानसिक स्पष्टता) को समुन्नत करती है तथा इसके परिणामस्वरूप शरीर की प्रतिरोधी क्षमता में वृद्धि होती है। इसमें शामिल हैं औषधियुक्त तेल और क्रीम से सिर तथा चेहरे की मालिश, हर्बल तेल अथवा पाउडर से हाथ और पैर द्वारा शरीर की मालिश, आंतरिक कायाकल्प औषधि तथा औषधियुक्त स्टीम बाथ। हर्बल बाथ भी प्रयोग में लाया जाता है।
शारीरिक प्रतिरक्षण और दीर्घायुता उपचार (कायाकल्प चिकित्सा):
उम्रवृद्धि की प्रक्रिया धीमी करने, शरीर की कोशिकाओं की विकृति को न्यूनतम करने और तंत्र के प्रतिरक्षण का यह एक प्रमुख उपचार पद्धति है। इसमें रासायनों का सेवन (खास आयुर्वेदिक दवाएं और आहार) और व्यापक शरीर-देखभाल कार्यक्रम शामिल होते हैं। यह चिकित्सा विधि यदि 50 की उम्र से पहले अपनाई जाए तो स्त्री-पुरुष दोनों के लिए यह बहुत ही प्रभावकारी उपचार होता है।
शारीरिक प्रस्वेदन (स्वेद कर्म):
औषधियुक्त स्टीम बाथ शरीर की अशुद्धियों को दूर करता है, त्वचा के रंग को निखारता है, वसा को कम करता है और कुछ वातरोगों खासकर दर्द में इसकी सलाह दी जाती है। बहुमूल्य जड़ी-बूटियों और हर्बल पत्तों को उबाला जाता है तथा वाष्प से संपूर्ण शरीर को 10 से 20 मिनट तक प्रतिदिन नहलाया जाता है। हर्बल तेल और हर्बल पाउडर से हाथ द्वारा मालिश करने से रक्त संचरण में वृद्धि और मांसपेशियां सुदृढ़ होती हैं।
शरीर को स्लिम बनाना :
औषधियुक्त हर्बल पाउडर और हर्बल तेल की मालिश, हर्बल रसों इत्यादि का आयुर्वेदिक आहार इस कार्यक्रम के अंग हैं।
ब्यूटी केयर:
हर्बल फेस पैक, हर्बल तेल मालिश, हर्बल चाय के सेवन से रंग-रूप निखरता है और शरीर सुडौल बनता है।  
मानसिक और शारीरिक तंदुरुस्ती (ध्यान और योग), मानसिक और शारीरिक व्यायाम का तात्पर्य है अपने अहं को अपने शरीर और मन से बाहर निकलाना – प्रशिक्षण के 8 चरण बताए गए हैं जिनसे आपकी एकाग्रता बनती है, स्वास्थ्य समृद्ध होता है और मन की शांति की प्राप्ति में मदद मिलती है: 
1. अनुशासित व्यवहार (यम) 
2. आत्म शुद्धिकरण (नियम) 
3. शारीरिक आसन जैसे पद्मासन या लोटस पोज़िशन (आसन) 
4. श्वास नियंत्रण (प्राणायाम) 
5. इन्द्रियों पर नियंत्रण (प्रत्याहार) 
6. चयनित वस्तु पर मन को स्थिर करना (धारणा) 
7. मेडिटेशन (ध्यान) और 
8. समाधि–वह मानसिक अवस्था जहां आप पूर्ण शांतचित्तता और सुख महसूस करते हैं।  
समग्र रूप से तंदुरुस्ती (पंचकर्म उपचार)
मानसिक और शारीरिक तंदुरुस्ती के लिए एक पांच-सूत्री उपचार – यह शरीर, शरीर के अंगों, मस्तिष्क एवं सांसों में सामंजस्य बिठाता है और रक्त को शुद्ध करता है।
स्रोत : https://www.keralatourism.org/hindi/ayurveda/rejuvenation-therapy-rasayana-chikitsa.php
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आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को लेकर यह भ्रम है कि इससे आकस्मिक चिकित्सा लाभ नहीं लिया जा सकता और इसका असर लंबे समय तक औषधि लेने पर ही होता है। वैद्य विनोद वैरागी की पुस्तक 'पंचकर्म से रोग मुक्ति' में उक्त भ्रमों का इलाज भी किया गया है और सामान्य भाषा में रोगों का इलाज कैसे पंचकर्म से किया जाता है, इस बारे में लिखा गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा भी पंचकर्म चिकित्सा विधा को स्वीकार किया गया है, यह काफी कम लोगों को पता होगा। आयुर्वेद के प्रमुख दो उद्देश्य हैं- स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी का उपचार। इन दोनों ही उद्देश्यों को पंचकर्म के माध्यम से कैसे पूर्ण किया जाए, इसका वर्णन काफी अच्छा बन पड़ा है।
पंचकर्म की पाँच प्रमुख विधियाँ वमन कर्म, विरेचन कर्म, वस्ति कर्म, नस्य कर्म, रक्तमोक्षण कर्म के माध्यम से शरीर के विकारों को कैसे दूर किया जाता है, इसका सचित्र वर्णन पुस्तक में है। दक्षिण भारत में पंचकर्म की लोकप्रियता काफी ज्यादा है और वर्तमान में उत्तर भारत में भी केंद्र सरकार की आयुष योजना के माध्यम से पंचकर्म को लोकप्रिय बनाने की कवायद जारी है। 
प्रत्येक व्यक्ति को जवाँ बनने की चाहत रहती है और इस हेतु वह बुढ़ापे की निशानियाँ शरीर पर दिखने के बाद ही तरह-तरह के इलाज करने लगता है। पंचकर्म से कायाकल्प की विधि समय जरूर लेती है, पर इससे स्वस्थ शरीर होने की बात कही गई है। असल में इन पाँचों विधियों में प्रकृति से ली गई सीख और औषधियों का ही प्रयोग किया गया है। 40 वर्ष की उम्र के बाद कायाकल्प करने के लिए पंचकर्म की पाँचों विधियाँ शरीर पर की जाती हैं तथा 130 दिनों में शरीर का कायाकल्प होने की बात लिखी गई है। 
पंचकर्म से मौसमी बीमारियों को कैसे ठीक करें और आकस्मिक स्थिति में मरीज को पंचकर्म में उल्लेखित औषधि किस प्रकार देना चाहिए, इस बारे में पुस्तक में काफी विस्तार से बताया गया है। जैसे विषपान, मिर्गी, लू लगने, चोट लगने पर। और तो और, हृदयाघात आदि में पंचकर्म विधियाँ कारगर साबित हो सकती हैं। सौंदर्य हेतु पंचकर्म से लेकर आयुर्वेद संबंधी सामान्य प्रश्न और पंचकर्म से लाभ प्राप्त कर चुके मरीजों के अनुभव को भी पुस्तक में जगह दी गई है।
दीर्घायु व स्वस्थ रहने के टिप्स के अलावा पुस्तक में कई तरह की बीमारियाँ व उनके इलाज के बारे में बताया गया है। कुल मिलाकर आयुर्वेद व पंचकर्म विधियों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का यह सहज व सरल माध्यम हो सकता है। वैसे पुस्तक में बताई गई विधियों को विशेषज्ञ की निगरानी में ही अपनाएँ तो बेहतर होगा।
स्रोत : http://hindi.webdunia.com/article/health-news/%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AA-108072800018_1.htm
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जो अलसी खाए वो गाये जवानी ज़िंदाबाद, और बुढ़ापा बाये बाये।
अलसी–एक चमत्कारी आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक दैविक भोजन।
गुणधर्म–अलसी एक प्रकार का तिलहन है। इसका बीज सुनहरे रंग का तथा अत्यंत चिकना होता है। फर्नीचर के वार्निश में इसके तेल का आज भी प्रयोग होता है। आयुर्वेदिक मत के अनुसार अलसी वातनाशक, पित्तनाशक तथा कफ निस्सारक भी होती है। मूत्रल प्रभाव एवं व्रणरोपण, रक्तशोधक, दुग्धवर्द्धक, ऋतुस्राव नियामक, चर्मविकारनाशक, सूजन एवं दरद निवारक, जलन मिटाने वाला होता है। यकृत, आमाशय एवं आँतों की सूजन दूर करता है। बवासीर एवं पेट विकार दूर करता है। सुजाकनाशक तथा गुरदे की पथरी दूर करता है। अलसी में विटामिन बी एवं कैल्शियम, मैग्नीशियम, काॅपर, लोहा, जिंक, पोटेशियम आदि खनिज लवण होते हैं। इसके तेल में 36 से 40 प्रतिशत ओमेगा-3 होता है।

जब से परिष्कृत यानी “रिफाइन्ड तेल” (जो बनते समय उच्च तापमान, हेग्जेन, कास्टिक सोडा, फोस्फोरिक एसिड, ब्लीचिंग क्ले आदि घातक रसायनों के संपर्क से गुजरता है), ट्रांसफेट युक्त पूर्ण या आंशिक हाइड्रोजिनेटेड वसा यानी वनस्पति घी (जिसका प्रयोग सभी पैकेट बंद खाद्य पदार्थों व बेकरी उत्पादनों में धड़ल्ले से किया जाता है), रासायनिक खाद, कीटनाशक, प्रिजर्वेटिव, रंग, रसायन आदि का प्रयोग बढ़ा है तभी से डायबिटीज के रोगियों की संख्या बढ़ी है। हलवाई और भोजनालय भी वनस्पति घी या रिफाइन्ड तेल का प्रयोग भरपूर प्रयोग करते हैं और व्यंजनों को तलने के लिए तेल को बार-बार गर्म करते हैं जिससे वह जहर से भी बदतर हो जाता है। शोधकर्ता इन्ही को डायबिटीज का प्रमुख कारण मानते हैं। पिछले तीन-चार दशकों से हमारे भोजन में ओमेगा-3 वसा अम्ल की मात्रा बहुत ही कम हो गई है और इस कारण हमारे शरीर में ओमेगा-3 व ओमेगा-6 वसा अम्ल यानी हिंदी में कहें तो ॐ-3 और ॐ-6 वसा अम्लों का अनुपात 1:40 या 1:80 हो गया है जबकि यह 1:1 होना चाहिये। यह भी डायबिटीज का एक बड़ा कारण है। डायबिटीज के नियंत्रण हेतु आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक व दैविक भोजन अलसी को “अमृत“ तुल्य माना गया है।

अलसी शरीर को स्वस्थ रखती है व आयु बढ़ाती है। अलसी में 23 प्रतिशत ओमेगा-3 फेटी एसिड, 20 प्रतिशत प्रोटीन, 27 प्रतिशत फाइबर, लिगनेन, विटामिन बी ग्रुप, सेलेनियम, पोटेशियम, मेगनीशियम, जिंक आदि होते हैं। सम्पूर्ण विश्व ने अलसी को सुपर स्टार फूड के रूप में स्वीकार कर लिया है और इसे आहार का अंग बना लिया है, लेकिन हमारे देश की स्थिति बिलकुल विपरीत है । अलसी को अतसी, उमा, क्षुमा, पार्वती, नीलपुष्पी, तीसी आदि नामों से भी पुकारा जाता है। अलसी दुर्गा का पांचवा स्वरूप है। प्राचीनकाल में नवरात्री के पांचवे दिन स्कंदमाता यानी अलसी की पूजा की जाती थी और इसे प्रसाद के रूप में खाया जाता था। जिससे वात, पित्त और कफ तीनों रोग दूर होते है।

ओमेगा-3 हमारे शरीर की सारी कोशिकाओं, उनके न्युक्लियस, माइटोकोन्ड्रिया आदि संरचनाओं के बाहरी खोल या झिल्लियों का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यही इन झिल्लियों को वांछित तरलता, कोमलता और पारगम्यता प्रदान करता है। ओमेगा-3 का अभाव होने पर शरीर में जब हमारे शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाती है तो ये भित्तियां मुलायम व लचीले ओमेगा-3 के स्थान पर कठोर व कुरुप ओमेगा-6 फैट या ट्रांस फैट से बनती है, ओमेगा-3 और ओमेगा-6 का संतुलन बिगड़ जाता है, प्रदाहकारी प्रोस्टाग्लेंडिन्स बनने लगते हैं, हमारी कोशिकाएं इन्फ्लेम हो जाती हैं, सुलगने लगती हैं और यहीं से ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, डिप्रेशन, आर्थ्राइटिस और कैंसर आदि रोगों की शुरूवात हो जाती है।

आयुर्वेद के अनुसार हर रोग की जड़ पेट है और पेट साफ रखने में यह इसबगोल से भी ज्यादा प्रभावशाली है। आई.बी.एस., अल्सरेटिव कोलाइटिस, अपच, बवासीर, मस्से आदि का भी उपचार करती है अलसी।

अलसी शर्करा ही नियंत्रित नहीं रखती, बल्कि मधुमेह के दुष्प्रभावों से सुरक्षा और उपचार भी करती है। अलसी में रेशे भरपूर 27% पर शर्करा 1.8% यानी नगण्य होती है। इसलिए यह शून्य-शर्करा आहार कहलाती है और मधुमेह के लिए आदर्श आहार है। अलसी बी.एम.आर. बढ़ाती है, खाने की ललक कम करती है, चर्बी कम करती है, शक्ति व स्टेमिना बढ़ाती है, आलस्य दूर करती है और वजन कम करने में सहायता करती है। चूँकि ओमेगा-3 और प्रोटीन मांस-पेशियों का विकास करते हैं अतः बॉडी बिल्डिंग के लिये भी नम्बर वन सप्लीमेन्ट है अलसी।

अलसी कॉलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और हृदयगति को सही रखती है। रक्त को पतला बनाये रखती है अलसी। रक्तवाहिकाओं को साफ करती रहती है अलसी।

चश्में से भी मुक्ति दिला देती है अलसी। दृष्टि को स्पष्ट और सतरंगी बना देती है अलसी।

अलसी एक फीलगुड फूड है, क्योंकि अलसी से मन प्रसन्न रहता है, झुंझलाहट या क्रोध नहीं आता है, पॉजिटिव एटिट्यूड बना रहता है यह आपके तन, मन और आत्मा को शांत और सौम्य कर देती है। अलसी के सेवन से मनुष्य लालच, ईर्ष्या, द्वेश और अहंकार छोड़ देता है। इच्छाशक्ति, धैर्य, विवेकशीलता बढ़ने लगती है, पूर्वाभास जैसी शक्तियाँ विकसित होने लगती हैं। इसीलिए अलसी देवताओं का प्रिय भोजन थी। यह एक प्राकृतिक वातानुकूलित भोजन है।

माइन्ड का Sim card है अलसी यहां सिम का मतलब सेरीनिटी, इमेजिनेशन और मेमोरी तथा कार्ड का मतलब कन्सन्ट्रेशन, क्रियेटिविटी, अलर्टनेट, रीडिंग राईटिंग थिंकिंग एबिलिटी और डिवाइन है।

त्वचा, केश और नाखुनों का नवीनीकरण या जीर्णोद्धार करती है अलसी। अलसी के शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट ओमेगा-3 व लिगनेन त्वचा के कोलेजन की रक्षा करते हैं और त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनाते हैं। अलसी सुरक्षित, स्थाई और उत्कृष्ट भोज्य सौंदर्य प्रसाधन है जो त्वचा में अंदर से निखार लाता है। त्वचा, केश और नाखून के हर रोग जैसे मुहांसे, एग्ज़ीमा, दाद, खाज, खुजली, सूखी त्वचा, सोरायसिस, ल्यूपस, डेन्ड्रफ, बालों का सूखा, पतला या दोमुंहा होना, बाल झड़ना आदि का उपचार है अलसी। चिर यौवन का स्रोता है अलसी। बालों का काला हो जाना या नये बाल आ जाना जैसे चमत्कार भी कर देती है अलसी। किशोरावस्था में अलसी के सेवन करने से कद बढ़ता है।

लिगनेन का सबसे बड़ा स्रोत अलसी ही है जो जीवाणुरोधी, विषाणुरोधी, फफूंदरोधी और कैंसररोधी है। अलसी शरीर की रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ कर शरीर को बाहरी संक्रमण या आघात से लड़ने में मदद करती हैं और शक्तिशाली एंटी-आक्सीडेंट है। लिगनेन वनस्पति जगत में पाये जाने वाला एक उभरता हुआ सात सितारा पोषक तत्व है जो स्त्री हार्मोन ईस्ट्रोजन का वानस्पतिक प्रतिरूप है और नारी जीवन की विभिन्न अवस्थाओं जैसे रजस्वला, गर्भावस्था, प्रसव, मातृत्व और रजोनिवृत्ति में विभिन्न हार्मोन्स् का समुचित संतुलन रखता है। लिगनेन मासिकधर्म को नियमित और संतुलित रखता है। लिगनेन रजोनिवृत्ति जनित-कष्ट और अभ्यस्त गर्भपात का प्राकृतिक उपचार है। लिगनेन दुग्धवर्धक है। लिगनेन स्तन, बच्चेदानी, आंत, प्रोस्टेट, त्वचा व अन्य सभी कैंसर, एड्स, स्वाइन फ्लू तथा एंलार्ज प्रोस्टेट आदि बीमारियों से बचाव व उपचार करता है।

जोड़ की हर तकलीफ का तोड़ है अलसी। जॉइन्ट रिप्लेसमेन्ट सर्जरी का सस्ता और बढ़िया उपचार है अलसी। ­­ आर्थ्राइटिस, शियेटिका, ल्युपस, गाउट, ओस्टियोआर्थ्राइटिस आदि का उपचार है अलसी।

कई असाध्य रोग जैसे अस्थमा, एल्ज़ीमर्स, मल्टीपल स्कीरोसिस, डिप्रेशन, पार्किनसन्स, ल्यूपस नेफ्राइटिस, एड्स, स्वाइन फ्लू आदि का भी उपचार करती है अलसी। कभी-कभी चश्में से भी मुक्ति दिला देती है अलसी। दृष्टि को स्पष्ट और सतरंगी बना देती है अलसी।
  • अलसी बांझपन, पुरूषहीनता, शीघ्रस्खलन व स्थम्भन दोष में बहुत लाभदायक है।
  • मीनोपोज़ (माहवारी सम्बंधित) की तकलीफों पर पॉज़ लगा देती है अलसी।
  • पुरुषरोग में सस्टेन्ड रिलीज़ वियाग्रा है अलसी। जो अलसी खाये वो गाये जवानी ज़िंदाबाद बुढ़ापा बाय बाय।
  • पुरूष को कामदेव तो स्त्रियों को रति बनाती है अलसी।
  • बॉडी बिल्डिंग के लिये नम्बर वन सप्लीमेन्ट है अलसी।
  • जोड़ की तकलीफों का तोड़ है अलसी। जॉइन्ट रिप्लेसमेन्ट सर्जरी का सस्ता और बढ़िया विकल्प है अलसी।
  • क्रूर, कुटिल, कपटी, कठिन, कष्टप्रद कर्करोग का सस्ता, सरल, सुलभ, संपूर्ण और सुरक्षित समाधान है अलसी।
1952 में डॉ. योहाना बुडविग ने ठंडी विधि से निकले अलसी के तेल, पनीर, कैंसररोधी फलों और सब्ज़ियों से कैंसर के उपचार का तरीका विकसित किया था जो बुडविग प्रोटोकोल के नाम से जाना जाता है। यह कर्करोग का सस्ता, सरल, सुलभ, संपूर्ण और सुरक्षित समाधान है। उन्हें 90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता मिलती थी। इसके इलाज से वे रोगी भी ठीक हो जाते थे जिन्हें अस्पताल में यह कहकर डिस्चार्ज कर दिया जाता था कि अब कोई इलाज नहीं बचा है, वे एक या दो धंटे ही जी पायेंगे सिर्फ दुआ ही काम आयेगी। उन्होंने सशर्त दिये जाने वाले नोबल पुरस्कार को एक नहीं सात बार ठुकराया।

अलसी सेवन का तरीकाः-
  1. हमें प्रतिदिन 30 – 60 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये। 30 ग्राम आदर्श मात्रा है। अलसी को रोज मिक्सी के ड्राई ग्राइंडर में पीसकर आटे में मिलाकर रोटी, पराँठा आदि बनाकर खाना चाहिये। डायबिटीज के रोगी सुबह शाम अलसी की रोटी खायें। कैंसर में बुडविग आहार-विहार की पालना पूरी श्रद्धा और पूर्णता से करना चाहिये। इससे ब्रेड, केक, कुकीज, आइसक्रीम, चटनियाँ, लड्डू आदि स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाये जाते हैं।
  2. अलसी को सूखी कढ़ाई में डालिये, रोस्ट कीजिये (अलसी रोस्ट करते समय चट चट की आवाज करती है) और मिक्सी से पीस लीजिये. इन्हें थोड़े दरदरे पीसिये, एकदम बारीक मत कीजिये. भोजन के बाद सौंफ की तरह इसे खाया जा सकता है .
  3. अलसी की पुल्टिस का प्रयोग गले एवं छाती के दर्द, सूजन तथा निमोनिया और पसलियों के दर्द में लगाकर किया जाता है। इसके साथ यह चोट, मोच, जोड़ों की सूजन, शरीर में कहीं गांठ या फोड़ा उठने पर लगाने से शीघ्र लाभ पहुंचाती है। यह श्वास नलियों और फेफड़ों में जमे कफ को निकाल कर दमा और खांसी में राहत देती है।
  4. इसकी बड़ी मात्रा विरेचक तथा छोटी मात्रा गुर्दो को उत्तेजना प्रदान कर मूत्र निष्कासक है। यह पथरी, मूत्र शर्करा और कष्ट से मूत्र आने पर गुणकारी है। अलसी के तेल का धुआं सूंघने से नाक में जमा कफ निकल आता है और पुराने जुकाम में लाभ होता है। यह धुआं हिस्टीरिया रोग में भी गुण दर्शाता है। अलसी के काढ़े से एनिमा देकर मलाशय की शुद्धि की जाती है। उदर रोगों में इसका तेल पिलाया जाता हैं।
  5. अलसी के तेल और चूने के पानी का इमल्सन आग से जलने के घाव पर लगाने से घाव बिगड़ता नहीं और जल्दी भरता है। पथरी, सुजाक एवं पेशाब की जलन में अलसी का फांट पीने से रोग में लाभ मिलता है। अलसी के कोल्हू से दबाकर निकाले गए (कोल्ड प्रोसेस्ड) तेल को फ्रिज में एयर टाइट बोतल में रखें। स्नायु रोगों, कमर एवं घुटनों के दर्द में यह तेल पंद्रह मि.ली. मात्रा में सुबह-शाम पीने से काफी लाभ मिलेगा।
  6. इसी कार्य के लिए इसके बीजों का ताजा चूर्ण भी दस-दस ग्राम की मात्रा में दूध के साथ प्रयोग में लिया जा सकता है। यह नाश्ते के साथ लें।
  7. बवासीर, भगदर, फिशर आदि रोगों में अलसी का तेल (एरंडी के तेल की तरह) लेने से पेट साफ हो मल चिकना और ढीला निकलता है। इससे इन रोगों की वेदना शांत होती है।
  8. अलसी के बीजों का मिक्सी में बनाया गया दरदरा चूर्ण पंद्रह ग्राम, मुलेठी पांच ग्राम, मिश्री बीस ग्राम, आधे नींबू के रस को उबलते हुए तीन सौ ग्राम पानी में डालकर बर्तन को ढक दें। तीन घंटे बाद छानकर पीएं। इससे गले व श्वास नली का कफ पिघल कर जल्दी बाहर निकल जाएगा। मूत्र भी खुलकर आने लगेगा।
  9. इसकी पुल्टिस हल्की गर्म कर फोड़ा, गांठ, गठिया, संधिवात, सूजन आदि में लाभ मिलता है।
  10. डायबिटीज के रोगी को कम शर्करा व ज्यादा फाइबर खाने की सलाह दी जाती है। अलसी व गैहूं के मिश्रित आटे में (जहां अलसी और गैहूं बराबर मात्रा में हो)
  11. स्रोत : http://onlyayurved.com/supplement/flax-seed/
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    शरीर का पूरा कायाकल्प, सदैव युवा रखने वाला वाला सदाबहार चूर्ण।
    By Street Ayurveda on May 15, 2016
    आज बढ़ते हुए तनाव, मानसिक थकान, चिंता, शारीरिक रोग ये सब असमय ही इंसान को बूढा बना देती हैं। भरी जवानी में इंसान बूढा नज़र आने लगता हैं। अगर आप अपना योवन कायम रखना चाहते हैं तो आपको यथासंभव तनाव, चिंता को त्यागना होगा। कहा भी जाता हैं के चिंता से बड़ा कोई शारीरिक शत्रु नहीं हैं। योग करे, ध्यान करे, दोस्तों से मिले, बच्चो और बुज़ुर्गो के साथ समय बिताये, किसी क्लब का सदस्य बनिए, हफ्ते में एक दिन गौशाला जाइए, किसी गरीब को खाना खिलाये। इस से आपकी तनाव और चिंता भाग जाएगी।इसके साथ हम आज आपको बताने जा रहे हैं आयुर्वेद के एक ऐसे सदाबहार चूर्ण के बारे में जिसको खा कर आप सदा अपने आप को जवान और तंदुरुस्त महसूस करेंगे। बस इसको अपने दैनिक जीवन में शामिल करे।
    आइये जाने इसको घर पर बनाने की विधि।
    सामग्री।
    1. सूखे आंवले का चूर्ण2. काले तिल (साफ़ कर के) इसका चूर्ण।3. भृंगराज (भांगरा) का चूर्ण।4. गोखरू का चूर्ण।
    पहले ये सब 100 – 100 ग्राम की मात्रा में ले कर मिला लीजिये, फिर इस में 400 ग्राम पीसी हुयी मिश्री मिला लीजिये। तत्पश्चात इसमें 100 ग्राम शुद्ध देशी गौ घृत (गाय का घी) मिला लीजिये और आखिर में इस में 200 ग्राम शहद मिला लीजिये। अब इस चूर्ण को किसी कांच के बर्तन में या घी के चिकने मिटटी के पात्र या चीनी के बर्तन में सुरक्षित रख ले। इस चूर्ण को एक चम्मच (5 ग्राम) की मात्रा में खाली पेट नित्य सेवन करे और ऊपर से गाय का दूध या गुनगुना पानी पीजिये।
    सावधानी –
    घी और शहद परस्पर समान मात्रा में धीमे ज़हर का काम करते हैं। इसलिए इनकी समान मात्रा नहीं लेनी।
    फायदे –
    इस चूर्ण से आपके शरीर का पूरा कायाकल्प हो जायेगा। यदि छोटी आयु में बाल झड़ गए हैं तो पुनः दोबारा उग आएंगे, अगर सफ़ेद हो गए हैं तो काले हो जायेंगे, और वृद्धावस्था तक काले बने रहेंगे। ढीले दांत भी मज़बूत बन जायेंगे। चेहरे पर कान्ति आ जाएगी। शरीर शक्ति शाली और बाजीकरण युक्त हो जाएगा। और कुछ ही दिनों में दुर्बल व्यक्ति भी अपना वज़न पूरा कर शक्तिशाली बन जाता हैं।
    परहेज –
    अंडा, मांस, मछली, नशीले पदार्थो का सेवन एवं वीर्य नाश वर्जित हैं।
    Source : http://www.streetayurveda.com/ayurvedic-medicine-makes-you-younger/
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बुधवार, 29 अप्रैल 2015
काला भृंगराज अगर न मिले तो कोई भी ले लें। पंचांग छाया में सुखाकर कूट पीसकर कपडछान कर लें और खरल में डालकर उसमें ताजे भृंगराज की पत्ती का रस इतना डालें कि चूर्ण के ऊपर चार अंगुल आ जाये अब छाया में सुखाकर खरल में खूब घोंटेँ। इसी प्रकार 21 बार रस डालें और सुखाकर घोंटे। इस क्रिया को आयुर्वेद में भावना देना कहते हैं।21 बार का भावित भृंगराज रसायन- 300 ग्रामआँवला चूर्ण 150 ग्रामबहेडा चूर्ण 100 ग्रामहरड चूर्ण 50 ग्रामतीनो गुठली रहित लें। सबको बादाम तैल 50 मिली में सानकर 600 ग्राम पिसी मिश्री मिलाकर काँच के बर्तन में रख लें।सेवन विधि-6 ग्राम चूर्ण प्रातः शाम खाकर एक पाव देशी गाय का दूध पीयें। एक सप्ताह तक खाने के बाद 3 ग्राम चूर्ण और बढाकर 9 ग्राम खाकर गाय का दूध पीयेँ। तीसरे सप्ताह 12 ग्राम उसी प्रकार खायें और दूध पीयें। इसके आगे यही मात्रा जारी रखें। अवश्यकतानुसार 3-4 महीना सेवन करना चाहिए।
लाभ- डेढ- दो माह सेवन करने पर बाल काले निकलने शुरू हो जायेगें और शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि होगी।यह एक अत्यन्त स्वास्थ्यवर्धक रसायन है जो शक्ति ,इम्यूनिटी व स्वास्थ्य संरक्षण के लिए उपयोगी होने के साथ केश और आँखों के लिए बेहद लाभप्रद है। बाल काले होकर झडना बन्द हो जाते हैं तथा जडे मजबूत होती हैँ और लम्बे समय तक काले बने रहते हैं।नेत्र ज्योति गिद्ध की तरह हो जाती है,त्वचा चमकदार हो जाती है,त्वचा के रोग दूर हो जाते हैं,नया रक्त बढता है, पेट के रोग ठीक हो जाते है,बृद्धावस्था जल्दी नहीं पकडती , शरीर बार बार बिमार नहीं पडता है। शरीर के सभी रोग दूर होते हैं इसके गुणौं का वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं शरीर का कायाकल्प कर देता है। प्रयोग करने पर इसके गुण आप स्वयं परख सकते है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाये कम है। भृंगराज हर जगह नदी तलाब और बिशेष रूप से पानी वाली जगह पर होता है। अगर ताजा न मिले तो पंसारी के यहाँ से लाकर काढा बनाकर प्रयौग करें मगर ताजा ज्यादा लाभकारी है।
स्रोत : http://ayush-irshad.blogspot.in/2015/04/blog-post_8.html
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--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!

--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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प्रतिरक्षा-इम्युनिटी-Immunity प्रतिरोधक प्रतिरोधक-Resistance प्रदर प्रमेह प्रवाहिका (पेचिश)-Dysentery प्रसव प्रसव सुरक्षा चक्र प्रसूति प्राणायाम प्रेग्नेंसी-Pregnancy प्रेमिका प्रोटीन प्रोटीन का कार्य प्रोटीन के स्रोत प्रोस्टेट ग्रन्थि-Prostate Gland प्लीहा प्लूरिसी-Pleurisy फफूंद-Fungi फरास फल फल-Fruit फाइबर फिटकरी फुंसी-Pimples फूलगोभी-CAULIFLOWER फेंफड़े फैट फोटोफोबिया फोड़ा फोड़े-Boils फोलिक एसिड-Folic Acid फ्लू फ्लू-Flu फ्लेक्स सीड्स बकायन बकुल बड़ी हरड़ बथुआ बथुआ पाउडर बथुआ-White Goose Foot बदबू बबूल-ACACIA बरसाती बीमारियाँ बरसाती बीमारियां बलगम बलवृद्धि बला बवासीर बहुमूत्रता- बांझपन बादाम-Almonds बादाम. बाल बाल झडऩा-Hair Falling बिना सिजेरियन मां बनें बीजबंद बीमारियों के अनुसार औषधियां बुखार बेल बेल – Bael बेली बैक्टीरिया ब्र​ह्मदण्डी ब्रेस्ट ग्रोथ ब्लड प्रेशर ब्लैक मेलिंग भगंदर भगंदर-Fistula-in-ano भगनासा भगोष्ठ भय भस्मक रोग भावनात्मक भुई आंवला-Phyllanthus Niruri भूई आमला भूख भूख बढ़ाने भूमि आंवला भोजनलीवर मकोय मकोय-Soleanum nigrum मंजीठ मटर-PEA मंद दृष्टि मंदाग्नि मदार मधुमेह 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