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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' आॅन लाईन होम्योपैथ एवं परम्परागत चिकित्सक, 9875066111

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शंखपुष्पी, Convolvulus Pluricaulis

(Shankhpushpi), May 2, 2016, GyanPanti Team

गुण : शंखपुष्पी दस्तावर, मेघा के लिए हितकारी, वीर्य वर्धक, मानसिक दौर्बल्य को नष्ट करने वाली, रसायन, कसैली, गर्म, तथा स्मरण शक्ति, कान्ति बल और अग्नि को बढाने वाली एवम दोष, अपस्मार, भूत, दरिद्रता, कुष्ट, कृमि तथा विष को नष्ट करने वाली होती है l यह स्वर को उत्तम करने वाली, मंगलकारी, अवस्था स्थापक तथा मानसिक रोगों को नष्ट करने वाली होती है l
परिचय : मनुष्य के मस्तिष्क पर प्रमुख क्रिया करने वाली यह वनस्पति दिमागी ताकत और याददाश्त को बढ़ाने के लिए प्रसिद्ध है।
फूलों के भेद से यह तीन प्रकार की होती है (1) सफ़ेद फूल वाली (2) लाल फूल वाली और (3) नीले फूल वाली। तीनों के गुण एक सामान है। यह बेलों के रूप में जमीं पर फैली हुई होती है और एक हाथ से ऊँची नहीं होती। यह सारे भारत में पैदा होती है। 

उपयोग :
1. दिमागी ताकत : प्राय: छात्र -छात्राओं के पत्रों में दिमागी ताकत और स्मरणशक्ति बढ़ाने के लिए गुणकारी ओषधि बताने का अनुरोध पढने को मिलता रहता है। छात्र- छात्रओं के अलावा ज्यदा दिमागी काम करने वाले सभी लोगों के लिए शंखपुष्पी का सेवन अत्यन्त गुणकारी सिद्ध हुआ है।
इसका महीन पिसा हुआ चूर्ण, एक-एक चम्मच सुबह- शाम मीठे दूध के साथ या मिश्री की चाशनी के साथ सेवन करना चाहिए।
2. शुक्रमेह : शंखपुष्पी का महीन चूर्ण एक चम्मच और पीसी हुई काली मिर्च आधी चम्मच दोनों को मिला कर पानी के साथ फाकने से शुक्रमेह रोग ठीक होता है।
3. ज्वर में प्रलाप : तेज बुखार के कारण कुछ रोगी मानसिक नियंत्रण खो देते है और अनाप सनाप बकने लगते है। एसी स्थिति में शंखपुष्पी और मिश्री को बराबर वजन में मिलाकर एक-एक चम्मच दिन में तीन या चार बार पानी के साथ देने से लाभ होता है और नींद भी अच्छी आती है।
4. उच्च रक्तचाप : उच्च रक्तचाप के रोगी को शंखपुष्पी का काढ़ा बना कर सुबह और शाम पीना चाहिए। दो कप पानी में दो चम्मच चूर्ण डालकर उबालें। जब आधा कप रह जाए उतारकर ठंडा करके छान लें। यही काढ़ा है। दो या तीन दिन तक पियें उसके बाद एक-एक चम्मच पानी के साथ लेना शुरू कर दें रक्तचाप सामान्य होने तक लेतें रहें।
5. बिस्तर में पेशाब : कुछ बच्चे बड़े हो जाने पर भी सोते हुए बिस्तर में पेशाब करने की आदत नहीं छोड़ते। ऐसे बच्चों को आधा चम्मच चूर्ण शहद में मिलाकर सुबह शाम चटा कर ऊपर से ठंडा दूध या पानी पिलाना चाहिए। यह प्रयोग लगातार एक महीनें तक करें।
6. मिर्गी में : ताजा शंखपुष्पी के पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ते) का रस 4 चम्मच शहद के साथ सुबह-शाम रोजाना सेवन करने से कुछ महीनों में मिर्गी का रोग दूर हो जाता है।
7. थायराइड-ग्रंथि के स्राव से उत्पन्न दुष्प्रभाव : शंखपुष्पी के पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ते) का चूर्ण बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिलाकर। चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से धड़कन बढ़ने, कंपन, घबराहट, अनिंद्रा (नींद ना आना) में लाभ होगा।
8. स्वरभंग : शंखपुष्पी के पत्तों को चबाकर उसका रस चूसने से बैठा हुआ गला ठीक होकर आवाज साफ निकलती है।
9. बवासीर : 1 चम्मच शंखपुष्पी का चूर्ण रोजाना 3 बार पानी के साथ कुछ दिन तक सेवन करने से बवासीर का रोग ठीक हो जाता है।
10. केशवर्द्धन हेतु : शंखपुष्पी को पकाकर तेल बनाकर रोजाना बालों मे लगाने से बाल बढ़ जाते हैं।
11. पागलपन : ताजा शंखपुष्पी के 20 मिलीलीटर पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ते) का रस 4 चम्मच की मात्रा में रोजाना सेवन करने से पागलपन का रोग बहुत कम हो जाता है।
12. बुखार में बड़बड़ाना : शंखपुष्पी के पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ते) का चूर्ण और मिश्री को मिलाकर पीस लें। इसे 1-1 चम्मच की मात्रा में पानी से रोजाना 2-3 बार सेवन करने से तेज बुखार के कारण बिगड़ा मानसिक संतुलन ठीक हो जाता है।
13. शुक्रमेह में : आधा चम्मच काली मिर्च और शंखपुष्पी का पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ते) का 1 चम्मच चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम दूध के साथ कुछ सप्ताह सेवन करने से शुक्रमेह का रोग खत्म हो जाता है।
14. स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए : 200 ग्राम शंखपुष्पी के पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ते) के चूर्ण में इतनी ही मात्रा में मिश्री और 30 ग्राम काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर पीस लें। इसे एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम रोजाना 1 कप दूध के साथ सेवन करते रहने से स्मरण शक्ति (दिमागी ताकत) बढ़ जाती है।
15. उच्च रक्तचाप : शंखपुष्पी के पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ते) का काढ़ा 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम रोजाना सेवन करते रहने से कुछ ही दिनों में उच्चरक्तचाप में लाभ मिलता है।
16. हिस्टीरिया : 100 ग्राम शंखपुष्पी, 50 ग्राम वच और 50 ग्राम ब्राह्मी को मिलाकर पीस लें। इसे 1 चम्मच की मात्रा में शहद के साथ रोज 3 बार कुछ हफ्ते तक लेने से हिस्टीरिया रोग में लाभ होता है।
17. कब्ज के लिए : 10 से 20 मिलीलीटर शंखपुष्पी के रस को लेने से शौच साफ आती हैं। रोजाना सुबह और शाम को 3 से 6 ग्राम शंखपुष्पी की जड़ का सेवन करने से कब्ज (पेट की गैस) दूर हो जाती है।
18. कमजोरी : 10 से 20 मिलीलीटर शंखपुष्पी का रस सुबह-शाम सेवन करने से कमजोरी मिट जाती है।
19. दिमाग की स्फूर्ति : ब्राह्मी और बादाम की गिरी की एक भाग ,काली मिर्च का चार भाग लेकर इनको पानी में घोटकर छोटी- छोटी गोली बनाकर एक-एक गोली नियमित रूप से दूध के साथ सेवन करने पर दिमाग की स्फूर्ति बनी रहती है।
20. स्मरण शक्ति : ब्राह्मी 2.5 ग्राम, शंखपुष्पी -2.5 ग्राम ,बादाम क़ी गिरी पांच ग्राम, छोटी इलायची का पाउडर -2.5 ग्राम, इन सब को पानी में अच्छी तरह घोलकर छान लें और मिश्री मिलाकर सुबह शाम आधा से एक गिलास पीएं…इससे खांसी, बुखार में लाभ तो मिलता ही है, साथ ही स्मरण शक्ति भी तीव्र होती है।
21. अनिद्रा : नींद न आने क़ी समस्या है तो आप ब्राह्मी का ताजा रस निकाल लें और इसे आधा लीटर गाय के कच्चे दूध में मिला लें और सात दिनों तक नियमित सेवन कर के देखें, आप तनावमुक्त होकर अच्छी नींद लेने लग जाएंगे।
22. पागलपन : ब्राह्मी के पांच मिलीग्राम स्वरस को 2.5 ग्राम कूठ के पाउडर और शहद के साथ सात दिनों तक सेवन कराने से पागलपन की बीमारी में भी लाभ मिलता है।
23. ब्राह्मी की ताजी पत्तियों का रस, बालवचा, शंखपुष्पी और कूठ को समान मात्रा में लेकर पुराने गाय के घी के साथ लगातार लेने से भी मानसिक रोगों में लाभ मिलता है।
24. यदि आपको बालों से सम्बंधित कोई समस्या है जैसे बाल झड़ रहे हों तो परेशान न हों बस ब्राह्मी के पांच अंगों का यानी पंचाग का चूर्ण लेकर एक चम्मच की मात्रा में लें और लाभ देखें।
25. बच्चों की स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए सौ ग्राम की मात्रा में ब्राह्मी, पचास ग्राम की मात्रा में शंखपुष्पी के साथ चार गुना पानी मिलाकर इसका अर्क निकाल लें और नियमित प्रयोग करें। बस ध्यान रहे कि खट्टी चीजें न खाएं आपको जल्द ही फायदा होगा।
26. यदि पेशाब में तकलीफ हो या पेशाब रूक रहा हो तो बस ब्राह्मी के दो चम्मच स्वरस में मिश्री मिलाकर दें। इससे पेशाब खुल कर आएगा।
27. यदि उच्च रक्तचाप का कोई विशेष कारण न हो तो ब्राह्मी की ताजी पत्तियों का स्वरस 2.5 मिलीग्राम मात्रा में शहद लेकर सेवन करें, इससे भी रक्तचाप नियंत्रित रहेगा। ये हैं इसके कुछ सामान्य नुस्खें, इसके अलावा भी ब्राह्मी का कई रोगों में उपयोग किया जा सकता है।
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आयुर्वेद में हर तरह के रोगों व विकारों का रामबाण इलाज यथासंभव है यह ऐलोपैथिक डॉक्टरों ने भी माना है। आयुर्वेद में वर्णित महत्वपूर्ण औषधि शंखपुष्पी (वानस्पतिक नाम: Convolvulus Pluricaulis) स्मरणशक्ति को बढ़ाकर मानसिक रोगों व मानसिक दौर्बल्यता को नष्ट करती है। इसके फूलों की आकृति शंख की भांति होने के कारण इसे शंखपुष्पी कहा गया है। इसे लैटिन में प्लेडेरा डेकूसेटा के नाम से जाना जाता है। शंखपुष्पी को स्मृतिसुधा भी कहते हैं यह एक तरह की घास होती है जो गर्मियों में अधिक फैलती है। शंखपुष्पी का पौधा हिन्दुस्तान के जंगलों में पथरीली जमीन पर पाया जाता है। शंखपुष्पी का पौधा लगभग 1 फुट ऊंचा होता है। इसकी पत्तियां 1 से 4 सेंटीमीटर लम्बी, 3 शिराओं वाली होती है, जिसको मलने पर मूली के पत्तों जैसी गंध निकलती है। शंखपुष्पी की शाखाएं और तना पतली, सफेद रोमों से युक्त होती है। पुष्पभेद से शंखपुष्पी की 3 जातियां लाल, सफेद और नीले रंग के फूलों वाली पाई जाती है। लेकिन सफेद फूल वाली शंखपुष्पी ही औषधि प्रयोग के लिए उत्तम मानी जाती है। इसमें कनेर के फूलों से मिलती-जुलती खुशबू वाले 1-2 फूल सफेद या हल्के गुलाबी रंग के लगते हैं। फल छोटे, गोल, चिकने, चमकदार भूरे रंग के लगते हैं, जिनमें भूरे या काले रंग के बीज निकलते हैं। जड़ उंगलीजैसी मोटी, चौड़ी और संकरी लगभग 1 इंच होती है। शंखपुष्पी को संस्कृत में क्षीरपुष्पी, मांगल्य कुसुमा, शंखपुष्पी, हिंदी में शंखाहुली, मराठी में शंखावड़ी, बंगाली में डाकुनी या शंखाहुली गुजराती में शंखावली और लैटिन में प्लेडेरा डेकूसेटा कहते है।
गुण :
यह एक तरह की घास होती है जो गर्मियों में अधिक फैलती है। शंखपुष्पी की जड़ को अच्छी तरह से धोकर, पत्ते, डंठल, फूल, सबको पीसकर, पानी में घोलकर, मिश्री मिलाकर, छानकर पीने से दिमाग में ताजगी और स्फूर्ति आती है। शंखपुष्पी का पौधा हिन्दुस्तान के जंगलों में पथरीली जमीन पर पाया जाता है। शंखपुष्पी का पौधा लगभग 1 फुट ऊंचा होता है। इसकी पत्तियां 1 से 4 सेंटीमीटर लम्बी, 3 शिराओं वाली होती है, जिसको मलने पर मूली के पत्तों जैसी गंध निकलती है। शंखपुष्पी की शाखाएं और तना पतली, सफेद रोमों से युक्त होती है। पुष्पभेद से शंखपुष्पी की 3 जातियां लाल, सफेद और नीले रंग के फूलों वाली पाई जाती है। लेकिन सफेद फूल वाली शंखपुष्पी ही औषधि प्रयोग के लिए उत्तम मानी जाती है।
गुण : आयुर्वेद के अनुसार : शंखपुष्पी तीखी रसवाली, चिकनी, विपाक में मीठी, स्वभाव में ठंडी, वात, पित और कफ को नाश करती है, यह चेहरे की चमक, बुद्धि, शक्तिवर्धक, याददाश्त को शक्ति बढ़ाने वाली, तेजवर्द्धक, मस्तिष्क के दोष खत्म करने वाली होती है। यह हिस्टीरिया, नींद नही आना, याददाश्त की कमी, पागलपन, मिर्गी, दस्तावर, पेट के कीड़े को खत्म करता है। शंखपुष्पी कुष्ठ रोग, विषहर, मानसिक रोग, शुक्रमेह, हाई बल्डप्रेशर, बिस्तर पर पेशाब करने की आदत में गुणकारी है। यूनानी चिकित्सा पद्धति में- शंखपुष्पी का रस बलवान होता है। नाड़ियों को ताकत देने, याददाश्त बढ़ाने, मस्तिष्क की क्रियाशीलता बढ़ाने, पागलपन, मिर्गी, शंका और नींद दूर करने की यह एक अच्छी औषधि है।

आयुर्वेद के अनुसार : शंखपुष्पी तीखी रसवाली, चिकनी, विपाक में मीठी, स्वभाव में ठंडी, वात, पित और कफ को नाश करती है, यह चेहरे की चमक, बुद्धि, शक्तिवर्धक, याददाश्त को शक्ति बढ़ाने वाली, तेजवर्द्धक, मस्तिष्क के दोष खत्म करने वाली होती है। यह हिस्टीरिया , नींद नही आना ,याददाश्त की कमी, पागलपन, मिर्गी , दस्तावर, पेट के कीड़े को खत्म करता है। शंखपुष्पी कुष्ठ रोग , विषहर, मानसिक रोग , शुक्रमेह, हाई बल्डप्रेशर , बिस्तर पर पेशाब करने की आदत में गुणकारी है।
यूनानी चिकित्सा पद्धति में- शंखपुष्पी का रस बलवान माना गया है। यह नाड़ियों को ताकत देने, याददाश्त बढ़ाने, मस्तिष्क की क्रियाशीलता बढ़ाने, पागलपन, मिर्गी, शंका और नींद दूर करने की यह एक अच्छी औषधि है।
वैज्ञानिकों के अनुसार : शंखपुष्पी की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इसका सक्रिय तत्त्व एक स्फटिकीय एल्केलाइड शंखपुष्पी होता है। इसके अतिरिक्त इसमें एक एशेंसियल ऑइल भी पाया जाता है। दिमागी शक्ति को बढ़ाने वाले उत्तम रसायनों में शंखपुष्पी को उत्तम माना जाता है। दिमागी काम करने वालों के लिए यह एक उत्तम टानिक है। मानसिक उत्तेजनाओं, तनावों को शांत करने में यह मददगार साबित हुई है।
शुद्धता की पहचान करना : श्वेत, रक्त एवं नील तीनों प्रकार के पौधों की ही मिलावट होती है । शंखपुष्पी नाम से श्वेत, पुष्प ही ग्रहण किए जाने चाहिए । नील पुष्पी नामक (कन्वांल्व्यूलस एल्सिनाइड्स) क्षुपों को भी शंखपुष्पी नाम से ग्रहणकिया जाता है जो कि त्रुटिपूर्ण है । इसके क्षुप छोटे क्रीपिंग होते हैं । मूल के ऊपर से 4 से 15 इंच लंबी अनेकों शाखाएँ निकली फैली रहती हैं । पुष्प नीले होते हैं तथा दो या तीन की संख्या में पुष्प दण्डों पर स्थित होते हैं । इसी प्रकार शंखाहुली, कालमेध (कैसकोरा डेकुसेटा) से भी इसे अलग पहचाना जाना चाहिए । अक्सर पंसारियों के पास इसकी मिलावट वाली शंखपुष्पी बहुत मिलती है । फूल तो इसके भी सफेद होते हैं पर पौधे की ऊँचाई, फैलने का क्रम, पत्तियों की व्यवस्था अलग होतीत है। नीचे पत्तियाँ लम्बी व ऊपर की छोटी होती हैं । गुण धर्म की दृष्टि से यह कुछ तो शंखपुष्पी से मिलती है पर सभी गुण इसमें नहीं होते । प्रभावी सामर्थ्य भी क्षीण अल्पकालीन होती है।
संग्रह तथा संरक्षण एवं कालावधि : छाया में सुखाए गए पंचांग को मुखंबद डिब्बों में सूखे शीतल स्थानों में रखते हैं । यह सूखी औषधि चूर्ण रूप में या ताजे स्वरस कल्क के रूप में प्रयुक्त हो सकती है । यदि संभाल कर रखी जाए तो 1 साल तक खराब नहीं होती। 
  1. शंखपुष्पी से विभिन्न रोगों में उपचार :
  2. उच्च रक्तचाप : शंखपुष्पी के पंचांग का काढ़ा 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम प्रतिदिन सेवन करते रहने से कुछ ही दिनों में उच्चरक्तचाप में लाभ मिलता है।
  3. थायराइड-ग्रंथि के स्राव से उत्पन्न दुष्प्रभाव : शंखपुष्पी के पंचांग का चूर्ण बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिलाकर 1 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से धड़कन बढ़ने, कंपन, घबराहट, अनिंद्रा (नींद ना आना) में लाभ होगा।
  4. गला बैठने पर : शंखपुष्पी के पत्तों को चबाकर उसका रस चूसने से बैठा हुआ गला ठीक होकर आवाज साफ निकलती है।
  5. बवासीर : 1 चम्मच शंखपुष्पी का चूर्ण प्रतिदिन 3 बार पानी के साथ कुछ दिन तक सेवन करने से बवासीर का रोग ठीक हो जाता है।
  6. केशवर्द्धन हेतु : शंखपुष्पी को पकाकर तेल बनाकर प्रतिदिन बालों मे लगाने से बाल बढ़ जाते हैं।
  7. हिस्टीरिया : 100 ग्राम शंखपुष्पी, 50 ग्राम वच और 50 ग्राम ब्राह्मी को मिलाकर पीस लें। इसे 1 चम्मच की मात्रा में शहद के साथ रोज 3 बार कुछ हफ्ते तक लेने से हिस्टीरिया रोग में लाभ होता है।
  8. कब्ज के लिए : 10 से 20 मिलीलीटर शंखपुष्पी के रस को लेने से शौच साफ आती हैं। प्रतिदिन सुबह और शाम को 3 से 6 ग्राम शंखपुष्पी की जड़ का सेवन करने से कब्ज (पेट की गैस) दूर हो जाती है।
  9. कमजोरी : 10 से 20 मिलीलीटर शंखपुष्पी का रस सुबह-शाम सेवन करने से कमजोरी मिट जाती है।
  10. पागलपन : ताजा शंखपुष्पी के 20 मिलीलीटर पंचांग का रस 4 चम्मच की मात्रा में प्रतिदिन सेवन करने से पागलपन का रोग बहुत कम हो जाता है।
  11. बुखार में बड़बड़ाना :शंखपुष्पी के पंचांग का चूर्ण और मिश्री को मिलाकर पीस लें। इसे 1-1 चम्मच की मात्रा में पानी से प्रतिदिन 2-3 बार सेवन करने से तेज बुखार के कारण बिगड़ा मानसिक संतुलन ठीक हो जाता है।
  12. बिस्तर में पेशाब करने की आदत : शहद में शंखपुष्पी के पंचांग का आधा चम्मच चूर्ण मिलाकर आधे कप दूध से सुबह-शाम प्रतिदिन 6 से 8 सप्ताह तक बच्चों को पिलाने से बच्चों की बिस्तर पर पेशाब करने की आदत छूट जाती है।
  13. मिर्गी में :ताजा शंखपुष्पी के पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ते) का रस 4 चम्मच शहद के साथ सुबह-शाम प्रतिदिन सेवन करने से कुछ महीनों में मिर्गी का रोग दूर हो जाता है।
  14. शुक्रमेह में : आधा चम्मच काली मिर्च और शंखपुष्पी का पंचांग का 1 चम्मच चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम दूध के साथ कुछ सप्ताह सेवन करने से शुक्रमेह का रोग खत्म हो जाता है।
  15. स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए : 200 ग्राम शंखपुष्पी के पंचांग के चूर्ण में इतनी ही मात्रा में मिश्री और 30 ग्राम काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर पीस लें। इसे एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम प्रतिदिन 1 कप दूध के साथ सेवन करते रहने से स्मरण शक्ति (दिमागी ताकत) बढ़ जाती है।
शंखपुष्पी का शर्बत घर पर कैसे बनाए :
  • सर्वप्रथम 250 ग्राम सुखी साबुत या पीसी हुई शंखपुष्पी ले और जिन्हें कब्ज हो वह 150 ग्राम शंखपुष्पी +100 ग्राम भृंगराज ले सकते है।
  • रात्रि में 1.5 लीटर (डेढ़ लीटर) पानी मे डाल दे और सुबह धीमी आग पर पकाए। यदि मिट्टी के बर्तन सुलभ हो तो उसमे पकाना अधिक गुणकारी है।
  • इसे इतना पकाए कि पानी 1/3 भाग रह जाए। बचे हुए पानी को साफ़ कपड़े से छान ले । ठंडा होने पर कपड़े मे दबा कर बाकी पानी निकाल ले और बचे हुए को किसी पेड़ के नीचे डाल दे। खाद का काम करेगा। 
  • इसके बाद प्राप्त शंखपुष्पी के काढ़े मे 1 ग्राम सोडियम बेंजोएट (SODIUM BENZOATE ) मिला दे, यह केमिस्ट के पास मिलेगा।
अब इस काढ़े को रात भर रख दे ताकि मिट्टी जैसा अंश नीचे बैठ जाएगा और अगले दिन इसमे 1 किलो खांड या मिश्री व 10 ग्राम छोटी इलायची मिलाकर धीमी आग पर पकाए। जब मीठा घुल जाए तब इसेउतार ले। ठंडा होने पर काँच या प्लास्टिक कि बोतल मे भर ले। 2 चम्मच से 4 चम्मच दूध मे मिलाकर पियें या पिलाए।
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24 Jun 2015
शंखपुष्पी – Convolvulus Pluricaulis
Posted in Daily Healthy Tips, Health By Dr. D K Goyal On June 24, 2015

शंखपुष्पी -के आयुर्वेदिक और औषधीय गुण

शंखपुष्पी– शंख के समान आकृति वाले श्वेत पुष्प होने से इसे शंखपुष्पी कहते हैं । इसे क्षीर पुष्प (दूध के समान सफेद फूल वाले) मांगल्य कुसुमा (जिसके दर्शन से मंगल माना जाता हो) भी कहते हैं । यह सारे भारत में पथरीली भूमि में जंगली रूप में पायी जाती हैं ।
शंखपुष्पी का वानस्पतिक परिचय–पुष्पभेद से शंखपुष्पी की तीन जातियाँ बताई गई हैं । श्वेत, रक्त, नील पुष्पी । इनमें से श्वेत पुष्पों वाली शंखपुष्पी ही औषधि मानी गई है । शंखपुष्पी के क्षुप प्रसरणशील, छोटे-छोटे घास के समान होते हैं । इसका मूलस्तम्भ बहुवर्षायु होता है, जिससे 10 से 30 सेण्टीमीटर लम्बी, रोमयुक्त, कुछ-कुछ उठी शाखाएँ चारों ओर फैली रहती हैं । जड़ उंगली जैसी मोटी 1-1 इंच लंबी होती है । सिरे पर चौड़ी व नीचे सकरी होती है । अंदर की छाल और लकड़ी के बीच से दूध जैसा रस निकलता है, जिसकी गंध ताजे तेल जैसी दाहक व चरपरी होती है । तना और शाखाएँ सुतली के समान पतली सफेद रोमों से भरी होती हैं । पत्तियाँ 1 से 4 सेण्टीमीटर लंबी, रेखाकार, डण्ठल रहित, तीन-तीन शिराओं से युक्त होती हैं । पत्तियों के मलवे पर मूली के पत्तों सी गंध आती है ।

फूल हल्के गुलाबी रंग के संख्या में एक या दो कनेर के फूलों से मिलती-जुलती गंध वाले होते हैं । फल छोटे-छोटे कुछ गोलाई लिए भूरे रंग के, चिकने तथा चमकदार होते हैं । बीज भूरे या काले रंग के एक ओर तीन धार वाले, दूसरी ओर ढाल वाले होते हैं । बीज के दोनों ओर सफेद रंग की झाई दिखती है । मई से दिसम्बर तक इसमें पुष्प और फल लगते हैं । शेष समय यह सूखी रहती है । गीली अवस्था में पहचानने योग्य नहीं रह पाती । श्वेत पुष्पा शंखपुष्पी के क्षुप दूसरे प्रकारों की अपेक्षा छोटे होते हैं तथा इसके पुष्प शंख की तरह आवर्त्तान्तित होते हैं ।
शंखपुष्पी की पहचान एवं मिलावट-श्वेत, रक्त एवं नील तीनों प्रकार के पौधों की ही मिलावट होती है । शंखपुष्पी नाम से श्वेत, पुष्प ही ग्रहण किए जाने चाहिए । नील पुष्पी नामक (कन्वांल्व्यूलस एल्सिनाइड्स) क्षुपों को भी शंखपुष्पी नाम से ग्रहणकिया जाता है जो कि त्रुटिपूर्ण है । इसके क्षुप छोटे क्रीपिंग होते हैं । मूल के ऊपर से 4 से 15 इंच लंबी अनेकों शाखाएँ निकली फैली रहती हैं । पुष्प नीले होते हैं तथा दो या तीन की संख्या में पुष्प दण्डों पर स्थित होते हैं । इसी प्रकार शंखाहुली, कालमेध (कैसकोरा डेकुसेटा) से भी इसे अलग पहचाना जाना चाहिए । अक्सर पंसारियों के पास इसकी मिलावट वाली शंखपुष्पी बहुत मिलती है । फूल तो इसके भी सफेद होते हैं पर पौधे की ऊँचाई, फैलने का क्रम, पत्तियों की व्यवस्था अलग होतीत है । नीचे पत्तियाँ लम्बी व ऊपर की छोटी होती हैं । गुण धर्म की दृष्टि से यह कुछ तो शंखपुष्पी से मिलती है पर सभी गुण इसमें नहीं होते। प्रभावी सामर्थ्य भी क्षीण अल्पकालीन होती है ।
शंखपुष्पी की संग्रह तथा संरक्षण एवं कालावधि–छाया में सुखाए गए पंचांग को मुखंबद डिब्बों में सूखे शीतल स्थानों में रखते हैं । यह सूखी औषधि चूर्ण रूप में या ताजे स्वरस कल्क के रूप में प्रयुक्त हो सकती है । वीर्य कालावधि 6 माह से एक वर्ष तक की है ।
शंखपुष्पी के गुण-कर्म संबंधी विभिन्न मत–इसे मेध्य (बुद्धिवर्धक), मस्तिष्क शामक एवं नाड़ी दौर्बल्य में सहायक माना गया है । महर्षि चरक ने मेध्या विशेषेण च शंखपुष्पी लिखते हुए कहा है-‘स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली औषधियों में शंखपुष्पी प्रधान है ।’ आयुर्वेद में मनुष्य के मस्तिष्क को बल देने वाली जितनी वनस्पतियाँ बतायी गई हैं, उनमें ब्राह्मी तथा शंखपुष्पी को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है ।

भाव प्रकाश के अनुसार यह मेधावर्धक, मानस रोगहन अपस्मारहन (एण्टीइपीलैप्टिक) भूतघ्न तथा विषहन है । राजनिघण्टुकार लिखते हैं-‘ग्रहभूतादिदोषहनी वशीकरण सिद्धिदा’ अर्थात् यह भूत रोग (हिस्टीरिया) मिटाकर व्यक्ति की मेधा में वृद्धि कर उसके व्यक्तित्व को सम्मोहक बनाती है । इसे अनिद्रा के लिए सर्वश्रेष्ठ औषधि माना जाता है ।

निघण्टु रतनाकर ने भी मेधा स्मृति वर्धक, कान्तिदायक, तेज बढ़ाने वाली एवं मस्तिष्क दोष हर इसे माना है । श्री भण्डारी (वनौषधि चन्द्रोदय) लिखते हैं कि शंखपुष्पी से मस्तिष्क को शांति व शक्ति मिलती है । विशेषणात्मक बुद्धि बढ़ती है । विशेषकर अल्पमंदता के लिए यह औषधि तथा मस्तिष्कीय कार्य अधिक करने वालों के लिए यह एक बलवर्धक टॉनिक है, जो सीधे स्नायु कोषों को प्रभावित करता है।

डॉ. देसाई के मतानुसार शंखपुष्पी मस्तिष्क और मज्जा तंतुओं को बल देने वाली औषधि है । डॉ. खोरी लिखते हैं कि शंखपुष्पी ज्ञान तंतुओं को बल देने वाली ‘नवाईन टॉनिक’ है । उन्माद व मानसिक कमजोरी में इसका ताजा रस तुरंत लाभ देता है ।

डॉ. डिमक का कथन है कि वेदों के समय में शंखपुष्पी गर्भाशय पर कार्य करने वाली औषधि मानी जाती थी, परन्तु बाद के समय में टीकाकारों ने मस्तिष्क पर कार्य करने वाले सूत्र भी निकाले । यूनानी मतानुसार शंखपुष्पी तर है तथा बल्य रसायन है । इसका प्रयोग स्मृतिवर्धन और मस्तिष्क तथा नाड़ियों को शक्ति देने के लिए किया जाता है । भ्रम, अनिद्रा, अपस्मार एवं उन्माद को दूर करने के लिए यूनानी वैद्य इसका प्रयोग करते हैं ।
शंखपुष्पी के रासायनिक संगठन-शंखपुष्पी से एक स्फटिकीय एल्केलाइड निकाला गया है, जिसे शंखपुष्पीन नाम दिया गया है । यही इसका सक्रिय संघटक है । इस औषधि में से एक ‘इसेन्शियल ऑइल’ भी निकाला गया है । पंचांग के किसी विशेष भाग में नहीं सारी औषधि में ही यह सक्रिय संघटक समान रूपसे वितरित पाया जाता है । इसी कारण शंखपुष्पी का पंचांग ही प्रयुक्त होता है ।
आधुनिक मत एवं वैज्ञानिक प्रयोग, निष्कर्ष-‘इण्डियन जनरल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ में डॉ. शर्मा ने शंखपुष्पी के मानसिक उत्तेजना शामक गुणों पर विस्तार से प्रकाश डाला है । इसके प्रयोग से प्रायोगिक जीवों में स्वतः होने वाली मांसपेशियों की हलचलें(स्पाण्टेनियम मोटर एक्टिविटी) घट गई । शंशपुष्पी के निष्कर्ष सेवन से चूहों में ‘फिनोबार्ब’ द्वारा उत्पन्न की गई निद्रा बढ़ गई । इनमें मार्फीन का दर्दनाशक प्रभाव भी बढ़ा । चूहों की लड़ने की प्रवृत्ति में कमी हुई तथा अंदर से आक्रामक प्रवृत्ति में शांति आयी । प्रायोगिक जीवों में विद्युत के झटकों द्वारा उत्पन्न आक्षेप (कन्वल्शन-मिर्गी जैसे झटके) तथा कंपन इस औषधि के प्रयोग के बाद शांत हो गए ।
थायराइड ग्रंथि के अतिस्राव से उत्पन्न घबराहट, अनिद्रा एवं कंपन जैसी उत्तेजनापूर्ण स्थिति में शंखपुष्पी अत्यधिक सफल पायी गई है । यह रोग अधिसंख्य जनता को अपने राष्ट्र में प्रभावित करता है। इसमें हृदय व मस्तिष्क समान रूपसे प्रभावित होते हैं । स्राव संतुलन बनाए रखना इस औषधि का प्रमुख कार्य है । बी.एच.यू. के डॉ. गुप्ता, प्रसाद व उडुप्पा के अनुसार शंखपुष्पी थायरोटॉ-क्सिकोसिस के नवीन रोगियों में आधुनिक औषधियों से अधिक लाभकारी सिद्ध हुई है । यदि किसी रोगी ने पूर्व में एलोपैथिक एण्टाथायराइड औषधि ली थी तो उस कारण उत्पन्न दुष्प्रभावों से भी शंखपुष्पी के कारण मुक्ति मिल गई ।

इन दोहरे लाभों को देखते हुए अब इस औषधि पर विस्तृत जाँच पड़ताल आरंभ कर दी गई है । सेण्ट्रल ड्रग रिसर्च इण्स्टीट्रयूट के वैज्ञानिकों ने पाया है कि यह औषधि सीधे थायराइड की कोशिकाओं पर प्रभाव डालकर स्राव व नियमन करती हैं । इसके प्रयोग से मस्तिष्क एसिटाइल कोलीन नामक महत्त्वपूर्ण न्यूरोकेमीकल की मात्रा बढ़ गई । इसका बढ़ना इस तथ्य का द्योतक है कि उत्तेजना के लिए उत्तरदायी केन्द्र शांत हो रहे है । मस्तिष्क रक्त अवरोधी झिल्ली (ब्लड-ब्रेनवैरियर) से शंखपुष्पी एसिटाइलकोलीन का मस्तिष्क से निकल कर रक्त में जाना रोकती है ।

यह उत्तेजना शामक प्रभाव रक्त चाप पर भी अनुकूल प्रभाव डालती है । प्रयोगों से पाया गया है कि भावनात्मक संक्षोभों, तनाव जन्य उच्च रक्त चाप जैसी परिस्थिति में शंखपुष्पी बड़ी लाभकारी सिद्ध होती है । आदत डालने वाले टैरक्विलाइजर्स की तुलना में यह अधिक उत्तम है, क्योंकि यह तनाव का शमन कर दुष्प्रभाव रहित निद्रा लाती है तथा हृदय परभी अवसादक प्रभाव डालती है ।

ग्राह्य अंग-पंचांग-समग्र क्षुप का चूर्ण या कल्क ताजी अवस्था में स्वरस कल्क प्रयुक्त होता है ।

मात्रा-कल्क- 10 से 20 ग्राम प्रतिदिन । चूर्ण- 3 से 6 ग्राम प्रतिदिन । स्वरस- 2 से 4 तोला प्रतिदिन ।
इस औषधि को सुबह या शाम को दो बार अथवा रोगावस्थानुसार रात्रि को ही प्रयुक्त किया जा सकता है ।
निर्धारणानुसार प्रयोग-
स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए 6 माशा शंखपुष्पी चूर्ण मिश्री की चाशनी या दूध के साथ प्रतिदिन प्रातः लेने का शास्रोक्त विधान बताया गया है । पंचांग को दूध के साथ घोंट कर भी देते हैं ।
ज्वर प्रलाप में होश खो बैठने तथा प्रलाप करने पर (डेलीरियम) मस्तिष्क को शक्ति देने तथा नींद लाने के लिए शंखपुष्पी फाण्ट रूप में या चूर्ण को मिश्री के साथ देते हैं । इसकी ठण्डाई भी प्रयुक्त की जा सकती है ।
उन्माद व अपस्मार में इसका स्वरस 20 ग्राम के लगभग मधु के साथ दिन में दो बार दिया जाता है । शय्या मूत्र का रोग जो अक्सर बच्चों को बढ़ती उम्र तक बना रहता है, (नॉक्चरनल एन्यूरेसिस) में रात्रि के समय शंखपुष्पी चूर्ण (3 ग्राम) दूध के साथ देने पर लाभ पहुँचाता है । मनोविकारों में भी इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है । जितने भी उत्तेजना कारक मनोविकार हैं, उन्हें प्रारंभिक स्थिति में ही शंखपुष्पी के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।
उच्च रक्तचाप व अन्य उत्तेजना जन्य स्थितियाँ जो उसे जन्म देती हैं, में रोकथाम के लिए एवं उपचार के लिए भी शंखपुष्पी का रस तीन समय अथवा चूर्ण दिन में दो बार देने पर आशातीत लाभ देखे जाते हैं ।
शंखपुष्पी का घृत शर्बत-सिरप भी प्रयुक्त होता है । पर इसमें योगों से बचकर एकाकी प्रयोग ही श्रेयस्कर है । अधिक से अधिक सरस्वती पंचक के रूप में प्रयोग क्षम्य है । (ब्राह्मी, शंखपुष्पी, बच, गोरखमुण्डी, शतावर) जो मेधावर्धन हेतु सिद्ध प्रयोग है ।
शंखपुष्पी के अन्य उपयोग-
यह कफ, वात शामक माना जाता है ।
वाह्य उपचारों में चर्मरोगों में तथा केशवृद्धि के लिए प्रयोग करते हैं ।
यह दीपक व पाचक है ।
पेट में गए विष को बाहर निकालने के लिए भी इसे प्रयुक्त किया जाता है ।
पेट में दर्द, वायु प्रदाह आदि में भी यह गुणकारी है ।
डॉ. प्रियव्रत के अनुसार यह हृदय रोगों, रक्तवमन आदि में लाभकारी है ।
खाँसी में भी यह लाभ पहुँचाती है गर्भाशय की दुर्बलता के कारण जिनको गर्भ धारण नहीं होता या नष्ट हो जाताहै, उनमें इसे चिर पुरातन काल से प्रयोग किया जाता रहा है ।
ज्वर-दाह में इसे शांतिदायक पेय के रूप में तथा पेशाब की जलन में डाययूरेटिक की तरह प्रयुक्त करते हैं । मस्तिष्क दौर्बल्य के अलावा यह एक सामान्य दौर्बल्य में हितकारी बल्य रसायन भी है । इसे जनरल टॉनिक के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है.
http://dkgoyal.com/%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A5%80-convolvulus-pluricaulis/

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--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!

--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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16 लाख पार पाठक संख्या पंद्रह लाख पायरिया पारिजात पालक पालक-Spinach पित्त पित्ती पिंपल-मुंहासे-Pimples-Acne पिरामिड पीलिया पीलिया-Jaundice पीलिया-कामला-Jaundice पुआड़ पुदीना पुनर्नवा-साटी-सौंटी-Punarnava पुरुष पेचिश पेट के कीड़े पेट दर्द पेट में गैस पेट रोग पेड़ पेशाब में रुकावट पेंसिल थेरेपी-Pencil Therapy पौधे पौरुष पौष्टिक रागी रोटी प्याज-Onion प्यास प्रजनन प्रतिरक्षा प्रतिरक्षा प्रणाली प्रतिरोधक प्रतिरोधक-Resistance प्रदर प्रमेह प्रवाहिका (पेचिश)-Dysentery प्रसव प्रसव सुरक्षा चक्र प्रसूति प्राणायाम प्रेग्नेंसी-Pregnancy प्रेमिका प्रोटीन प्रोटीन का कार्य प्रोटीन के स्रोत प्रोस्टेट ग्रन्थि प्लीहा प्लूरिसी-Pleurisy प्लेटलेट्स फफूंद-Fungi फरास फल फल-Fruit फाइबर फिटकरी फुंसी-Pimples फूलगोभी-CAULIFLOWER फेंफड़े फैट फोटोफोबिया फोड़ा फोड़े-Boils फोलिक एसिड फ्लू फ्लू-Flu फ्लेक्स सीड्स बकायन बकुल बड़ी हरड़ बथुआ बथुआ पाउडर बथुआ-White Goose Foot बदबू बबूल-ACACIA बरसाती बीमारियाँ बरसाती बीमारियां बलगम बलवृद्धि बला बलात्कार बवासीर बहुनिया बहुमूत्रता- बांझपन बादाम-Almonds बादाम. बाल बाल झड़ना बाल 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