प्रमेह (Spermatorrhoea): पुरुषों और विशेषकर युवकों के पौरुष का दुश्मन, लेकिन इसका इलाज संभव है!

प्रमेह पुरुषों, विशेषकर युवकों का रोग है। प्रमेह का प्रमुख कारण अजीर्ण, कब्ज एवं पाचनतंत्र की खराबी होती है। प्रेमिका या किसी युवती को याद करने या उसका स्पर्श करने, कामुक फोटो, फिल्म देखने, कामुक बातें करने आदि कारणों से ही प्रमेह से पीड़ित रोगी का वीर्यपात हो जाता है। अर्थात बिना सेक्स किये ही अपने आप वीर्य निकल जाता है। रोगी शिकायत करता है कि शौच/मलत्याग के समय या मलत्याग के समय जोर लगाने पर, विशेषकर सुबह के समय मूत्र त्याग से पहले, वीर्य/धात/धातु की कुछ बूंदें अपने आप निकल जाती हैं।

उपरोक्त कारणों से-

  1. रोगी को पिंडलियों और कमर में दर्द रहने लगता है।
  2. उसे मानसिक एवं शारीरिक दुर्बलता अनुभव होती है।
  3. किसी काम में मन नहीं लगता।
  4. हमेशा सुस्ती बनी रहती है।
  5. रोगी उनींदा सा पड़ा रहता है।
  6. याददाश्त भी कमजोर हो जाती है।
  7. बहुत जरूरी, बल्कि अत्यावश्यक कार्यों को करने का भी मन नहीं करता है।
  8. उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।
  9. स्त्री के नाम से ही उसे घबराहट होने लगती है।
  10. रोगी के मन में आशंका बनी रहती है कि वह अपनी प्रेमिका या पत्नी के साथ सेक्स कर भी पायेगा या नहीं?
  11. अधिकतर मामलों में सेक्स शुरू करने से पहले ही रोगी का वीर्यपात हो जाता है।
  12. अत्यधिक हस्तमैथुन करने और हस्तमैथुन करने के दौरान या बाद में स्वप्नदोष के बाद ऐसी स्थिति उत्पन्न होती देखी गयी है।
  13. इसके अलावा अत्यधिक नशा करने के दुष्पपरिणामस्वरूप भी इस प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

यहां समझने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि-

  1. इस प्रकार की तकलीफों से ग्रसित रोगियों के मन में अनेक तरह की आधारहीन, लेकिन उनको सच लगने वाली भ्रांतियां उनके अवचेतन मन में स्थापित हो चुकी (अंदर तक बैठ) होती हैं।
  2. किसी ऊंची इमारत को नीचे से देखने पर या ऊपर/ऊंची इमारत से नीचे देखने पर अत्यधिक डर लगने लगता है।
  3. पुल पार करते समय डर लगता है। मिठाई या नमक खाने की उत्कट (Passionate) इच्छा उत्पन्न होने लगती है।

इन सबके कारण रोगी को लगने लगता है, बल्कि उसको सच में अनुभव होता है कि-

  1. उसका वीर्य पानी जैसा पतला हो चुका है।
  2. लिंग की नशें कमजोर तथा शिथिल हो चुकी हैं।
  3. लिंग में टेढापन आ गया है।
  4. इन सबके साथ रोगी का पाचन तंत्र भी बुरी तरह से खराब हो चुका होता है।
  5. कुछ रोगियों को बवासीर/पाइल्स, फिश्चुला/भगंदर, रैक्टम कॉलैप्स/गुदाभ्रंश की समस्या भी होने लगती है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात जो मैंने अपने अनुभव में पायी है।

  1. ऐसे यौन रोगियों के मानसिक विकारों का उपचार किये बिना, उन्हें शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं किया जा सकता है।
  2. मगर बहुत कम रोगी इस बात को समझना चाहते हैं।
  3. इस कारण वे यहां-वहां लुटते-पिटते रहते हैं और अनेक तो जवानी में ही वृद्ध नजर आने लगते हैं।
  4. अत: दवाइयों के साथ-साथ रोगी की काउंसलिंग पहली जरूरत होती है। (Therefore, counseling of patients along with medicines is first required.)
  5. मगर यहां फिर से एक बड़ी समस्या यह है कि अनुभवहीनता और, या समयाभाव के कारण डॉक्टर काउंसलिंग पर ध्यान नहीं देते हैं या डॉक्टर्स को काउंसलिंग के लिये वांछित सेवाशुल्क अदा करने में रोगी असमर्थ होते हैं।

उपरोक्त प्रकार की मनोशारीरिक यौन तकलीफों से परेशान/पीड़ित पुरुषों/युवकों की संख्या छोटी नहीं है, बल्कि इनकी संख्या बहुत ज्यादा है। मैं ऐसे रोगियों का उपचार करते समय समुचित परामर्श के साथ शुद्ध देशी ऑर्गेनिक जड़ी-बूटियां, बॉयोकैमिक पाउडर्स एवं होम्योपैथिक दवाइयों का सेवन करवाता हूं।

सुखी एवं सफल दाम्पत्य जीवन के लिये मानसिक एवं शारीरिक रूप से स्वस्थ होना पहली अनिवार्य शर्त है।

अत: मानसिक रुग्ण ग्रंथियों से मुक्त हो जाने वाले, तकरीबन सभी रोगी पुरुष प्रमेह की तकलीफ से पूर्णत: स्वस्थ हो जाते हैं, जबकि मानसिक रूप से अपने आप को असाध्य या लाइलाज बीमारी के रोगी मान चुके, रोगियों को ठीक करना सबसे बड़ी चुनौती होती है। जिसके लिये दवाइयों से ज्यादा लगातार काउंसलिंग की जरूरत होती है, मगर काउंसलिंग में जो वक्त खर्च होता है, उसकी कीमत अदा नहीं कर पाने वालों में से अधिकतर हमेशा को मनोशारीरिक यौन रोगी बने रहते हैं। खुद को नपुंसक और नामर्द पुरुषों की श्रेणी में शामिल कर चुके ऐसे पुरुषों द्वारा इलाज नहीं हो पाने के लिये किसी चिकित्सक को दोषी ठहराना भी उनकी मानसिक बीमारी ही है।

लक्षणों पर आधारित/निर्वाचित होम्योपैथी की सुसंगत दवाइयों में इतनी प्रबल आरोग्यकारी ताकत होती है, जिससे बहुसंख्यक मनोरोगियों की मनोस्थिति बदली जा सकती है, लेकिन इसमें भी चिकित्सक का बहुत सा समय खर्च होता है।

याद रखने लायक अंतिम बात न तो कोई चिकित्सक मुफ्त मिल सकता है और न ही कोई चिकित्सा सम्पूर्ण होती है, क्योंकि स्वस्थ होने के लिये प्रकृति का सहयोग भी जरूरी होता है।

इस लेख का प्राथमिक और अंतिम लक्ष्य प्रमेह से पीड़ित रोगियों को तीन बातें समझाना है।

  1. पहली: प्रमेह केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक रोग भी है।

  2. दूसरी: प्रमेह का रोग लाइलाज नहीं है। और

  3. तीसरी: प्रमेह के इलाज के लिये रोगी को अपने मन में यह दृढ विश्वास होना अनिवार्य है कि वह ठीक हो सकता है। 04 अक्टूबर, 2018

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