रक्तप्रदर-Rakatpradar-Menorrhagia-Metrorrhagia (abnormal bleeding from the uterus)

 

रक्तप्रदर-Rakatpradar-Menorrhagia-Metrorrhagia (Abnormal Bleeding from the Uterus)

*लेखक:* डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा, हेल्थ परामर्श हेतु वाट्सएप नं: 8561955619 (10AM to 10PM)।

प्रत्येक 28 दिन के अंतराल पर महिलाओं में नियमित रूप से मासिक ऋतुचक्र (Menstrual Cycle) आमतौर पर 3-4 दिन तक होता है और औसतन 50 मि.ग्रा. मात्रा में प्रतिदिन दूषित रक्त निकलता है। यदि अधिक दिनों तक रजःस्राव होता रहे या अधिक मात्रा में होता रहे, तो इसे हिन्दी में रक्तप्रदर या अत्यार्तव और अंगरेजी में मेनोरेजिया (Menorrhagia) या मेट्रोरेजिया (Metrorrhagia) कहते हैं। रक्तप्रदर में माहवारी (ऋतुस्राव) के दिनों में, या माहवारी से पहले या माहवारी के बाद में गर्भाशय ये योनि के माध्यम से अधिक रक्तस्राव होता है। अधिक रक्तस्राव कारण स्त्रियों का शारीरिक सौंदर्य, आकर्षण, स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है। इसके कारण स्त्रियों को गर्भधारण करने में बहुत कठिनाई होती है और यौनानंद नष्ट हो जाता है।

रक्तप्रदर के लक्षण-Raktpradar Ke Lakshan:

1. रक्तप्रदर में माहवारी के दौरान अधिक मात्रा में रक्तस्राव होता है। माहवारी के अलावा किसी समय भी रक्तस्राव होने लगता है।
2. रक्तस्राव अधिक मात्रा में होने के कारण तेजी से शारीरिक कमजोरी तथा दुर्बलता बढ़ती जाती है। पीड़िता रोगिणी की हड्डियां दिखाई देने लगती है।
3. शारीरिक कमजोरी के कारण खड़े होने पर अचानक पीड़िता के नेत्रों के आगे अंधेरा छा जाता है। सिर में चक्कर आते है। सीढ़िया चढ़ने में बहुत कठिनाई होती है। शारीरिक श्रम के काम नहीं हो पाते। घर के कामों में बहुत थकावट अनुभव होती है।
4. पीड़िता को चक्कर आना, आंखों के सामने अंधेरा छा जाना, ज्यादा प्यास लगना, मुंह सूख जाना, नींद व आलस्य का अनुभव होना।
5. शरीर का मिजाज अधिक गर्म हो जाना और शरीर में गर्मी का अनुभव होना।
6. पीड़िता रोगिणी की त्वचा का रंग पीला या सफेद होने लगता है।
7. रक्तप्रदर के कारण रक्ताल्पता-एनीमिया (Anemia) की विकृति हो जाती है।
8. पीड़िता निम्न रक्तचाप-लॉ ब्लड प्रेशर (Low Blood Pressure) से पीड़ित हो सकती है।
9. शरीर के सभी अंगो में टूटने के सामान पीड़ा होना और जननांगो के समीप या कमर के आसपास दर्द होना।

रक्तप्रदर के कारण-Raktpradar ke Karan:

शारीरिक कारण: जहां तक रक्तप्रदर के शारीरिक कारणों का सवाल है:-

  • 1. रक्तप्रदर गर्भाशय में किसी गंभीर आंतरिक विकार का संकेत हो सकता है। जिनमें मूलत: हार्मोन असंतुलन, अन्तर्गर्भाशय-अस्थानता (Endometriosis), गर्भाशय ट्यूमर, गर्भाशय कैंसर इत्यादि।
  • 2. अधिक बच्चों को जन्म देने वाली स्त्रियां भी गर्भाशय विकृतियों के कारण रक्तप्रदर से पीड़ित हो सकती हैं।
  • 3. संभोग में अधिक संलग्न रहने वाली अत्यधिक कामुक स्त्रियां रक्त प्रदर से पीड़ित हो सकती है।
  • 4. ऋतुस्राव की विकृतियों के कारण भी रक्तप्रदर की उत्पत्ति हो सकती है।
  • 5. अधिक नशा करने, अजीर्ण, अपच और कब्जी के कारण भी रक्तप्रदर की समस्या हो सकती है।
  • 6. गर्भस्राव होने या बार-बार गर्भपात करवाने के कारण भी रक्तप्रदर की समस्या हो सकती है।

रक्तप्रदर खानपान और जीवन शैली का दुष्परिणाम:

अनेकानेक शोध, अध्ययनों तथा डॉक्टर्स की क्लीनिकल प्रेक्टिस के दौरान प्राप्त अनुभवों के अनुसार खानपान की गलत आदतों और गलत जीवन शैली के दुष्परिणामस्वरूप भी स्त्रियों को रक्तप्रदर हो सकता है। जिनमें प्रमुख निम्न हैं:-

  • 1. अधिक गर्म मिर्च-मसालों, क्षारयुक्त, लवण, अम्ल व तीक्ष्ण खाद्य पदार्थों के अधिक सेवन से शरीर में अधिक पित्त की उत्पत्ति होती है।
  • 2. पित्त की अधिकता से विकृत रक्त जब गर्भाशय में पहुंचता है तो रक्त प्रदर की उत्पत्ति करता है।
  • 3. आधुनिकता के दौर में बढ़ती हुई यौन स्वच्छंदता और अश्लील वातावरण इस रोग की अधिक उत्पत्ति का बड़ा करण है।
  • 4. किशोरावस्था से अश्लील पुस्तकें, पत्रिकाएं पढ़ने, फिल्में देखने वाली लड़कियां इस रोग से अधिक पीड़ित होती हैं।
  • 5. कुछ लड़कियां होस्टलों में रहने के कारण समलैंगिक व अप्राकृतिक यौन संबंधों के कारण युवावस्था में इस रोग की शिकार बन जाती है।
  • 6. लड़कियों में हस्तमैथुन की प्रवृति इस रोग की उत्पत्ति में बहुत बड़ा कारण माना जाता है।
  • 7. ऊंट पर सवारी करने के कारण से भी नवयुवतियां रक्तप्रदर की शिकार हो सकती हैं।
  • 8. शोक, भय, क्रोध, चिंता या द्वेष आदि मानसिक विकारों से अधिक ग्रषित रहने से भी रक्त प्रदर होने की आशंका रहती है।

पहले चिकित्सकीय परामर्श-First Doctor’s Consultation:

रक्तप्रदर से पीड़ित स्त्री को कोई भी इलाज लेने से पहले किसी अनुभवी और योग्य महिला रोग विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करना चाहिये। जिससे यह पता लगाया जा सके कि रक्तप्रदर की वजह कोई गर्भाशय की आंतरिक गंभीर विकृति तो नहीं है।

रक्तप्रदर का आयुर्वेदिक उपचार-Raktpradar ka Ayurvedic Upachar:

  • 1. आंवले के 10 ग्राम रस में शक्कर या मिश्री मिलाकर प्रतिदिन सेवन करें। आंवलों को पीसकर 10 ग्राम पाउडर को शहद में मिलाकर दिन में दो बार सेवन करें।
  • 2. 25 ग्राम आंवले के चूर्ण को रात को 100 मिलीलीटर पानी में भिगो दें। प्रातः उठकर पानी को छानकर उसमें 1 ग्राम जीरे का पाउडर और 10 ग्राम मिसरी मिलाकर पीने से रक्त प्रदर नष्ट होता है।
  • 3. आंवला, रसौत और हरड़ को बराबर मात्रा में लेकर, कूट-पीसकर पाउडर बना लें। रोजाना 5 ग्राम पाउडर जल के साथ सेवन करें।
  • 4. गाजर का 150 ग्राम रस सुबह-शाम पिएं।
  • 5. अशोक के वृक्ष की छायाशुष्क जड़ को कूट-पीसकर पाउडर बनाएं। रोजाना 3 ग्राम शहद में मिलाकर कुछ सप्ताह तक सेवन करें।
  • 6. 20 ग्राम अशोक की छाल को 300 मिलीलीटर दूध में खूब पकाएं और छानकर जब तक कि रोग ठीक न हो जाए सुबह-शाम सेवन करें।
  • 6. चावलों की धोवन में 5 ग्राम शुद्ध किया हुआ गेरू सेवन करने से रक्तप्रदर बंद हो जाता है।
  • 7. केले की कोमल जड़ का रस निकालकर, 10 ग्राम रस प्रतिदिन पीने से रक्त प्रदर नष्ट होता है।
  • 8. कुकरोंदा की 5 ग्राम जड़ को पीसकर 200 ग्राम दूध में मिलाकर पीने से रक्तप्रदर नष्ट होता है।
  • 9. चंदन का 5 ग्राम पाउडर दूध में पकाकर, 10 ग्राम घी और शक्कर मिलाकर पीने से रक्तप्रदर नष्ट होता है।
  • 10. 5 ग्राम चन्दन का पाउडर गुलाब के अर्क में मिला कर प्रयोग सेवन करें।
  • 11. हरी–दुब को धोकर पीस कर दो चम्मच रस निकालें और शहद के साथ सेवन करें।
  • 12. बबूल के गोंद को देशी गाय के घी में पकाकर पीस लें। समान मात्रा में इसमें शुद्ध किया हुआ सोना गेरू पीस कर मिला लें। इस मिश्रित पाउडर में से 5 ग्राम प्रतिदिन सुबह दूध के साथ सेवन करें।
  • 13. बरगद के दूध की 5 बूंद बताशे में रख कर खा लें। ठीक होने तक इसका सेवन सुबह शाम करें। रक्त प्रदर जल्दी ही ठीक हो जायेगा।
  • 14. रोगिणी को सिंघाड़े का हलुआ बनाकर लगातार 15 दिन तक खिलायं।रक्तप्रदर में फायदेमंद होता है।
  • 15. आँवले के बीजों की मिंगी को जल में पीसकर आधा कप पानी में घोलकर थोड़ी सी शक्कर मिलाकर 2-3 दिन पीने से उग्र रक्तप्रदर भी ठीक हो जाता है।
  • 16. गूलर का फल 20 ग्राम (जिनमें कीड़े न पड़े हों) को कूट-पीसकर 10 ग्राम शहद में मिलाकर प्रातःकाल चाटकर खाने से रक्तप्रदर ठीक हो जाता है।
  • 17. योनि की स्वच्छता हेतु जीवाणुनाशक औषधियां जल में पीसकर दिन में दो-तीन बार योनि की धुलाई करके, नियमित रूप से योनि को स्वच्छ करती रहें।

योनि की स्वच्छता एवं योनि कसावट पाउडर:

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उपचार के दौरान क्या नहीं करें और क्या नहीं खाएं?

  • 1. घी, तेल व मक्खन से बने अधिक वसायुक्त खाद्य पदार्थ न खाएं।
  • 2. गर्म मिर्च-मसालों व अम्लीय रसों से बने खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।
  • 3. यथासंभव सहवास से अलग रहें। या बहुत कम करें।
  • 4. चाय, कॉफी, तम्बाकू, गुटका व शराब का सेवन बिलकुल भी नहीं करें।
  • 5. कामुक, अश्लील फिल्मों और साहित्य से दूरी बनाकर रखें।
  • 6. मांस, मछली व अंडों का सेवन नहीं करें।
  • 7. जंक फूड, चइनीज व फास्ट फूड नहीं खाएं।

*लेखन: 24.07.2013, संपादन: 22.03.2019*
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