बवासीर/पाइल्स-Hemorrhoids/Piles

 

बवासीर गुदा मार्ग की ऊपरी या बाहरी बीमारी नहीं है। क्योंकि बवासीर का मुख्य कारण वर्षों तक कब्ज का कब्जा रहना होता है। अधिक मिर्च मसाले एवं बाजारू भोजन के कारण कब्ज उत्पन्न होने लगती है। जिसके कारण मल कठोर तथा शुष्क हो जाता है। कठोर और शुष्क मल असानी से बाहर नहीं आता है। अत: मल त्याग हेतु व्यक्ति को अधिक जोर लगाना पड़ता है। जिससे गुदा का आंतरिक हिस्सा जख्मी हो जाता है। लगातार यही स्थिति बनी रहने पर तेजी से कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं और आंतरिक तंत्रिकाएं जख्मी हो जाती हैं या फूल जाती है। जिसके चलते मस्से फूल जाते और, या गुदा से मल के साथ रक्त आने लगता है। सामान्यत: इसे ही बवासीर रोग कहा जाता है।

मुख्यत: बवासीर दो प्रकार को होता है-खूनी बवासीर और बादी बवासीर। यदि मल के साथ खून बूंद-बूंद कर आये तो उसे खूनी बवासीर कहते हैं। यदि मलद्वार के बाहर या मलद्वार के आसपास की नसों में या मलद्वार के अंदर सूजन हो और मटर या अंगूर के दानों के समान मस्से बाहर निकलने लगें या गुदा में अंदर मस्से या सोजन अनुभव होने लगे। ऐसे मस्से जो मलत्याग के समय गुदा से बाहर भी आ जाते हों। ऐसी स्थिति में मल के साथ खून न आए तो सामान्यत: इसे बादी बवासीर कहा जाता है।

जब बवासीर में मलद्वार पर मस्से निकल आते हैं और उनमें सूजन और जलन होने के साथ अधिक पीड़ा भी होती हो। बैठने-उठने पर मस्सों में तेज दर्द होता हो। उनमें से रक्त या चिकना सा पदार्थ निकलने लगे। अनेक बार बिना दर्द के भी मल के साथ या मलत्याग के बाद या उठने-बैठने पर गुदाद्वार से रक्त निकलने लगे तो सामान्यत: इसे खूनी बवासीर कहते हैं। बवासीर होने पर उचित एवं सही उपचार के अभाव में गुदाद्वार में जख्म/फोड़ा भी हो सकता है। गुदाद्वार में दरारें आ सकती हैं। जिनमें मलत्याग के समय असहनीय पीड़ा होती है। यदि बवासीर का समय रहते उचित उपचार नहीं करवाया जाये तो यह कुछ मामलों में भगंदर और, या गुदाभ्रंश में भी परिवर्तित हो सकता है।

इस असहनीय दर्दनाक पीड़ा से भयभीत होकर कुछ रोगी नासमझी में बवासीर, भगंदर या ग्रदाभ्रंश का ऑपरेशन करवा लेते हैं। इसके बाद वाकई ये तलीफें लाइलाज बन जाती हैं। ऑपरेशन के बाद, फिर ऑपरेशन यह सिलसिला। लोगों की जिंदगी को जीते जी नर्क बना देता है।

इसका भी कारण समझना जरूरी है। जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है कि बवासीर गुदा मार्ग की ऊपरी या बाहरी बीमारी नहीं है। क्योंकि बवासीर का मुख्य कारण वर्षों तक कब्ज का कब्जा रहना होता है। अधिक मिर्च मसाले एवं बाजारू भोजन के कारण कब्ज उत्पन्न होने लगती है। जिसके कारण मल कठोर तथा शुष्क हो जाता है। कठोर और शुष्क मल असानी से बाहर नहीं आता है। अत: मल त्याग हेतु व्यक्ति को अधिक जोर लगाना पड़ता है। जिससे गुदा का आंतरिक हिस्सा जख्मी हो जाता है। लगातार यही स्थिति बनी रहने पर तेजी से कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं और आंतरिक तंत्रिकाएं जख्मी हो जाती हैं या फूल जाती है। जिसके चलते मस्से फूल जाते और, या गुदा से मल के साथ रक्त आने लगता है। सामान्यत: इसे ही बवासीर रोग कहा जाता है।

इसलिये यदि कोई सामान्य विवेक का व्यक्ति भी इस बात पर विचार करेगा तो उसे आसानी से समझ में आ जायेगा कि जब तक पाचन तंत्र ठीक नहीं होगा। जब तक सख्त और कठोर मल बनना बंद नहीं होगा। बाहरी ऑपरेशन करने के बाद भी बवासीर को ठीक कैसे किया जा सकता है? यही स्थिति गुर्दे की पथरी की भी होती है। जिसको ऑपरेशन से निकाल देना समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि वास्तविक उपचार पथरी का शरीर में बनना बंद करना असली उपचार है। इसके बाद भी हमारे देश में हर दिन बवासीर के हजारों रोगियों के ऑपरेशन किये जा रहे हैं।

बवासीर का उपचार:

बवासीर से पीड़ित अधिकतर लोग शर्म-संकोच के चलते अपनी तकलीफ को परिवार के सदस्यों तक से छिपाते हैं और इधर-उधर की दवाइयां लेते रहते हैं। या किसी अनुभवी डॉक्टर से नियमित रूप से उपचार नहीं लेते हैं। अधिकतर रोगियों को तो यह बात ही समझ में नहीं आती कि वर्षों/दशकों तक पेट खराब रहने और कब्ज रहने के बाद जन्मी बवासीर की तकलीफ का बिना कब्ज को ठीक किये सफल उपचार कैसे सम्भव है?

अत: सबसे पहली जरूरत होती है, रोगी के पाचन तंत्र और कब्ज को ठीक करना। जिसके लिये पहले से कोई सुनिश्चित समय सीमा तय नहीं की जा सकती। क्योंकि रोगी का स्वस्थ होना केवल दवाइयों पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि कुछ बातें हैं, जिनके कारण उपचार में कम या अधिक समय लग सकता है। जैसे-

  1. पहले लिये गये उपचार के दुष्प्रभाव,
  2. रोगी की जीवनचर्या,
  3. खान-पान की आदतें,
  4. लीवर की स्थिति,
  5. रोगी के जीवन में चिंता-तनाव और अवसाद की स्थिति,
  6. वंशानुगत पाचनतंत्र की क्षमता,
  7. रोग प्रतिरोधक क्षमता,
  8. रोगी द्वारा दवा पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता इत्यादि।

इस सब के बावजूद अधिकतर रोगी डॉक्टर्स से इलाज की निश्चित समय सीमा तथा गारंटेड इलाज की उम्मीद करते हैं। जो व्यावहारिक एवं कानूनी तौर गलत एवं असंभव है, फिर भी रोगी की जेब से पैसे निकलवाने के चक्कर में धन के लोभी अनेक निष्ठुर तथा असंवेदनशील डॉक्टर रोगी की भाषा बोलने लगे हैं। जिसके परिणाम या दुष्परिणाम ऐसे गारंटी मांगने वाले रोगी ही जानते हैं।

मेरा अनुभव तो यही है कि बवासीर का मूल कब्ज है।

अत: बवासीर के उपचार के लिये सबसे पहले कब्ज को ठीक करने के लिये सरल, सौम्य तथा उचित दवाइयों का, उचित मात्रा में स्वस्थ होने तक नियमित रूप ये सेवन करना पहली और अंतिम जरूरत है। ठीक होना या नहीं होना, डॉक्टर, रोगी तथा रोग की स्थिति एवं दवाइयों के साथ-साथ प्रकृति पर भी निर्भर करता है। क्योंकि अंतिम सत्य यही है कि डॉक्टर केवल दवाई देता है, रोगी को पूर्णत: स्वस्थ प्रकृति ही करती है।

 

Written on-07.06.2018.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *