कचनार-Bauhinia Purpurea-Butterfly-Mountain Ebony

 

कचनार-Bauhinia Purpurea-Butterfly-Mountain Ebony

परिचय:

  • 1. कचनार का पेड़ सभी देशों में पाया जाता है। बागों की सुन्दरता बढ़ाने के लिए यह पेड़ विशेष रूप से लगाया जाता है।
  • 2. कचनार का पेड़ 8 फीट तक उंचा हो जाता है। कही—कहीं 15 से 20 फीट ऊँचाई तक का भी देखा जा सकता है। पेड़ झुका हुआ होता है। इसकी शाखाएं कमजोर होती हैं।
  • 3. पत्ते: इसके पत्ते 3 से 6 इंच लंबे व 2 से 5 इंच चौडे़ होते हैं। इसके पत्ते शुरू में जुड़े व किनारों पर खुले होते हैं जो हृदय के आकार का होता है और पत्ते में 9 से 11 शिराएं होती हैं।
  • 4. छाल: इसकी छाल लगभग 1 इंच मोटी, भूरे रंग की होती है जो लम्बाई में जगह-जगह फटी होती है। इसकी शाखा की छाल ले। तने की न ले। उस शाखा (टहनी) की छाल लें जो 1 इंच से 2 इंच तक मोटी हो। बहुत पतली या मोटी टहनी की छाल न ले। इसके तने की छाल भी दवा के काम आती है, इसमें शर्करा और टैनिन्स की बहुत मात्रा पायी जाती है। साथ ही मिर्सीताल और ग्लाइकोसाइड भी मौजूद है।
  • 5. कलियां और फूल: इस पेड़ की फूल की कलियां हरी होती है और फूल बनने पर सफेद, लाल या पीले रंग के हो जाती हैं। फूल इतना अधिक उपयोगी है कि यदि पूरा देश जान जाये कि फूल किस रोग की दवा है तो कचनार के पेड़ों पर एक भी फूल देखने का शेष नहीं बच सकता।
  • 6. फूलों का समय: पतझड़ के समय अर्थात फरवरी-मार्च में पेड़ पर फूल लगते हैं और मई में फल लगते हैं। इसके फली 6 से 12 इंच लंबी, 1 इंच चौड़ी, चपटी व चिकनी होती है, जिसमें 10-15 बीज होते हैं। फल स्वाद में कड़वे होते हैं।
  • 7. प्रकार: कचनार का पेड़ रंगों के आधार पर तीन प्रकार के होते हैं।
  • 8. पहचान: इसकी सबसे बड़ी पहचान है–सिरे पर से काटा हुआ पत्ता।

विभिन्न भाषाओं में नाम:

  • 1. हिन्दी-कचनार।
  • 2. गुजराती-चंपाकाटी।
  • 3. बंगाली-कांचन।
  • 3. मराठी-कांचन, कोरल।
  • 4. संस्कृत-काचनार।
  • 5. अंग्रेजी-माउण्टेन एबोनी।
  • 6. लैटिन-बाहिनिआ वेरिएगेटा।

वैज्ञानिक मत:

रासायनिक तत्त्व: कचनार के रासायनिक तत्त्वों का विश्लेषण करने पर पता चला है कि इसकी छाल में टैनिन (कषाय द्रव्य), शर्करा और एक भूरे रंग का गोंद होता है। इसके बीजों से 16.5 प्रतिशत की मात्रा में पीले रंग का तेल निकलता है। कचनार का बीज पौष्टित और उत्तेजक (कामोद्दीक) होता है।

रंग: कचनार सफेद रंग की होती है।

स्वाद: कचनार का स्वाद कषैला होता है।

स्वरूप: कचनार एक पेड़ है जो बागों और फूल की क्यारियों में उगाई जाती हैं। कचनार के पत्ते, छिलके पत्ते या लसोहड़ा के पत्ते के समान होते हैं परन्तु इसके पत्ते 1 या 2 जोड़ों में होते हैं। इसके फूल सफेद व लाल रंग के होते हैं और फली 6 से 12 इंच लंबी होती है।

प्रकृति: कचनार रूखा होता है।

हानिकारक: कचनार देर से हजम होती है और कब्ज पैदा करती है।

उपयोग हेतु मात्रा:
छाल: छाल का चूर्ण 3 से 6 ग्राम।
फूलों का रस: फूलों का रस 10 से 20 मिलीलीटर।
छाल का काढ़ा: छाल का काढ़ा 40 से 80 मिलीलीटर।

कचनार के औषधीय उपयोग-Medicinal Uses of Kanchanar:

1-गांठ कहीं भी हो: शरीर में कहीं भी और किसी भी प्रकार की गांठ (Lump) हो। चाहे गांठ कैंसर (Cancer) की भी क्यों न हो उसके लिए है कचनार की चिकित्सा सफल जरूर होती है। कचनार की छाल और गोरखमुंडी लें। यदि कचनार की छाल ताजी लें तो अधिक लाभदायक है। कचनार का पेड़ हर जगह आसानी से मिल जाता है। सेवन विधि: कचनार की ताजी छाल 25-30 ग्राम (सूखी छाल 15 ग्राम) को मोटा-मोटा कूट लें। इसे 1 गिलास (150ml) पानी में उबाले। जब 2 मिनट उबल जाए तब इसमें 1 चम्मच (Tea Spoon) गोरखमुंडी (मोटी कुटी या पीसी हुई) डाल कर मिला लें। इसे 1 मिनट तक उबलने दें। इसके बाद इसे छान लें। हल्का गरम-गुनगुना रह जाए, तब इसे सिप-सिप (धीरे-धीरे) करके तब पी लें। ध्यान रहे यह कड़वा होता है, परंतु गाँठ के इलाज में चमत्कारी है। गांठ कैसी भी हो, प्रोस्टेट बढ़ी हुई हो, जांघ के पास की गांठ हो, काँख की गांठ हो, गले के बाहर की गांठ हो, गर्भाशय की गांठ हो, स्त्री पुरुष के स्तनो मे गांठ हो या टॉन्सिल हो, गले में थायराइड ग्लैण्ड बढ़ गई हो (Goiter) या LIPOMA (फैट की गांठ) हो, इसके सेवन से लाभ जरूर होता है। यह इलाज कभी भी असफल नहीं होता। अधिक लाभ के लिए दिन में 2 बार लें। लंबे समय तक लेने से ही लाभ होगा। शुरूआती 20-25 दिन तक कोई लाभ नहीं होगा। अत: निराश होकर बीच में न छोड़ें। गाँठ को घोलने में कचनार पेड़ की छाल बहुत अच्छा काम करती है। आयुर्वेद में कचनार गुग्गुल इसी मकसद के लिये दी जाती हैं। जबकि आधुनिक ऐलोपैथी चिकित्सा में गांठ से निजात दिलाने हेतु शल्य चिकित्सा (ऑपरेशन) के सिवाय और चारा नहीं होता है।

2-घाव-Wound: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से घाव ठीक हो जाता है। इसके काढ़े (Decoction) से घाव (Wound) को धोना भी चाहिए।

3-गले में गांठ: गले की कोई भी ग्रंथि (Gland) बढ़ जाने पर कचनार के फूल या छाल का चूर्ण चावलों के धोवन में पीस कर, उसमें सोंठ मिलकर लेप भी किया जाये और साथ ही इसे पिया भी जा सकता है।

4-स्तनों की गांठ (रसूली): कचनार की छाल को पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण लगभग आधे ग्राम की मात्रा में सौंठ और चावल के पानी (धोवन) के साथ मिलाकर पीने और स्तनों पर लेप करने से गांठ ठीक हो जाती है।

5-सूजन: कचनार की जड़ को पानी में घिसकर लेप बना लें और इसे गर्म कर लें। इसके गर्म-गर्म लेप को सूजन पर लगाने से आराम मिलता है।

6-मुंह के छाले: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर, उसमें थोड़ा-सा कत्था मिलाकर छालों पर लगाने से आराम मिलता है। मुंह के छाले किसी दवा से ठीक न हो रहे हों तो कचनार की छाल के काढ़े से गरारे और कुल्ला कीजिए, फिर देखिये चमत्कार।

7-प्रमेह: कचनार की हरी व सूखी कलियों का चूर्ण और मिश्री मिलाकर प्रयोग किया जाता है। इसके चूर्ण और मिश्री को समान मात्रा में मिलाकर 1-1चम्मच दिन में तीन बार कुछ हफ्ते तक खाने से प्रमेह रोग में लाभ होता है।

8-भूख न लगना: कचनार की फूल की कलियां घी में भूनकर सुबह-शाम खाने से भूख बढ़ती है।

9-लीवर-Liver: लीवर में किसी भी प्रकार की कोई भी तकलीफ हो तो रोगी को कचनार की जड़ का काढ़ा पिलाया जा सकता है।

10-गैस: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर, इसके 20 मिलीलीटर काढ़ा में आधा चम्मच पिसी हुई अजवायन मिलाकर प्रयोग करने से लाभ मिलता है। सुबह-शाम भोजन करने बाद इसका सेवन करने से अफरा-अफारा-आफरा (पेट फूलना) व गैस की तकलीफ दूर होती है।

11-अफरा-अफारा-आफरा: (पेट में गैस बनना) कचनार की जड़ का काढ़ा बनाकर सेवन करने से अफारा दूर होता है।

12-खांसी और दमा: शहद के साथ कचनार की छाल का काढ़ा 2 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन करने से खांसी और दमा में आराम मिलता है।

13-दांत रोग:

  • (1) दंत मंजन: कचनार के पेड़ की छाल को आग में जलाकर उसकी राख को बारीक पीसकर मंजन बना लें। इस मंजन से सुबह एवं रात को खाना खाने के बाद मंजन करने से दांतों का दर्द तथा मसूढ़ों से खून का निकलना बंद होता है। कचनार की टहनियों की राख से मंजन करेंगे तो दांतों में दर्द कभी नहीं होगा, अगर पहले से हो रहा होगा तो खत्म हो जायेगा।
  • (2) कचनार की छाल को जलाकर उसके राख को पीसकर मंजन बना लें। इससे मंजन करने से दांत का दर्द और मसूड़ों से खून का निकलना बंद होता है।
  • (3) कचनार की छाल को पानी में उबाल लें और उस उबले पानी को छानकर एक शीशी में बंद करके रख लें। यह पानी 50-50 मिलीलीटर की मात्रा में गर्म करके रोजाना 3 बार कुल्ला करें। इससे दांतों का हिलना, दर्द, खून निकलना, मसूढों की सूजन और पायरिया खत्म हो जाता है।

14-जीभ व त्वचा का सुन्न होना: कचनार की छाल का चूर्ण बनाकर 2 से 4 ग्राम की मात्रा में खाने से रोग में लाभ होता है। इसका प्रयोग रोजाना सुबह-शाम करने से त्वचा एवं रस ग्रंथियों की क्रिया ठीक हो जाती है। त्वचा की सुन्नता दूर होती है।

15-गुलकंद: यदि आसानी से उपलब्ध हो सके तो आप इसकी कलियों का गुलकंद बनाकर रख लीजियेगा। बड़ा काम आता है, बिना रोग के भी खाने में भी बहुत मजेदार होता है।

16-कब्ज-Constipation: कचनार के फूलों को चीनी के साथ घोटकर शर्बत की तरह बनाकर सुबह-शाम पीने से कब्ज दूर होती है और मल साफ होता है।
कचनार के फूलों का गुलकन्द रात में सोने से पहले 2 चम्मच की मात्रा में कुछ दिनों तक सेवन करने से कब्ज दूर होती है।

17-दस्त: (दस्त का बार-बार आना) कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर दिन में 2 बार पीने से दस्त रोग में ठीक होता है।

18-खूनी पेचिश-Bloody Dysentery: खूनी आंव हो रहे हों तो कचनार का एक—एक फूल सुबह, दोपहर, शाम धीमे—धीमे 2—3 दिनों तक चबाएं आराम हो जायेगा।

19-पेशाब में खून आना: कचनार के फूलों का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद होता है। इसके सेवन से रक्त प्रदर एवं रक्तस्राव आदि भी ठीक होता है।

20-बवासीर-अर्श-हेमोरोइड्स-Hemorrhoids-Piles:

  • (1) कचनार की छाल का चूर्ण बना लें और यह चूर्ण 3 ग्राम की मात्रा में एक गिलास छाछ के साथ लें। इसका सेवन प्रतिदिन सुबह-शाम करने से बवासीर एवं खूनी बवासीर में बहुत लाभ मिलता है।
  • (2) कचनार का चूर्ण 5 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह पानी के साथ खाने से बवासीर ठीक होता है।
  • (3) खूनी दस्त-दस्त के साथ खून आने पर कचनार के फूल का काढ़ा सुबह-शाम सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से खूनी दस्त (रक्तातिसार) में जल्दी लाभ मिलता है।
  • (4) खूनी बवासीर में कचनार की कलियों के पावडर को मक्खन और शक्कर मिलाकर लगातार कम से कम 11 दिन तक खाएं।

21-कैंसर-कर्क-कर्कट-करकट-Cancer: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से पेट का कैंसर ठीक होता है।

22-तोंद-Belly: तोंद निकल रही हो तो आधा चम्मच अजवाइन को कचनार की जड़ के साथ पीसकर काढ़ा बनाकर 10-11 दिन तक पीने से तोंद कम हो जायेगी।

23-रक्तपित्त-Blood Vessel (Bleeding Within the Body Without any Evidence of Injury):

  • (1) कचनार के फूलों का चूर्ण बनाकर, 1 से 2 ग्राम चूर्ण सुबह-शाम चटाने से रक्त पित्त का रोग ठीक होता है। कचनार का साग खाने से भी रक्त पित्त में आराम मिलता है।
  • (2) यदि मुंह से खून आता हो तो कचनार के पत्तों का रस 6 ग्राम की मात्रा में पीएं। इसके सेवन से मुंह से खून का आना बंद हो जाता है।
  • (3) कचनार के सूखे फूलों का चूर्ण बनाकर लें और यह चूर्ण एक चम्मच की मात्रा में शहद के साथ दिन में 3 बार सेवन करें। इसके सेवन से रक्तपित्त में लाभ होता है। इसके फूलों की सब्जी बनाकर खाने से भी खून का विकार (खून की खराबी) दूर होता है।

24-कुबड़ापन-Hump-Kyphosis:

  • (1) अगर कुबड़ापन का रोग बच्चों में हो तो उसके पीठ के नीचे कचनार का फूल बिछाकर सुलाने से कुबड़ापन दूर होता है।
  • (2) लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग कचनार और गुग्गुल को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से कुबड़ापन दूर होता है।
  • (3) कुबड़ापन के दूर करने के लिए कचनार का काढ़ा बनाकर सेवन करना चाहिए।
  • (4) अगर कुबडापन हो तो बच्चे को इसकी छाल के काढ़े में प्रवाल भस्म मिला कर पिलानी चाहिए।

25-आंतों के कीड़े-Intestinal Worms: पीले कचनार के पेड़ की छाल का काढा आंतो के कीड़े को मार देता है। कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि आँतों में कीड़े हों तो किसी भी कचनार की छाल का काढा 10-11 दिनों तक पीने से कीड़े मर जाते हैं।

26-रक्त प्रदर: जिन महिलाओं को रक्त प्रदर में इसकी कलियों के काढ़े में शहद मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।

27-उपंदश (गर्मी का रोग या सिफिलिस): कचनार की छाल, इन्द्रायण की जड़, बबूल की फली, छोटी कटेरी के जड़ व पत्ते और पुराना गुड़ 125 ग्राम। इन सभी को 2.80 किलोग्राम पानी में मिलाकर मिट्टी के बर्तन में पकाएं और यह पकते-पकते जब थोड़ा सा (1/4) बचे तो इसे उतारकर छान लें। अब इसे एक बोतल में बंद करके रख लें और सुबह-शाम सेवन करें।

28-सिर का फोड़ा: कचनार की छाल, वरना की जड़ और सौंठ को मिलाकर काढ़ा बना लें। यह काढ़ा लगभग 20 से 40 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पीना चाहिए। इसके सेवन से फोड़ा पक जाता है और ठीक हो जाता है। इसके काढ़े को फोड़े पर लगाने से भी लाभ होता है।

29-चेचक (मसूरिका): कचनार की छाल के काढ़ा बनाकर उसमें सोने की राख डालकर सुबह-शाम रोगी को पिलाने से लाभ होता है।

30-रक्त शुद्ध: रक्त शुद्ध करने के लिए कचनार की कलियों का काढा पिलाया जा सकता है।

31-गण्डमाला की गाँठें (Goitre): गले में दूषित हुआ वात, कफ और मेद गले के पीछे की नसों में रहकर क्रम से धीरे-धीरे अपने-अपने लक्षणों से युक्त ऐसी गाँठें उत्पन्न करते हैं, जिन्हें गण्डमाला कहा जाता है। मेद और कफ से बगल, कन्धे, गर्दन, गले एवं जाँघों के मूल में छोटे-छोटे बेर जैसी अथवा बड़े बेर जैसी बहुत-सी गाँठें जो बहुत दिनों में धीरे-धीरे पकती हैं उन गाँठों की हारमाला को गंडमाला कहते हैं और ऐसी गाँठें कंठ पर होने से कंठमाला कही जाती है। गले की गांठ में कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर, इसके 20 ग्राम काढ़े में सोंठ मिलाकर आधे कप की मात्रा में दिन में 3 बार पीने से गले की गांठ ठीक होती है। कंठमाला में कचनार की छाल को पीसकर, चावलों के पानी में डालकर उसमे मिश्री मिलाकर पीने से कण्ठामाला (गले की गांठे) ठीक हो जाती हैं। क्रौंच के बीज को घिस कर दो तीन बार लेप करने तथा गोरखमुण्डी के पत्तों का आठ-आठ तोला रस रोज पीने से गण्डमाला (कंठमाला) में लाभ होता है। रोगी कफवर्धक पदार्थ न खायें।

32-गलकोष प्रदाह (गलकोष की सूजन): खैर (कत्था) के फल, दाड़िम पुष्प और कचनार की छाल। इन तीनों को मिलाकर काढ़ा बना लें और इससे सुबह-शाम गरारा करने से गले की सूजन मिटती है। सिनुआर के सूखे पत्ते को धूम्रपान की तरह प्रयोग करने से भी रोग में आराम मिलता है।

33-गला बैठना: कचनार के पत्ते या फूल मुंह में रखकर चबाने या चूसने से गला साफ होता है। इसको चबाने से आवाज मधुर (मीठी) होती है और यह गाना गाने वाले व्यक्ति के लिए विशेष रूप से लाभकारी है।

34-थाईरायड और कुबड़ेपन: थाईरायड और कुबड़ेपन का इलाज कचनार से किया जा सकता है। कचनार के फूल थाईरायड की सबसे अच्छी दवा है। यदि किसी को हाइपो हो गया हाइपर थायराइड-थाइरोइड-hyper thyroid हो तो कचनार के तीन फूलों की सब्जी या पकौड़ी बनाकर सुबह-शाम नियमित रूप से खाएं और 2 माह बाद टेस्ट कराएँ।

35-कोढ़-Leprosy: इसकी छाल के काढ़े में बावची के तेल की 20-25 बूंदे मिलाकर रोज पीने से बहुत पुराना कोढ़ भी खत्म हो जाता है।

लेखन: 03.05.2012, संपादन: 04.04.2019

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