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स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं करें, तुरंत स्थानीय डॉक्टर (Local Doctor) से सम्पर्क करें। हां यदि आप स्थानीय डॉक्टर्स से इलाज करवाकर थक चुके हैं, तो आप मेरे निम्न हेल्थ वाट्सएप पर अपनी बीमारी की डिटेल और अपना नाम-पता लिखकर भेजें और घर बैठे आॅन लाइन स्वास्थ्य परामर्श प्राप्त करें।

Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)

Health Care Friend and Marital Dispute Consultant

(स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ),

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अपराजिता Clitoria Ternatea क्लीटोरिया टरनेटा: 2 माह में सफ़ेद दाग और 2 दिन में पीलिया रोग जड़ से खत्म कर सकता है।

सफेद दाग: अगर आप अपने बदन पर सफ़ेद दागों की समस्या से पीड़ित हैं तो अपराजिता की जड़ 20 ग्राम अपराजिता की जड़ एक ग्राम को आपस में पानी के साथ पीस ले। इसका सफेद दागों पर लेप लगाने से किसी तरह के सफ़ेद दाग 2 माह में ठीक हो जाते हैं। इसके साथ ही अपराजिता के बीजों को भून कर घी में मिलाकर सेवन करने से बहुत ही जल्दी लाभ होता है।

पीलिया: अगर आप पीलिया से पीड़ित हैं तो अपराजिता के भुने हुए बीजों के आधा ग्राम चूर्ण को गर्म पानी से दिन में दो बार फंकी लेने/सेवन करने से मात्र 2 दिन में पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
सिजेरियन क्यों? जब संभव है-नॉर्मल डिलेवरी!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-85619-55619

प्रकृति के अनुक्रम के अनुसार सभी नवदम्पत्तियों को सन्तान सुख की चाहत होती है। मगर विज्ञान की प्रगति के उपरांत भी करीब 40% प्रसव सिजेरियन होने लगे हैं। सिजेरियन प्रसव के जरिये मां बनने वाली माताओं का प्रसव के बाद का जीवन जहां शारीरिक एवं मानसिक रूप से अनंत अनचाही पीड़ाओं का कारण बन जाता है। वहीं सिजेरियन प्रसव स्त्री की शारीरिक कुरूपता को भी जन्म देता है। जिसका स्त्री के मन पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। सी-सेक्शन प्रसव के बाद भी बहुत सारी महिलाओं के जीवन में यौन-सम्बन्ध पीड़ादायक अहसास बन जाते हैं।


सिजेरियन से बचने हेतु गर्भ-धारण करते ही प्रसव सुरक्षा चक्र अपनाएं।

विस्तार से जानकारी हेतु निम्न लिंक्स पर क्लिक करें:

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http://www.healthcarefriend.in/2018/05/pregnancy-safe-guard.html

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भूई आंवला (Phyllanthus Niruri or Chanca Piedra): हेपेटाईटिस, लीवर सिरोसिस, किडनी संक्रमण, हाई बीपी, पथरी सहित अनेक रोगों की एक महान औषधि

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-85619-55619

बरसात के दिनों में बहुतायत में जंगल में उगने वाला पौधा 'भूई आंवला' अनेक रोग नाशक एक महा औषधि है। (Bhui Amla is a Multi-disease curable Great medicine) दु:ख का विषय है कि अज्ञानतावश किसानों द्वारा इसे नष्ट कर दिया जाता है। खोद कर फैं क दिया जाता है।



जबकि भूई आंवला का किसी योग्य डॉक्टर की देखरेख में, उचित मात्रा में, निर्धारत समय तक सेवन करने पर बहुत सी लाइलाज/असाध्य (Incurable) समझी जाने वाली बीमारियों से मुक्ति पायी जा सकती है। लेकिन भूई आंवला ताजा, शुद्ध और 100 फीसदी आॅर्गेनिक होगा तो ही सही तथा वांछित परिणाम मिल पायेंगे।

फसलों में कीटनाशक तथा कैमीकलयुक्त खाद का उपयोग करने के कारण खेतों में पैदा होने वाले भूई आंवला के गुण कम, प्रदूषित या समाप्त हो सकते हैं। भूई आंवला की आॅर्गेनिक खेती करने पर तुलनात्मक रूप से किसान को बहुत कम उत्पादन मिलता है। यही मूल वजह है कि शुद्ध आॅर्गेनिक भूई आंवला की कीमत कई गुणी बढ जाती है, लेकिन आॅर्गेनिक खेती करने पर इसकी गुणवत्ता 100 फीसदी अक्षुण्ण अर्थात बरकरार (Quality intact) रहती है।

शुद्ध, आॅर्गेनिक तथा ताजा भूई आंवला/आमला पाउडर का किसी भी रूप में सेवन करने पर श्रेृष्ठ तथा जल्दी परिणाम मिलते हैं। जिसकी पुष्टि मेरे निजी अनुभव के साथ-साथ अनेक समर्पित चिकित्सकों ने भी की है।

आमतौर पर बरसात के मौसम में भूई आंवला खेतों में बहुतायत में पाया जाता है, लेकिन खेती में खरपतवार नाशक दवाईयों के बेरोकटोक उपयोग के कारण यह अमूल्य औषधि लगातार नष्ट होती जा रही है। इसी वजह से हमारे द्वारा शुद्ध आॅर्गेनिक भूई आंवला प्राप्त करने के लिये सीमित मात्रा में इसकी आॅर्गेनिक खेती की जा रही है। जिससे हम अपने रोगियों को शुद्ध आॅर्गेनिक भूई आंवला पाउडर उपलब्ध करवाने में समर्थ और सफल हो पाये हैं। अनेक बार किन्हीं गम्भीर रोगियों के उपचार हेतु बहुत जरूरी होने पर कुछ मित्र चिकित्सकों को भी अत्यल्प मात्रा (Minimal quantity) में ताजा और शुद्ध आॅर्गेनिक भूई आंवला पाउडर उपलब्ध करवाने की कोशिश की जाती रही थी। आने वाले दिनों में इसका उत्पादन बढाये जाने की उम्मीद है। अभी तक के अनुभवों के अनुसार शुद्ध आॅर्गेनिक भूई आंवला निम्न तकलीफों/बीमारियों में कारगर सिद्ध हुआ है:-

1-अद्भुत दर्द निवारक/Wonderful Painkillers:
शोध प्रमाणित करते हैं कि वास्तव में भूई आंवला पौधे की जड़ें शक्तिशाली दर्द अवरुद्ध/दर्द निवारण करने वाले एजेंट्स हैं जो मॉर्फिन से 3 गुना अधिक शक्तिशाली हैं। अत: इसे किसी भी प्रकार के दर्द के निवारण के लिये उपयोग किया जा सकता है। यही वजह है कि शुद्ध आॅर्गेनिक भूई आंवला जिद्दी और लाइलाज गठिया, आमवात और जोड़ों के दर्द से मुक्ति दिलाने में उपयोगी सिद्ध हुआ है।

2-गुर्दे और पित्ताशय की पथरी ब्रेकर या पथरी विनाशक (Kidney and gallbladder stone Breaker or Destroyer):
भूई आमला के इसी पथरी विनाशक अद्भुत गुण के कारण इसे Stone Breaker/स्टोन ब्रेकर नाम से भी जाना जाता है। हमारा अपना अनुभव है कि कुछ अन्य ताजा एवं 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियों के साथ इसका नियमित उपयोग करने से पथरी टूटकर/गलकर आराम से निकल जाती है। (A study in German showed that people with gallstones that were given Stone Breaker for 2 weeks were completely healed of gallstones 94% of the time… amazing!)

3-प्रतिरक्षा प्रणाली वर्धक और एंटीऑक्सिडेंट-प्रतिउपचायक:
भूई आंवला हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ा देता है (Boosts up our Immune System), एंटीऑक्सिडेंट-प्रतिउपचायक (Antioxidant) का काम करता है। साथ ही यह यह एक अच्छा रोगाणुरोधक एजेंट भी (It’s a good antimicrobial agent too) है। इन सब गुणों के कारण एक स्वस्थ व्यक्ति द्वारा भी भूई आंवला का नियमित सेवन करने से उसकी रोगों से लड़ने की ताकत बढ जाती है। यही वजह है कि इसके सेवन से रोगी में हेपेटाइटिस, एचआईवी-पॉजेटिव, लीवर सिरोसिस, संक्रमित लीवर, संक्रमित किडनी जैसे रोगों से लड़ने की ताकत कई गुणा बढोतरी हो जाती है।

4-श्रृेष्ठ डीटॉक्स (Superior Detox):
भूई आंवला को श्रृेष्ठतम डीटॉक्स के नाम से भी जाना जाता है। जिसे आम बोलचाल में हम गुर्दे, यकृत, आंतों सहित शरीर की आंतरिक सफाई करने वाली श्रृेष्ठ दवाई कह सकते हैं। यही वजह है कि यह हेपेटाइटिस, गैस्ट्रिक अल्सर, फैटी लीवर, मूत्रपथ संक्रमण, एचआईवी आदि से लड़कर, इन्हें स्वस्थ करने में मदद करता है।

5-रक्तचाप और रक्त शर्करा को कम करता है (Bhui Amla/Anvla Lowers Blood Pressure and also may help in Lowering Blood Sugar Levels):
भूई आंवला का सेवन करने से उच्च रक्तचाप कम होकर हाई ब्लड प्रेशर और रक्त में शर्करा के कम होने से मधुमेह/डायबिटीज रोग से मुक्ति मिलती है।

6-लीवर एवं गुर्दा संरक्षक (Liver and Kidney Protector or Guard): 
साधारण भाषा में भूई आंवला को लीवर एवं किडनी का संरक्षक और सुरक्षा गार्ड भी कहा जा सकता है। क्योंकि यह एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट (Powerful Antioxidant तथा रोगाणुरोधक एजेंट (Antimicrobial Agent) होने के साथ-साथ, इसमें शक्तिशाली उपचारक गुण (Powerful Healing Qualities) भी हैं। यही वजह है कि यह मूत्रपथ, जिगर/यकृत और गुर्दों की सफाई करने में सक्षम होता है। अध्ययनों से पता चलता है कि भूई आंवला शराब के सेवन से क्षतिग्रस्त होने वाले यकृतों को पुनर्जीवित करता है और फैटी लीवर की बीमारी से पीड़ित लोगों को भी मदद करता है। यह मूत्र पथ के संक्रमण को खत्म करने में मदद करता है। 

(Studies show that Bhui aamla revitalize livers damaged by alcohol intake. Bui Amla have powerful healing qualities including detoxing, liver cleansing, breakdown of gallbladder and kidney stones, it’s a powerful antioxidant, great for pain, great for hepatitis and HIV, and it’s a good antimicrobial agent too.) इस प्रकार बिना किसी बीमारी के भी यदि भूई आंवला का सेवन किया जाये तो सम्पूर्ण पाचन संस्थान और मूत्र संस्थान स्वस्थ बना रह सकता है। लीवर और किडनी में संक्रमण होने पर भूई आंवला पाउडर अमृत समान उपयोगी है।

[नोट: किसी भी तबलीफ की अनदेखी नहीं करें और तुरंत किसी नजदीकतम डॉक्टर से सम्पर्क करें। स्वास्थ्य सम्बन्धी अधिक जानकारी हेतु: http://www.healthcarefriend.in पर विजिट/क्लिक करें।]


7-अन्य: उपरोक्त के अलावा भी भूई आंवला का सेवन करने से अनेकानेक बीमारियों का इलाज किया जा सकता है।

सम्पर्क सूत्र:
Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा)
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स्त्री ​के दिमांग की तुलना में पुरुष का दिमांग करीब 10% बड़ा होता है, लेकिन फिर भी स्त्रियों में संवेदनात्मक बौद्धिक क्षमताएं अधिक होती है!

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
आधुनिक विज्ञान ने मशीनों के माध्यम से अनेक अनसुलझी गुथ्थियों को सुलझा कर सामने रख दिया है। जैसे पोजीट्रान एमिशन टोमोग्राफी (पेट) स्कैन [Positron Emission Tomography (PET) Scans] जैसी मशीनों ने इस बात को सिद्ध कर दिया है कि स्त्री ​के दिमांग की तुलना में पुरुष का दिमांग करीब 10% बड़ा होता है। मगर इसका मतलब यह कतई नहीं कि दिमांग का आकार छोटा होने के कारण स्त्री की दिमांगी क्षमताएं पुरुषों से कम या कमतर होती हैं। बल्कि महिलाओं के दिमांग के कुछ हिस्सों में न्यूरॉन्स (Neurons) पुरुषों के दिमांग में पाये जाने वाले न्यूरॉन्स से अधिक होते हैं। जिनका कार्य मानव शरीर के कार्यों, विचारों और इंद्रियों को नियंत्रित/संचालित करना होता है। 

मामला केवल स्त्रियों के दिमांग के कुछ हिस्सों में न्यूरॉन्स की अधिकता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मनोवैज्ञानिकों का दावा है कि सामान्यत: पुरुष अनादिकाल से अपने दिमांग के केवल बांये हिस्से का ही इस्तेमाल करते आये हैं। जबकि स्त्रियां अपने दिमांग के दोनों हिस्सों का उपयोग करती आयी हैं। इस वजह के दोनों के मध्य के पारस्परिक व्यवहार, हालातों और, या आपसी या पारिवारिक रिश्तों की गहराई, महत्ता और संवेदनशीलता को भावनात्मक रूप से समझने में पुरुषों की तुलना में स्त्रियां जन्म से ही अधिक निपुण तथा दक्ष होती है। यही वजह है कि स्त्रियां अपने पुरुष साथी से भावनात्मक निकटता की चाहत में न चाहते हुए भी, अनचाहे शारीरिक सम्बन्ध बना बैठती हैं या स्त्रियों की भावनाओं से सराबोर निकटता का पुरुष अपने हित में इस्तेमाल कर लेते हैं। शायद यही वजह है कि एक बालिग स्त्री भी पुरुष पर यह आरोप लगाती है कि पुरुष द्वारा उसे फुसलाकर, उसके साथ धोखा किया गया। जिसे कानून द्वारा भी स्वीकृति प्राप्त है। खैर इस विषय पर फिर कभी। 

मानव दिमांग का बायां हिस्सा सामान्यत: संवेदनाहीन-तार्किकता (Senseless-Logicality) का क्षेत्र होता है, जबकि दायां हिस्सा संवेदना से ओतप्रोत/सराबोर होता है। यही वजह है कि जहां पुरुषों के स्वभाव में सामान्यत: तर्क-वितर्क, राजनीतिक उठापटक, कूटनीति, सामने बाले को आहत कर देने वाली तीखी बहस, मारामारी, खोज, संघर्ष, प्रतिशोध इत्यादि में अधिक निपुणता पायी जाती है। जबकि छोटी-छोटी घटनाओं, पेड़-पौधों, सहज व साधारण सी बातों, मोहक दृश्यों, कपड़ों के रंगों तक को याद रखने, दूसरों को धैर्य पूर्वक सुनने और समझने, विषय की संवेदना को गहराई से समझने, वाकपटुता तथा वाकचातुर्य में स्त्रियां पुरुषों से कई कदम आगे होती हैं।

सामान्यत: स्त्री जब किसी विषय की व्याख्या करती है तो उसमें आत्मीय भावों और संवेदनाओं के रंगों का मिश्रण अवश्य पाया जात है, जबकि पुरुष की व्याख्या रूखे तार्किक निष्कर्ष (Rude logical conclusions) तक सीमित होती है। कारण स्त्री अपने दिमांग के दोनों हिस्सों का उपयोग करती हैं। यही वजह है कि स्त्रियां बहुत जल्दी भावुक हो जाती हैं, जबकि छोटी-छोटी बातों पर भावुक नहीं होने को पुरुष अपने अहंकार से जोड़कर अपने आप को मर्द/यौद्धा की भांति सिद्ध करने की कोशिश करते रहते हैं। यही वजह है कि अधिकतर पुरुषों को ऐसी स्त्रियां बिलकुल भी पसंद नहीं जो बात-बात पर आंसू टपकाती रहें, जबकि अधिकतर स्त्रियों को ऐसे पुरुष बिलकुल भी पसंद नहीं जो अपने दु:ख दर्द को अंदर ही अंदर पीकर जीवनभर घुट-घुट कर मरते रहें। बावजूद इसके हर घर की यही कहानी है।

यद्यपि कड़वी हकीकत यह है कि सामान्य पुरुष चाहें तो भी आसानी से भावुक नहीं हो सकते। इसकी वजह पुरुषों के स्वभाव में प्रकृतिदत्त भावुकता की जन्मजात कमी का होना है। अत: पुरुष चाहें तो भी बात-बात पर भावुक और संवेदनशीलता से परिपूर्ण व्यवहार नहीं कर सकते। यद्यपि मनोवैज्ञानिकों तथा मानवव्यवहार शास्त्रियों का कहना है कि पुरुषों द्वारा सतत अभ्यास (continuous practice) के जरिये भावनाओं और संवेदनाओं को स्त्रियों की ही तरह से प्रकट करना सीखा जा सकता है। जैसे कि फिल्मों और नाटकों में काम करने वाले पुरुष सीख लेते हैं।

इस विषय में मेरा मत है कि भावनाओं और संवेदनाओं को प्रकट करना केवल नाटक करने या ऑडियंस (audience) या मिलने-जुलने वालों को प्रभावित करने तक ही सीमित नहीं होना चाहिये, बल्कि इसे दैनिक पारिवारिक जीवन में आपसी व्यवहार में भी सहजता से उपयोग किया जाये तो बहुत से विवाद जन्म ही नहीं लेंगे। लेकिन स्त्रियों को भी पुरुषों की तार्किक मनोस्थिति का ज्ञान होना बहुत जरूरी हैं। भारत जैसे देश में जहां एक मोपेड (Moped) चलाने के लिये तो लाईसेंस की अनिवार्यता है, लेकिन 6 से 8 दशक तक दाम्पत्य जीवन को संचालित करने के लिये किसी प्रकार की व्यावहारिक दाम्पत्य/यौन शिक्षा या उचित परामर्श तक आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में नवदम्पत्तियों के मध्य होने वाले टकराव अस्वाभाविक नही हैं।

किसी भी प्रकार के दाम्पत्य विवाद के समाधान हेतु निकटतम दाम्पत्य विवाद सलाहकार से सम्पर्क करें। अधिक जानकारी हेतु: http://www.healthcarefriend.in पर विजिट/क्लिक करें।

फिर इंतजार किस बात का है, आज से ही दूसरों की भावनाओं को संवेदनापूर्वक समझने की कोशिश की जाये, जिससे कि दूसरे हमारी भावनाओं का भी आदर कर सकें। विशेष रूप से यह कला सुखद दाम्पत्य जीवन के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। टूटते रिश्तों को बचा सकती है। अंत में फिर से दौहरना चाहूंगा कि

'अधिकतर पुरुषों को ऐसी स्त्रियां बिलकुल भी पसंद नहीं जो बात-बात पर आंसू टपकाती रहें, जबकि अधिकतर स्त्रियों को ऐसे पुरुष बिलकुल भी पसंद नहीं जो अपने दु:ख दर्द को अंदर ही अंदर पीकर जीवनभर घुट-घुट कर मरते रहें।'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-दाम्पत्य विवाद सलाहकार, 9875066111
-Online Dr. P. L. Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 8561955619 (10 AM to 10 PM), 17.06.2018.
बवासीर/पाइल्स-Hemorrhoids/Piles:

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
बवासीर गुदा मार्ग की ऊपरी या बाहरी बीमारी नहीं है। क्योंकि बवासीर का मुख्य कारण वर्षों तक कब्ज का कब्जा रहना होता है। अधिक मिर्च मसाले एवं बाजारू भोजन के कारण कब्ज उत्पन्न होने लगती है। जिसके कारण मल कठोर तथा शुष्क हो जाता है। कठोर और शुष्क मल असानी से बाहर नहीं आता है। अत: मल त्याग हेतु व्यक्ति को अधिक जोर लगाना पड़ता है। जिससे गुदा का आंतरिक हिस्सा जख्मी हो जाता है। लगातार यही स्थिति बनी रहने पर तेजी से कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं और आंतरिक तंत्रिकाएं जख्मी हो जाती हैं या फूल जाती है। जिसके चलते मस्से फूल जाते और, या गुदा से मल के साथ रक्त आने लगता है। सामान्यत: इसे ही बवासीर रोग कहा जाता है।




मुख्यत: बवासीर दो प्रकार को होता है-खूनी बवासीर और बादी बवासीर। यदि मल के साथ खून बूंद-बूंद कर आये तो उसे खूनी बवासीर कहते हैं। यदि मलद्वार के बाहर या मलद्वार के आसपास की नसों में या मलद्वार के अंदर सूजन हो और मटर या अंगूर के दानों के समान मस्से बाहर निकलने लगें या गुदा में अंदर मस्से या सोजन अनुभव होने लगे। ऐसे मस्से जो मलत्याग के समय गुदा से बाहर भी आ जाते हों। ऐसी स्थिति में मल के साथ खून न आए तो सामान्यत: इसे बादी बवासीर कहा जाता है।

जब बवासीर में मलद्वार पर मस्से निकल आते हैं और उनमें सूजन और जलन होने के साथ अधिक पीड़ा भी होती हो। बैठने-उठने पर मस्सों में तेज दर्द होता हो। उनमें से रक्त या चिकना सा पदार्थ निकलने लगे। अनेक बार बिना दर्द के भी मल के साथ या ​मलत्योग के बाद या उठने-बैठने पर गुदाद्वार से रक्त निकलने लगे तो सामान्यत: इसे खूनी बवासीर कहते हैं। बवासीर होने पर उचित एवं सही उपचार के अभाव में गुदाद्वारा में जख्म/फोड़ा भी हो सकता है। गुदाद्वार में दरारें आ सकती हैं। जिनमें मलत्याग के समय असहनीय पीड़ा होती है। यदि बवासीर का समय रहते उचित उपचार नहीं करवाया जाये तो यह कुछ मामलों में भगंदर और, या गुदाभ्रंश में भी परिवर्तित हो सकता है।

इस असहनीय दर्दनाक पीड़ा से भयभीत होकर कुछ रोगी नासमझी में बवासीर, भगंदर या ग्रदाभ्रंश का ऑपरेशन करवा लेते हैं। इसके बाद वाकई ये तलीफें लाइलाज बन जाती हैं। ऑपरेशन के बाद, फिर ऑपरेशन यह सिलसिला। लोगों की जिंदगी को जीते जी नर्क बना देता है।

इसका भी कारण समझना जरूरी है। जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है कि बवासीर गुदा मार्ग की ऊपरी या बाहरी बीमारी नहीं है। क्योंकि बवासीर का मुख्य कारण वर्षों तक कब्ज का कब्जा रहना होता है। अधिक मिर्च मसाले एवं बाजारू भोजन के कारण कब्ज उत्पन्न होने लगती है। जिसके कारण मल कठोर तथा शुष्क हो जाता है। कठोर और शुष्क मल असानी से बाहर नहीं आता है। अत: मल त्याग हेतु व्यक्ति को अधिक जोर लगाना पड़ता है। जिससे गुदा का आंतरिक हिस्सा जख्मी हो जाता है। लगातार यही स्थिति बनी रहने पर तेजी से कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं और आंतरिक तंत्रिकाएं जख्मी हो जाती हैं या फूल जाती है। जिसके चलते मस्से फूल जाते और, या गुदा से मल के साथ रक्त आने लगता है। सामान्यत: इसे ही बवासीर रोग कहा जाता है।

इसलिये यदि कोई सामान्य विवेक का व्यक्ति भी इस बात पर विचार करेगा तो उसे आसानी से समझ में आ जायेगा कि जब तक पाचन तंत्र ठीक नहीं होगा। जब तक सख्त और कठोर मल बनना बंद नहीं होगा। बाहरी ऑपरेशन करने के बाद भी बवासीर को ठीक कैसे किया जा सकता है? यही स्थिति गुर्दे की पथरी की भी होती है। जिसको ऑपरेशन से निकाल देना समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि वास्तविक उपचार पथरी का शरीर में बनना बंद करना असली उपचार है। इसके बाद भी हमारे देश में हर दिन बवासीर के हजारों रोगियों के ऑपरेशन किये जा रहे हैं।

बवासीर का उपचार:
बवासीर से पीड़ित अधिकतर लोग शर्म-संकोच के चलते अपनी तकलीफ को परिवार के सदस्यों तक से छिपाते हैं और इधर-उधर ​की दवाइयां लेते रहते हैं। या किसी अनुभवी डॉक्टर से नियमित रूप से उपचार नहीं लेते हैं। अधिकतर रोगियों को तो यह बात ही समझ में नहीं आती कि वर्षों/दशकों तक पेट खराब रहने और कब्ज रहने के बाद जन्मी बवासीर की तकलीफ का बिना कब्ज को ठीक किये सफल उपचार कैसे सम्भव है?

अत: सबसे पहली जरूरत होती है, रोगी के पाचनतंत्र और कब्ज को ठीक करना। जिसके लिये पहले से कोई सुनिश्चित समय सीमा तय नहीं की जा सकती। क्योंकि रोगी का स्वस्थ होना केवल दवाइयों पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि कुछ बातें हैं, जिनके कारण उपचार में कम या अधिक समय लग सकता है। जैसे-पहले लिये गये उपचार के रोगी के दुष्प्रभाव, रोगी की जीवनचर्या, खान-पान की आदतें, लीवर की स्थिति, रोगी के जीवन में चिंता-तनवा और अवसाद की स्थिति, वंशानुगत पाचनतंत्र की क्षमता, रोग प्रतिरोधक क्षमता, रोगी द्वारा दवा पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता इत्यादि। इस सब के बावजूद अधिकतर रोगी डॉक्टर्स से इलाज की निश्चित समय सीमा तथा गारंटेड इलाज की उम्मीद करते हैं। जो व्यावहारिक एवं कानूनी तौर गलत एवं असंभव है, फिर भी रोगी की जेब से पैसे निकलवाने के चक्कर में धन के लोभी अनेक निष्ठुर तथा असंवेदनशील डॉक्टर रोगी की भाषा बोलने लगे हैं। जिसके परिणाम या दुष्परिणाम ऐसे गारंटी मांगने वाले रोगी ही जानते हैं।

मेरा अनुभव तो यही है कि बवासीर का मूल कब्ज है। अत: बवासीर के उपचार के लिये सबसे पहले कब्ज को ठीक करने के लिये सरल, सौम्य तथा उचित दवाइयों का, उचित मात्रा में स्वस्थ होने तक नियमित रूप ये सेवन करना पहली और अंतिम जरूरत है। ठीक होना या नहीं होना, डॉक्टर, रोगी तथा रोग की स्थिति एवं दवाइयों के साथ-साथ प्रकृति पर भी निर्भर करता है। क्योंकि अंतिम सत्य यही है कि डॉक्टर केवल दवाई देता है, रोगी को पूर्णत: स्वस्थ प्रकृति ही करती है।
उपचार हेतु निकट के किसी आयुर्वेद और, या होम्योपैथी के डॉक्टर से सम्पर्क करें। स्वास्थ्य सम्बन्धी अधिक जानकारी हेतु: http://www.healthcarefriend.in पर विजिट/क्लिक करें।

नोट:---->>>>>>>>>>---- ऑर्गेनिक (Organic) देशी जड़ी बूटियों के बारे में पूर्वजों से प्राप्त अनमोल ज्ञान तथा दुष्प्रभाव रहित होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक जर्मन दवाईयों के सतत अध्ययन, शोधन, परीक्षण और उपचार के दौरान हमने अनेक अनुभव सिद्ध उपयोगी नुस्खे तैयार किये हैं। जो बेशक कुछ गरीब या स्वास्थ्य के प्रति कंजूस लोगों को महंगे लग सकते हैं, लेकिन इन नुस्खों से हजारों रोगियों की "लाइलाज समझी जाने वाली" अनेक शारीरिक तथा मानसिक तकलीफों से मुक्ति मिल चुकी है। चुनौतीपूर्ण मानव सेवा का यह क्रम हमारी वेब साइट स्वास्थ्य रक्षक सखा के जरिये हर दिन देशभर में जारी है। लेकिन-गारण्टी की उम्मीद करना खुद को धोखा देना और डॉक्टर को झूठ बोलने हेतु उकसाने जैसा है, क्योंकि इलाज में गारण्टी देना असम्भव और गैर कानूनी है। अतः तुरन्त, गारण्टेड और शर्तिया इलाज की उम्मीद नहीं करें।
-Online Dr. P. L. Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 8561955619 (10AM to 10 PM), 07.06.2018.
कैंसर (Cancer): कहीं देर न हो जाये?


लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
तेजी से भागती दौड़ती 21वीं सदी की पीढी के मन में भी भयावह खौफ है-कैंसर के नाम का। अत: अभी भी कैंसर का नाम ही मौत का पर्याय समझा जाता है। कारण-शुरूआत में कैंसर की मौत भयानक होती थी। वर्तमान में कैंसर को लाइलाज नहीं माना जाता और असाध्य मामलों में भी चिकित्सा विज्ञान ने कैंसर की मौत को असान बना दिया है। इसके बावजूद भी लोगों के मन में कैंसर का आतंक बना हुआ है। समझने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शुरूआत में कैंसर का इलाज संभव है। उचित इलाज के बाद रोगी स्वस्थ और बिल्कुल सामान्य जीवन जी सकता है।




यद्यपि यह दु:खद है कि कैंसर के नाम से रोगी के परिजनों को जमकर लूटा जा रहा है। यह भी देखने में आता है कि यदि कोई वैद्य, हकीम या डॉक्टर सस्से में कैंसर का उपचार करना चाहे तो अधिकतर मामलों में रोगी के परिजन उस पर विश्वास ही नहीं करते हैं। क्योंकि लोगों की मानसिकता (Mentality) इस प्रकार की हो गया है कि जितनी बड़ी बीमारी उतना ही महंगा इलाज (expensive treatment) है। अत: लोग सस्ती दवाईयों पर पर भरोसा नहीं करते। इस वजह से भी अनेक लोग बेमौत मर रहे हैं। जबकि अनेक बहुत सस्ती ऐसी जड़ी-बूटियां और होम्योपैथिक दवाइयां उपलब्ध हैं, जिनके उचित मात्रा में विधिवत तथा नियमित सेवन से कैंसर की प्रारंभिक और कुछ मामलों में अंतिम अवस्था में भी जीवन को बचाया जा सकता है।


खर्चीली कीमोथेरेपी (Chemotherapy) लेने के बाद भी लगातार हो रही कैंसर मौतों से भी लोगों को कैंसर का व्यापारिक गणित समझ में नहीं आना दु:खद है। कैंसर अनेक प्रकार ​के होते हैं। कैंसर के विभिन्न रूपों और उनके लक्षणों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है। लेकिन इन लक्षणों के होने पर जरूरी नहीं कि कैंसर ही हो, लेकिन सावधानी जरूरी है। अत: इन लक्षणों के प्रकट होने पर सतर्कता जरूरी है:-


01. आमाशय कैंसर: उल्टियां होते रहना, उल्टी और दस्त में खून आना, वजन का लगातार घटना, भूख न लगना आदि।
02. फेफड़ों का कैंसर: लगातार बुखार, छाती में दर्द, लगातार खांसी रहना, खांसते वक्त छाती में दर्द, बलगम में खून आना आदि।
03. स्तन कैंसर: शुरू में स्तन में ऐसी गांठ हो] जिसमें दर्द रहता हो, स्तन में रक्त स्राव होना, कांख में गांठ होना, स्तन की त्वचा का अधिक खुरदरा होना, त्वचा पर सूजन होना आदि।
04. लीवर कैंसर: भूख न लगना, बार-बार पीलिया होना, लीवर में सोजन या लीवर बढ़ जाना, दायें ओर की पसलियों के ठीक नीचे दर्द होना आदि।
05. मुख कैंसर: मुख से दुर्गंध आना, खाने व निगलने में तकलीफ, मुंह में लगातार छालों का बने रहना और छालों का जल्दी ठीक न होना आदि।
06. किडनी कैंसर: पीठ में लगातार दर्द बने रहना, पेशाब में रक्त आना, पेट में गांठ का होना आदि।
07. ब्लड कैंसर: बार-बार ज्वर से पीडि़त रहना, शरीर में खून की कमी बने रहना, त्वचा पर लाल चकत्ते उभरना, गर्दन व जांघ में गांठ बन जाना, तिल्ली का बढऩा, गुदा या मूत्र मार्ग से खून आना आदि।
08. ओवरी कैंसर: पेट के निचले हिस्से में गांठ का होना, वजन घटना, पेट के निचले हिस्से में भारीपन बने रहना आदि।
09. गर्भाशय कैंसर: पेट के निचले भाग में भारीपन का रहना और दर्द रहना, मासिक धर्म का अधिक मात्र में और अधिक दिनों तक आना, बदबूदार श्वेतप्रदर स्राव , मल-मूत्र विसर्जन में दर्द होना, अचानक मासिक धर्म के बंद होने के बाद फिर से खून स्राव का होना आदि।
10. त्वचा कैंसर: त्वचा पर घाव होना, घाव का जल्दी न भरना, घाव का फैलते जाना, घाव में मामूली दर्द बने रहना, घाव से खून का रिसना आदि।
11. गुदा कैंसर: शौच के समय बहुत दर्द होना, शौच के साथ खून निकलना, गुदा का बाहर निकलना, गुदा में गांठ का हो जाना आदि।
12. थायराइड कैंसर: गले के बीच में गांठ बनना, उस गांठ में दर्द बने रहना, सांस लेने में तकलीफ होना, खाते, पीते, निगलते समय गले में दर्द होना आदि।
13. ब्रेन कैंसर: सिर में लगातार दर्द बने रहना, मिर्गी के दौरे पडऩा, अशान्त नींद, शरीर के किसी भाग में लकवे का होना, बार-बार बेहोश हो जाना आदि।
14. अण्डकोष का कैंसर: एक तरफ से अण्डकोष का बढऩा, अण्डकोष में दर्द महसूस न होना, खांसते और सांस लेते समय तकलीफ का होना आदि।
15. आहार नली का कैंसर: गले में खाना अटकना, खाना खाते समय दर्द होना, खून की उल्टी होना, खाना बहुत धीरे-धीरे खा पाना आदि।
16. बड़ी आंत का कैंसर: पाचनतंत्र का अस्वस्थ होना, कभी दस्त और कभी कब्ज़ होना, मल के साथ रक्त स्राव होना, शौच के समय तकलीफ होना या दर्द होना, गुदा द्वार के अन्दर गांठ का होना आदि।


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नोट:---->>>>>>>>>>---- ऑर्गेनिक (Organic) देशी जड़ी बूटियों के बारे में पूर्वजों से प्राप्त अनमोल ज्ञान तथा दुष्प्रभाव रहित होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक जर्मन दवाईयों के सतत अध्ययन, शोधन, परीक्षण और उपचार के दौरान हमने अनेक अनुभव सिद्ध उपयोगी नुस्खे तैयार किये हैं। जो बेशक कुछ गरीब या स्वास्थ्य के प्रति कंजूस लोगों को महंगे लग सकते हैं, लेकिन इन नुस्खों से हजारों रोगियों की "लाइलाज समझी जाने वाली" अनेक शारीरिक तथा मानसिक तकलीफों से मुक्ति मिल चुकी है। चुनौतीपूर्ण मानव सेवा का यह क्रम हमारी वेब साइट स्वास्थ्य रक्षक सखा के जरिये हर दिन देशभर में जारी है। लेकिन-गारण्टी की उम्मीद करना खुद को धोखा देना और डॉक्टर को झूठ बोलने हेतु उकसाने जैसा है, क्योंकि इलाज में गारण्टी देना असम्भव और गैर कानूनी है। अतः तुरन्त, गारण्टेड और शर्तिया इलाज की उम्मीद नहीं करें।

-Online Dr. P. L. Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 8561955619 (10AM to 10 PM), 31.05.2018.

वियोग या जुदाई-Separation में घुट-घुट कर बिलखने या मरने से बेहतर है, अपनी पीड़ा किसी अनुभवी और विश्वसनीय होम्योपैथ को बतायें।

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'




ऐसी किशोरियां या युवतियां जिन्हें प्रेम में निराशा का सामना करना पड़ा हो और जो रात-रात भर अपने दु:ख या शोक या गम या जुदाई के वियोग में दु:खी रहने के कारण या अपने हालातों के बारे में दिनरात सोचते रहने के कारण बराबर सो नहीं पाती हैं। जीवन के प्रति जिनकी आशाओं और उमंगों पर तुषारपात (Fisheries) हो जाता है। इस कारण वे मानसिक तथा अनेक प्रकार के शारीरिक रोगों से पीड़ित हो जाती हैं। उन्हें लगता है। जैसे-हर समय चिरस्थाई दु:ख, शोक, झुंझलाहट, ईर्ष्या, भग्न-प्रेम, चित्त डांवाडोल, निराशा, हतोत्साह में डूबना, जीवन में कुछ अच्छा नहीं लगता, हृदय की धड़कन बढना, हृदय में पीड़ा होती है, सांस लेने में कठिनाई होना, सदा आत्महत्या के विचार आना। इन सब हालातों से लम्बे समय तक परेशान एवं व्यथित रहने के कारण अंतत: पीड़िता ऐसी स्थिति में पहुंच जाती हैं कि वह न तो कुछ सोच सकती हैं, न कुछ कर सकती हैं। हर बात में उन्हें निराशा और उदासीनता नजर आती है।


ऐसी दु:खद मनोशारीरिक हालातों का सामना कर रही लड़कियां आमतौर पर अपने दु:ख को परिजनों को बता नहीं पाती हैं। यदि बताने का साहस भी करती हैं तो उन्हें पागल या बदचलन करार दे दिया जाता है। इस डर से ऐसी लड़कियां, सह सकने की क्षमता शेष रहने तक अपनी पीड़ा ​से अंदर ही अंदर घुटती और रोती-विलखती रहती हैं। जब दर्द और घुटन असहनीय हो जाती हैं, तो अनेकों लड़कियां असमय मौत को गले लगा लेती हैं।

[नि:शुल्क स्वास्थ्य परामर्श हेतु मेरा मोबाईल एवं हेल्थ वाट्सएप नम्बर: 85619-55619 (10AM to 10 PM)]

ऐसी स्थिति का सामना कर रही लड़कियों के लिये विचारणीय सवाल और जरूरी सलाह-प्रेम होना और प्रेम का टूटना प्राकृतिक है। यह कोई ऐसी अनहोनी घटना नहीं जो केवल आपके साथ ही घटी हो? इतिहास में ऐसा लाखों-करोड़ों लड़कियों, लड़कों, स्त्रियों और पुरुषों के साथ होता रहा है और इन हालातों से उबरने के बाद सभी लोग वृद्धावस्था तक सामान्य जीवन जीते हैं। सबसे बड़ी विचारणीय बात यह है कि जीवन अमूल्य है और संसार में हर समस्या का कुछ न कुछ समाधान या निराकरण अवश्य है। अत: वियोग या जुदाई में अंदर ही अंदर घुट-घुट कर हर पल बिलखने या मरने से बेहतर है, अपनी पीड़ा किसी अनुभवी और विश्वसनीय होम्योपैथ को बतायें। होम्योपैथी की दुष्प्रभाव रहित दवाइयां आपकी ऐसी मनोस्थिति को बदलने और आपके जीवन में आशा तथा ऊर्जा का संचार करने में आश्चर्यजनक रूप से सहायक बनेंगी।

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सिरदर्द और माईग्रेन-अधिक दर्द निवारक हानिकारक हैं, होम्योपैथी अपनाएं।-Headaches and Migraines-More Painkillers are Harmful, Adopt Homeopathy.


वर्तमान भागमभाग जीवन की व्यस्तता और मानसिक दबावों में अधिकतर लोगों को आमतौर पर सिर में दर्द की शिकायत बनी रहती है। महिलाओं में यह तकलीफ अधिक देखने को मिलती है। शोध प्रमाणित करते हैं कि सिर दर्द के प्रमुख कारण अप्रसन्नता, असंतोष, अनिश्चय, चिंता, तनाव, अवसाद, क्रोध, कार्य का दबाव आदि हैं। इन दिनों यह समस्या बड़ों के साथ-साथ छोटे बच्चों में भी देखी जा सकती है।



यदि सिर दर्द बार-बार होने लगे तो यह तकलीफ माइग्रेन Migraine अर्थात् आधासीसी में बदल सकती है। सामान्यत: माइग्रेन का दर्द, सिर के आधे हिस्से में होता है। जो दायें, बायें, आगे, पीछे या कपाल पर हो सकता है। दर्द का सम्बन्ध सूर्योदय और सूर्यास्त के साथ भी जुड़ा हो सकता है। दर्द इतना भयंकर होता है कि रोगी को दर्द निवारक/पेन किलर दवाइयों का सेवन करने को मजबूर होना पड़ जाता है।

दर्द निवारक दवाओं से कुछ समय के लिए तो राहत मिल सकती है, लेकिन माईग्रेन का उपचार नहीं हो पाता है। अधिक समय तक दर्द निवारक दवाओं का सेवन करना अन्य अनेक नयी और बड़ी तकलीफों को जन्म दे सकता है। इसके बाद भी अनेक उच्च शिक्षित तथा उच्च पदस्थ लोग तक ऐसी तकलीफ को बहुत हल्के में लेते देखे जा सकते हैं। जो उनके स्वास्थ्य की दृष्टि से अनुचित और चिंताजनक है।

होम्योपैथी और देशी जड़ी बूटियों के जरिये माईग्रेन का स्थायी इलाज संभव है। मेरे अनुभव में 80 फीसदी से अधिक रोगी पूरी तरह से रोगमुक्त हो जाते हैं। यद्यपि किसी अनुभवी डॉक्टर की देखरेख में ही इलाज लेना चाहिये। स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरूकता हेतु सिरदर्द एवं माईग्रेन की कुछ होम्योपैथिक दवाईयां रोगी के लक्षणों के अनुसार प्रस्तुत हैं:-

1. Glonoinum: लक्षण-(1) होम्योपैथी में यह सिर-दर्द की विशिष्ट औषधि है। रोगी के सिर में रक्त की अधिकता से सिर-दर्द होता है। लू लगने से या सर्दी से या किसी और कारण से जब सिर में रक्त की अधिकता हो जाती है, तब यह उत्तम कार्य करती है। सामान्यत: सिर-दर्द गर्दन से शुरू होता है। जहां रोगी को भारीपन अनुभव होता है, और हृदय की धड़कन/स्पन्दन के साथ सिर में भी धड़कन/स्पन्दन सी अनुभव होती है। रोगी को लगता है कि सिर बहुत बड़ा हो गया है जो उस की छोटी-सी खोपड़ी में नहीं समा रहा। सिर में धड़कन/स्पन्दन इतना उग्र होता है कि जिस तकिये पर रोगी ने सिर रखा होता है, वह भी स्पन्दन करता दीखता है, सिर के हर स्पन्दन के साथ तकिया हिलता है। ‘सन-स्ट्रोक’ की यह मुख्य दवा है।
(2) रोगी के सिर में एकदम, अचानक रक्त-संचय होने से रक्त-संचार के दौरे-से पड़ते हैं। सिर में रक्त-संचार ऐसे अवसरों पर होने लगता है, जब इसकी बिल्कुल संभावना नहीं होती है। जैसे-रोगी सड़क पर चला जा रहा है। एकदम गर्मी की लहर मस्तिष्क में उठती/चढ़ती हुई सी अनुभव होती है। उसे एकदम पसीना छूटने लगता है। रोगी का चेहरा लाल हो जाता है। रोगी चारों तरफ देखता है, मगर किसी को पहचान नहीं पाता। उसे परिचित लोग हैं वे भी अजनबी से लगने लगते हैं।
[स्वास्थ्य परामर्श हेतु-Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM)]

2. Natrum Muriaticum: लक्षण-सूर्योदय के साथ सिर-दर्द होना और सूर्यास्त के साथ समाप्त हो जाना इस दवाई का प्रमुख लक्षण है। सिर-दर्द में इस औषधि का स्थान किसी अन्य औषधि से कम नहीं है। विशेषतौर पर रक्तक्षीणता/रक्ताल्पता (Anemic) से पीउ़ित लड़कियों/महिलाओं के सिर-दर्द में यह बहुत उपयोगी है। सिर दर्द होने पर रोगी अनुभव करता है कि सैकड़ों हथौड़ों की चोट उसके सिर पर पड़ रही है। कभी-कभी यह सिर-दर्द प्रात: 10-11 बजे शुरू होती है, दोपहर बाद 3 बजे या सूर्य ढलने तक बना रहता है। सूर्यास्त होते ही समाप्त हो जाता है। कभी कभी यह प्रतिदिन, प्रति तीसरे या प्रति चौथे दिन हो सकता हे। सिर-दर्द इतना तीव्र होता है कि कोई नया होम्योपैथ बेलाडोना देने की सोच सकता है, परन्तु अगर रोगी का चेहरा पीला हो, वह रक्त-क्षीण हो, तो नेट्रम म्यूर से ही लाभ होगा। यह सिर-दर्द महिलाओं को माहवारी के बाद होता देखा गया है। जिसका कारण सम्भवत: रोगिणी में रक्तक्षीणता हो जाना है।
[स्वास्थ्य परामर्श हेतु-Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM)]

3. Sanguinaria Canadensis: लक्षण-(1) दायीं ओर के आधे सिर में दर्द जो सूरज के चढ़ने के साथ दाहिनी आँख पर आकर जम जाय तो इस दवाई को अवश्य याद रखना चाहिये। ऐसा सिर-दर्द जो प्रात: काल सूर्य के चढ़ने के साथ शुरू हो। सिर की गुद्दी से चलकर सिर के ऊपर से होकर दाहिनी आंख के ऊपर और सिर के दाहिनी तरफ आकर जम जाता है। इस प्रकार के सिर दर्द को दवा अवश्य ठीक कर देती है। रोगी अंधेरे कमरे में बिस्तर पर जा लेटता है, जिससे उसे कुछ आराम मिलता है। जबकि सिर दर्द दिन में बढ़ता है और तेज रोशनी या प्रकाश में दर्द अधिक बढ़ता जाता है। दर्द के बाद उल्टी आ जाती है और उल्टी आने पर दर्द चला जाता है। अगर रात को बिस्तर पर लेटते हुए रोगी के हाथ-पैरों जलन होती हो और रोगी अपने तपते हुए अंगों को ओढ़नी से बाहर रखना चाहता हो, तो यह इस दवाई का विशेष लक्षण है। इसके अलावा उठकर बैठने से नहीं, बल्कि लेटने से रोगी को आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों में दायीं ओर के सिर-दर्द में यह दवाई बहुत लाभ करती है।
[स्वास्थ्य परामर्श हेतु-Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM)]

4. Spigelia: लक्षण-(1) स्नायु-शूल (दर्द) की यह प्रमुख दवा है। इस दवाई का प्रभाव क्षेत्र विशेष रूप से स्नायु शूल है। जैसे हृदय, सिर, चेहरा, आंख आदि के दर्द के ऊपर इसका मुख्य-प्रभाव है। ऐसा हृदय-शूल तथा सिर दर्द जो बांयीं आंख के ऊपर आकर जम जाये। कभी कभी दायीं आंख के ऊपर भी आकर जम जाता है।
(2) सिर दर्द (Neuralgic headache)–सिर-दर्द, चेहरे का दर्द तथा आंखों के दर्द में इस औषधि का प्रमुख स्थान है। सिर-दर्द प्राय: एक तरफ होता है। प्रात: काल सूर्य के उदय के साथ यह शुरू होता है, ज्यों-ज्यों सूर्य चढ़ता जाता है त्यों-त्यों यह बढ़ता जाता है, और सूर्य के अस्त होने के साथ यह समाप्त हो जाता है। यह दर्द सिर की गुद्दी से उठता है, सिर पर चढ़कर बायीं आंख के ऊपर जाकर ठहर जाता है।

इनके अलावा भी माईग्रेन की बहुत सी अन्या दवाइयां भी हैं, जिनको रोगी के मानसिक एवं शारीरिक लक्षणों के अनुसार उचित शक्ति, मात्रा एवं निर्धारित समय तक सेवन करवाया जाता है।
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फेरम फॉस (Ferrum Phosphoricum) खिलाओ खुद-ब-खुद भूख (Appetite) लगने लगेगी।




जब रोगी की तबियत खराब हो और उसे भूख नहीं हो तो रोगी को जबरदस्ती भोजन खिलाकर उसकी पाचनशक्ति नष्ट मत करो, प्राकृतिक तरीके से भूख पैदा करने की कोशिश करो। रोगी की स्थिति के अनुसार उचित मात्रा और शक्ति में बॉयाकैमिक फेरम फॉस खिलाओ। उसे खुद-ब-खुद भूख लगने लगेगी।-Online Dr. P. L. Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM), 21.05.2018.

--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!

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सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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Cucumber कब्जी कमजोरी कमर कमर दर्द करेला कर्ण वेदना कर्णरोग कष्टार्तव-Dysmenorrhea कांच निकलना काजू कान कानून सम्मत काम काम शक्ति कामवाण पाउडर कामशक्ति कामशक्ति-Sexual power कामेच्छा कामोत्तेजना कायाकल्प कार्बोहाइड्रेट कार्बोहाइड्रेट-Carbohydrates काला जीरा काला नमक काली जीरी काली तुलसी काले निशान कास-खांसी-Cough किडनी किडनी संक्रमण किडनी स्‍टोन कीड़े कीमोथेरेपी कुकरौंधा कुकुंदर कुटकी-Black Hellebore कुबडापन कुल्थी कुल्ला कुष्ट कुष्ठ कृमि केला केसर कैफीन-Caffeine कैलोरी कैलोरी चार्ट कैलोरी-Calories कैवांच कैविटी कैंसर कॉफी कॉफ़ी कॉलेस्ट्रॉल कोंडी घास कोढ़ कोबरा कोलेस्‍ट्रॉल कोलेस्ट्रॉल-Cholesterol कोलेस्ट्रोल कौंच कौमार्य क्रियाशीलता क्रोध क्षय रोग-Tuberculosis क्षारीय तत्व क्षुधानाश खजूर खजूर की चटनी खनिज खरबूजा-Musk melon खरेंटी खरैंटी शिलाजीत खाज खांसी खिरेंटी खिरैटी खीरा खुजली खुशी-Joy खुश्की खुश्बू खोया गंजापन-Baldness गठिया गठिया-Arthritis गठिया-Gout गड़तुम्बा गंध गन्ने का रस गरमा गरम गर्भ निरोधक गर्भधारण गर्भपात गर्भवती गर्भवती कैसे हों? गर्भावस्था गर्भावस्था की विकृतियां-Disorders of Pregnancy गर्भावस्था के दौरान संभोग-Sex During Pregnancy गर्भावस्था-Pregnancy गर्भाशय गर्भाशय भ्रंश गर्भाशय-उच्छेदन के साइड इफेक्ट्स-Side Effects of Hysterectomy गर्म पानी गर्मी गर्मी-Heat गलगण्ड गाजर गाजवां गांठ गाँठ-Knot गारंटी गाल ब्लैडर गिलोय गिल्टी गुड़हल गुंदा गुदाभ्रंश गुर्दे गुलज़ाफ़री गुस्सा गृध्रसी गृह-स्वामिनी गैस गैस्ट्रिक गोक्षुरादि चूर्ण गोखरू गोखरू (LAND CALTROPS) गोंद कतीरा-Hog-Gum गोंदी गोभी-Cabbage गोरख मुंडी गोरखमुंडी ग्रीन-टी घमोरी घरेलु ​नुस्खे घाघरा घाव चकवड़ चक्कर चपाती चमत्कारिक सब्जियां चरित्र चर्बी चर्म चर्म रोग चर्मरोग चाय चाय-Tea चालीस के पार-Forty Across चिकनगुनिया चिकित्सकीय चिंतित चिरायता-Absinth चिरोटा चुंबन चोक चौलाई छपाकी छरहरी काया छाछ छाले छींक छीकें छुअ छुआरा छुहारा छोटा गोखरू छोटा धतूरा छोटी हरड़ जंक फूड जकवड़ जंगली-कटीली चौलाई जटामांसी-Spikenard जलजमनी जलन जलोदर रोग-Ascites Disease जवारा जवारे जवासा-Alhag जहर जामुन का जूस जायफल जिगर जीरा जीवन रक्षक जीवनी शक्ति जुएं जुकाम जुदाई जुलाब जूएं जूस जूस-Juice जोड़ों के दर्द जोड़ों में दर्द जौ ज्यूस ज्योति ज्वर ज्वर-Fiver झाइयाँ झांईं झुर्रियाँ झुर्रियां झुर्री झूठे दर्द टमाटर का रस टमाटर-Tomatoes टाइफाइड टाटबडंगा टायफायड टूटी हड्डी टॉन्सिल टोटला ट्यूमर ठंड ठंडापन ठेकेदार डॉक्टर डकार डकारें डायबिटीज डायरिया डिजिसेक्सुअल डिटॉक्सीफाई डिटॉक्सीफिकेशन डिनर डिब्बाबंद भोजन डिलेवरी डीकामाली डीगामाली डेंगू डेंगू-Dengue डॉ. निरंकुश डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' डॉ. मीणा ढकार ढीलापन ढीली योनि तकलीफ का सही इलाज तम्बाकू तरबूज-Watermelon तलाक ताकत तिल तिल्ली तुंबा तुंबी तुलसी तेल त्रिदोषनाशक त्रिफला त्वचा त्वचा रोग थकान थाईरायड थायरायड-Thyroid थायरॉइड दण्डनीय अपराध दंत वेदना दन्तकृमि दन्तरोग दमा दर वेदना दर्द दर्द निवारक दर्द निवारक दवा दर्दनाक दस्त दही दाग-धब्बे-Stains-Spots दाढ़ दांत दांतो में कैविटी-Teeth Cavity दाद दाम्पत्य दाम्पत्य विवाद सलाहकार दाम्पत्य-Conjugal दाल दालचीनी दालें दिमांग दिल दीर्घायु दु:खी दुर्गंध दुर्बलता दुष्प्रभाव दुष्प्रभावरहित दूध दूध वृद्धि दूधी दूधी-Milk Hedge दृष्टिदोष दो मन द्रोणपुष्पी-Leucas Cephalotes धड़कन धनिया बीज धनिया-Coriander धमासा धातु धातु पतन धार्मिक धूम्रपान छोड़ना चाहते हैं? धैर्यहीन नज़ला नपुंसकता नाक नाखून नागबला नागरमोथा नाडी हिंगु नाड़ी हिंगु (डिकामाली) नामर्दी नारकीय पीड़ा नारियल नाश्ता निमोनिया निम्न रक्तचाप निम्बू नियासिन निराश निरोगधाम निर्गुण्डी निर्गुन्डी निष्कपट स्नेह निष्ठा निसोरा नींद नींबू नींबू-Lemon नीम-azadirachta indica नुस्खे नुस्खे-Tips नेगड़ नेत्र रोग नेुचरल नैतिक नॉर्मल डिलेवरी नोनिया नौसादर न्युमोनिया-Pneumonia न्यूरॉन्स पक्षघात पंचकर्म पढ़ने में मन लगेगा पंतजलि पत्तागोभी-CABBAGE पत्थर फोड़ी पत्थरचट्टा पत्नी पथरी पदार्थ पनीर पपीता पपीता-CARICA PAPPYA पमाड परदेशी लांगड़ी परम्परागत चिकित्सा परहेज पराठा परामर्श परिस्थिति पवाड़ पवाँर पाइल्स पाक-कला पाचक पाचन पाचनतंत्र पाचनशक्ति पाठक संख्या 16 लाख पार पाठक संख्या पंद्रह लाख पायरिया पारदर्शिता पारिजात पालक पालक-Spinach पित्त पित्ताशय पित्ती पिंपल-मुंहासे-Pimples-Acne पिरामिड पीलिया पीलिया-Jaundice पीलिया-कामला-Jaundice पुआड़ पुदीना पुनर्नवा-साटी-सौंटी-Punarnava पुरुष पुंसत्व पेचिश पेट के कीड़े पेट दर्द पेट में गैस पेट रोग पेड़ पेद दर्द पेशाब पेशाब में रुकावट पेंसिल थेरेपी-Pencil Therapy पौधे पौरुष पौष्टिक रागी रोटी प्याज-Onion प्यास प्रजनन प्रतिरक्षा प्रतिरक्षा प्रणाली प्रतिरोधक प्रतिरोधक-Resistance प्रदर प्रमेह प्रवाहिका (पेचिश)-Dysentery प्रसव प्रसव सुरक्षा चक्र प्रसव-पीड़ा प्रसूति प्राणायाम प्रेग्नेंसी-Pregnancy प्रेम प्रेमरस प्रेमिका प्रेमी प्रोटीन प्रोटीन का कार्य प्रोटीन के स्रोत प्रोस्टेट प्रोस्टेट ग्रन्थि प्लीहा प्लूरिसी-Pleurisy प्लेटलेट्स फफूंद-Fungi फरास फल फल-Fruit फाइबर फिटकरी फुंसी-Pimples फूलगोभी-CAULIFLOWER फेंफड़े फेरम फॉस फैट फैटी लीवर फोटोफोबिया फोड़ा फोड़े-Boils फोरप्ले फोलिक एसिड फ्लू फ्लू-Flu फ्लेक्स सीड्स बकायन बकुल बड़ी हरड़ बथुआ बथुआ पाउडर बथुआ-White Goose Foot बदबू बबूल-ACACIA बरसाती बीमारियाँ बरसाती बीमारियां बलगम बलवृद्धि बला बलात्कार बवासीर बहरापन बहुनिया बहुमूत्रता- बांझपन बादाम-Almonds बादाम. बाल बाल झड़ना बाल झडऩा-Hair Falling बिना सिजेरियन मां बनें बिवाई बीजबंद बीड़ी बीमारियों के अनुसार औषधियां बीमारी बुखार बूंद-बूंद पेशाब बेल बेली बैक्टीरिया बॉयोकैमी ब्र​ह्मदण्डी ब्रेस्ट ग्रोथ ब्लड प्रेशर ब्लैक मेलिंग ब्लॉकेज भगंदर भगंदर-Fistula-in-ano भगनासा भगन्दर भगोष्ठ भड़भांड़ भय भविष्य भस्मक रोग भावनात्मक भुई आंवला-Phyllanthus Niruri भूई आमला भूई आंवला भूख भूख बढ़ाने भूमि भूमि आंवला भोजनलीवर मकोय मकोय-Soleanum nigrum मंजीठ मटर-PEA मंद दृष्टि मंदाग्नि मदार मधुमेह मधुमेह-Diabetes मन्दाग्नि-Dyspepsia मरुआ मरोड़ मर्द मर्दाना मलाशय मलेरिया मलेरिया (Malaria) मवाद मसाले मस्तिष्क मस्से मस्से-WARTS महंगा इलाज महत्वपूर्ण लेख महाबला माइग्रेन माईग्रेन माईंड सैट माजूफल मानवव्यवहार मानसिक मानसिक लक्षण मानसिक-Mental मानिसक तनाव-Mental Stress मायोपिया मासिक मासिक-धर्म मासिकधर्म मासिकस्राव माहवारी मिनरल मिर्गी मिर्च-Chili मीठा खाने की आदत मुख मैथुन-ओरल सेक्स-Oral Sex मुख्य लक्षण मुधमेह मुलहठी मुलेठी मुहाँसे मूँगफली मूड डिस्ऑर्डर-Mood Disorders मूत्र मूत्र असंयमितता मूत्र में जलन-Burning in Urine मूत्राशय मूत्रेन्द्रिय मूर्च्छा (Unconsciousness) मूली मूली कर रस मृत्यु मृत्युदण्ड मेथी मेथी दाना मेंहदी मैथुन मोगरा (Mogra) मोटापा मोटापा-Obesity मोतियाबिंद मौत मौलसिरी मौसमी बीमारियां यकृत यकृत प्लीहा 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