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स्वास्थ्य रक्षक सखा: पाठक संख्या 16 लाख पार




हैल्थ केयर फ्रेण्ड को मिले पाठकों के असीम प्रेम और समर्थन के लिये आभार। पाठक संख्या 16 लाख पार करने तथा प्रतिदिन एक हजार से अधिक पाठकों की संख्या, सभी को बधाई। इस अवसर पर एक बार फिर से विश्वास दिलाते हैं कि पाठकों को स्वास्थ्य रक्षा हेतु अधिक उपयोगी और विश्वसनीय सामग्री उपलब्ध करवाने की कोशिश की जायेगी।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’-संचालक एवं सम्पादक 9875066111
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यह भी पढें: प्रसव सुरक्षा चक्र (Pregnancy Safeguard) प्राप्त करें और बिना सिजेरियन/आॅपरेशन मां बनें-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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28 साल पुरानी गुदाभ्रंश (rectum collapse) की पीड़ा से मुक्ति


चित्र: गूगल से साभार।
इस वक्त मेरी आयु 57 साल है। 28-29 साल की उम्र में मुझे टायफाईड हुआ था। इलाज के दौरान न जाने कौनसी दवाई खाई कि मेरी गुदा बाहर आने लग गयी। तब से लेकर 3 महिने पहले तक मैंने 28 साल में कितनी पीड़ा झेली है। इसको मैं शब्दों में बयान करने में असमर्थ हूं। मैंने अनेकों डॉक्टर्स से इलाज करवाया, लेकिन स्थायी लाभ नहीं मिला। इसी बीच ट्रेन में मेरी एक मित्र से मुलाकात हुई। बात ही बातों में, मैंने उन्हें अपनी तकलीफ बताई तो उन्होंने मुझ डॉ. पुरुषोत्तम मीणा जी के नम्बर 9875066111 लिखाये। मैंने काल किया तो डॉक्टर साहब के कहने पर मैंने अपने बेटे के मोबाईल के वाट्स एप से डॉक्टर साहब को सारी जानकारी भेजी। पहला कोर्स मात्र 1370 रुपये का भेजा, मुझे तब आश्चर्य हुआ, जबकि 7वें दिन ही मेरी गुदा का बाहर निकलना बन्द हो गया। मगर डॉ. साहब ने कहा कि जब तक मैं बन्द नहीं करूं तब तक दवाई चलने देना है। मात्र तीन महिने की दवाई के बाद मैं गुदाभ्रंश अर्थात गुदा बाहर निकलने की नारकीय पीड़ा से पूरी तरह से मुक्त हो चुका हूं। डॉ. साहब को मेरी दिली दुआएं हैं।-रामशरण शुक्ला, बरेली, उत्तर प्रदेश।

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डॉक्टर टिप्पणी: गुदाद्वार के बाहर निकलने को आम बोलचाल में कांच निकलना भी कहा जाता है। इस तकलीफ के कारण हजारों-लाखों लोग असहनीय पीड़ा झेलने को विवश हैं। जबकि लाइलाज समझी जाने वाले गुदाभ्रंश (rectum collapse) की पीड़ा से मुक्ति सम्भव है। ग्रदाभ्रंश से पीड़ित अनेकों रोगियों को हमने स्वस्थ किया है और अब वे सामान्य जीवन जी रहे हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' आॅन लाईन होम्योपैथ डॉक्टर एवं परम्परागत उपचारक। परामर्श समय : 10 AM से 10 PM के बीच। Mob & Whats App No. : 9875066111
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ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार माइग्रेन (Migraine)

नोट: हमारे अनुभव से यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि ऐलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से माईग्रेन का स्थायी उपचार सम्भव नहीं होता है, लेकिन ऐलोपैथी माईग्रेन के भयंकर दर्द में तत्काल राहत देने में रामवाण सिद्ध होती है। इसके बावजूद भी आधुनिक विज्ञान में अत्यधिक विश्वास रखने वाले मरीजों की जानकारी के लिये बताना जरूरी है कि ऐलोपैथ चिकित्सक माईग्रेन के बारे में क्या सोचते हैं? अत: यहां ऐलोपैथिक चिकित्सकों के अनुभवों पर आधारित जानकारी संकलित करके प्रस्तुत की जा रही है।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' आॅन लाईन होम्योपैथ एवं परम्परागत चिकित्सक।

ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार माइग्रेन क्या है?
माइग्रेन (Migraine) एक प्रकार का मस्तिष्क का रोग या विकार है, जिसमें रोगी को भयंकर और असहनीय सिरदर्द होता है। इसे आम बोलचाल में आधासीसी भी कहा जाता है। यह प्राय: शाम के समय प्रारंभ होता है। इसमें दर्द 2 से 72 घंटे तक हो सकता है।

ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार माइग्रेन के कितने प्रकार होते हैं?
माइग्रेन दो प्रकार के होते हैं :
(1) एपिसॉडिक माइग्रेन (प्रासंगिक माइग्रेन)
(2) क्रॉनिक माइग्रेन (दीर्घकालिक माइग्रेन)

ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार माइग्रेन में कौन से अंग प्रभावित होते हैं?
इस में सिर में एकतरफा दर्द होता है। इसलिए आम बोलचाल की भाषा में इसे आधासीसी, अधकपारी, अर्द्धसिरशूल आदि नामों से भी पुकारा जाता है।

ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार माइग्रेन के लक्षण?
माइग्रेन में जी का मिचलाना, वोमिटिंग, फोटोफोबिया (प्रकाश वृद्धि पर संवेदनशील होना), फोनोफोबिया (ध्वनि वृद्धि में संवेदनशीलता) और शारीरिक गतिविधियों का बढ़ जाना प्रमुख लक्षण है। सेरेब्रल कॉर्टेक्स (मस्तिष्क की बाहरी परत है, जो कि टिशू होता है) में वृद्धि के कारण उत्तेजना और दर्द अधिक होता है।

ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार माइग्रेन के कारण?
मौसम में बदलाव (खासकर मानसून में इसके मरीजों की संख्या कई गुनी बढ़ जाती है), वातावरण में होने वाला शोर-शराबा, मोटर-गाड़ी की आवाज, शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव, रोशनी का अधिक और कम होना, तनाव, भावात्मक तनाव, कम सोना, धूम्रपान करने से तथा अन्य कई कारकों से माइग्रेन के रोगी प्रभावित होते हैं।

ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार माइग्रेन से कौन अधिक अधिक प्रभावित होते हैं?
माइग्रेन किशोरावस्था से पहले लड़कियों की तुलना में लड़कों को अधिक प्रभावित करता है, लेकिन वयस्क अवस्था में पुरुषों की तुलना में महिलाओं में माइग्रेन होने की आशंका अधिक होती है। यद्यपि ऐसा देखा गया है कि प्रसव काल के दौरान इसकी आशंका काफी कम हो जाती है।

ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार माइग्रेन में बढोतरी के कारण?
अपने देश में माइग्रेन बढ़ने की वजह लोगों की जीवनशैली में तेजी से आया बदलाव है। इस कारण कॉर्पोरेट कल्चर में बेहतर मांग को लेकर आम लोगों के जीवन में हमेशा तनाव रहता है। हालांकि माइग्रेन को लेकर कोई एक सर्वमान्य सिद्धांत नहीं है। यह एक मस्तिष्क विकार माना जाता है। इसका प्राथमिक सिद्धांत यह है कि अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में दर्द निवारक दवाओं का प्रयोग करते हैं, जो स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।

ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार माइग्रेन में में बढोतरी के प्रमुख कारण?
माइग्रेन के मरीजों की संख्या में वृद्धि होने की मुख्य वजह हमारी बदलती जीवनशैली है। दुनियाभर के 15 प्रतिशत लोग माइग्रेन से पीडित हैं। वर्ष अर्थात 2013 में संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 6 फीसदी पुरुष और 18 फीसदी महिलाएं माइग्रेन से प्रभावित हुईं, जबकि यूरोप में पिछले वर्ष माइग्रेन से 12 से 18 प्रतिशत तक आबादी प्रभावित हुई। इनमें 6 से 15 प्रतिशत पुरुष और 14 से 35 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। क्रॉनिक माइग्रेन से विश्व की कुल जनसंख्या में से 1.4 से 2.2 प्रतिशत लोग प्रभावित हैं। सिरदर्द पश्चिमी देशों की तुलना में एशिया और अफ्रीका में कम है, लेकिन इसके बारे में सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार माइग्रेन का इलाज?
ऐलोपैथ चिकित्सकों का मानना है कि इस बीमारी का इलाज दो तरह से होता है। पहला एक्यूट ऑबरेटिव ट्रीटमेंट और दूसरा प्रिवेंटिव ट्रीटमेंट। इस बीमारी में उपचार का पहला उद्देश्य लक्षणों को दूर करना होता है। उसके बाद सिरदर्द को कंट्रोल करना पड़ता है। माइग्रेन में प्राथमिक उपचार का लक्ष्य आवृत्ति, तीव्रता और सिरदर्द को कम करना होता है। इस उपचार में मरीज को कम से कम तीन महीने और कुछ स्थिति में छ: महीने तक नियमित दवा लेनी चाहिए। रोगी को इस बीमारी में प्राथमिक उपचार कराना चाहिए और डॉक्टर की सलाह से दवा लेनी चाहिए। उपचार निवारक पद्धति में पहले दवा की कम खुराक दी जाती है और धीरे-धीरे खुराक को तब तक बढ़ाया जाता है, जब तक कि दर्द से निजात न मिल जाए। इस पद्धति में मरीज को दवा का साइड इफेक्ट न हो, इसका भी पूरा ख्याल रखा जाता है। भावनात्मक उपचार द्वारा प्राय: असंवेदनशील रोगियों का इलाज किया जाता है।

ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार एक्यूपंचर चिकित्सा: एक्यूपंचर चिकित्सा प्रासंगिक माइग्रेन और दीर्घकालिक माइग्रेन, दोनों में कारगर बतायी जाती है, परंतु ऐलोपैथ डॉक्टर्स का कहना है कि उनके शोधों के परिणामों के अनुसार यह पता लगता है कि एक्यूपंचर का प्रभाव दवा की तुलना में आभासी/दिखावटी ही होता है। स्थायी प्रभाव नहीं मिलते हैं।

ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार माइग्रेन से बचाव हेतु सावधानियां?
डॉक्टर्स का अनुभव है कि यह रोग हवा और धूप के पड़ने से 30 प्रतिशत बढ़ जाता है। रोशनी और सोने की अनियमित आदतें माइग्रेन बढ़ने का प्रमुख कारण है। मौसमी सिरदर्द 75 प्रतिशत दूषित पर्यावरण और 46 प्रतिशत अन्य कारणों से होता है। प्रत्येक 9 डिग्री फॉरेंहाइट तापमान बढ़ने पर 7.5 प्रतिशत बीमारी बढ़ने का जोखिम रहता है। समझदारी और जानकारी इस बीमारी से बचाने में मददगार हो सकती है। इससे बचने के लिए एक डायरी बनाएं, जिसमें माइग्रेन से संबंधित सभी तथ्यों का समावेश होना चाहिए। मसलन पहली बार सिरदर्द होने पर कितनी देर तक सिरदर्द हुआ और उसके लक्षण क्या थे, सिरदर्द पहले से ज्यादा हो रहा है या कम, इस दौरान कौन सी दवाएं ली गईं आदि।

ऐलोपैथ चिकित्सकों के अनुसार माईग्रेन से इससे बचाव के उपाय:
1. अधिक से अधिक पानी पिएं।
2. भीड़-भाड़ वाले स्थान पर जाने से बचें।
3. कॉफी का सेवन करना लाभदायक होता है, लेकिन सीमित मात्रा में।
4. सूर्य की रोशनी से दूर रहें।
5. स्नान के समय वॉशरूम की लाइट ऑफ रखा करें।
6. नियमित समय पर खाना खाएं और सोएं।
7. सिरदर्द अधिक होने पर बर्फ के गोले से सेंक करें।
8. अनजान दवाओं का सेवन न करें।
9. हार्मोन की नियमित जांच करवाएं।
10. काले चश्मे का प्रयोग करें, जो आपको धूप से बचाए।
11. रात में अच्छी नींद लें।
12 .अपनी कार्य क्षमता को जानें और तनाव से मुक्त रहें।
13. सोते समय कमरे की बत्ती बुझा दें।

मेरी टिप्पणी: होम्योपैथी और आयुर्वेद के जरिये माईग्रेन के 70 फीसदी से अधिक रोगियों का स्थायी उपचार सम्भव है, जबकि 20 फीसदी रोगियों को यदा-कदा हानिरहित दवाईयों का सेवन करना पड़ता है। 10 फीसदी रोगी ऐसे भी होते हैं, जिन्हें नियमित रूप से दवाईयों का सेवन करना होता है। जिनसे किसी प्रकार की शारीरिक हानि नहीं होती है। इस विषय में शीघ्र ही अलग से जानकारी प्रस्तुत की जायेगी।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' आॅन लाईन होम्योपैथ एवं परम्परागत चिकित्सक।

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भारत में 40 फीसदी तक प्रसव सिजेरियन अर्थात आॅपरेशन के जरिये हो रहे हैं। जिसके कारण प्रसूता का जीवन और पिता का बजट दोनों ही गड़बडा रहे हैं। अनेक ऐजेंसियों की ओर से किये गये सर्वे प्रमाणित करते हैं कि सामान्य और स्वाभाविक प्रसवों को भी सिजेरियन/आॅपरेशन में बदला जा रहा है। जिसका मूल कारण है—धन की कभी न मिटने वाली लालसा। जबकि 90 फीसदी गर्भवती माताओं का प्रसव सामान्य हो सकता है। जिसके लिये अज्ञानता और भय सबसे बड़ी समस्या हैं। जबकि दूसरी ऐसे वाकये भी सामने आते रहते हैं, जबकि डॉक्टर्स के द्वारा सिजेरियन/आॅपरेशन के लिये दबाव बनाया जाता है। कारण जो भी हों, लेकिन इस कारण प्रसूताओं और उनके परिवारों को तरह-तरह की तात्कालिक और स्थायी तकलीफें झेलनी पड़ती हैं। जैसे:-

1. 90 फीसदी गैर-जरूरी: सिजेरियन/आॅपरेशन के जरिये जितने प्रसव होते हैं, उनमें से करीब 90 फीसदी गैर-जरूरी होते हैं। जिन्हें सामान्य प्रसव करवाया जा सकता है।

2. असहनीय पीड़ा: सिजेरियन/आॅपरेशन के कारण प्रसूता को असहनीय पीड़ा सहनी पड़ती है।
3. स्त्री का सौन्दर्य हमेशा को नष्ट हो जाता है: सिजेरियन/आॅपरेशन के जरिये प्रसव होने पर नवप्रसूता युवा स्त्री का शारीरिक सौन्दर्य हमेशा को नष्ट हो जाता है। जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती।

4. शारीरिक और मानसिक तकलीफें: सिजेरियन/आॅपरेशन के जरिये प्रसव कराने पर महिलाओं को शारीरिक समस्याओं के साथ-साथ अनेक प्रकार की मानसिक तकलीफें उत्पन्न होने के मामले भी सामने आ रहे हैं। जिनके भयंकर दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।
5. दूसरा प्रसव भी सिजेरियन/आॅपरेशन: पहला प्रसव सिजेरियन/आॅपरेशन से होने के बाद डॉक्टर्स द्वारा यही बताया जाता है कि दूसरा प्रसव भी सिजेरियन/आॅपरेशन के जरिये ही होगा। इस कारण औरतें मानसिक रूप से दूसरे प्रसव को भी सिजेरियन/आॅपरेशन मानकर ही गर्भधारण करती हैं और परिणाम भी सिजेरियन/आॅपरेशन ही होता है। जिसके पीछे लॉ-आॅफ-अट्रेक्शन का सिद्धान्त काम करता है। जबकि पूरी तैयारी और बिना पूर्वाग्रह के दूसरा गर्भ धारण किया जाये तो दूसरा प्रसव सामान्य भी हो सकता है। मेरी देखरेख में ऐसे अनेक मामलों में सफलता मिली है।

6. जीवनभर के लिये लाचार और अक्षम: सिजेरियन/आॅपरेशन के जरिये शिशु को जन्म देने वाली प्रसूता अनेक प्रकार के घरेलु शारीरिक कार्य करने में जीवनभर के लिये लाचार और अक्षम हो जाती हैं।

7. गैर-जरूरी खर्चा: सिजेरियन/आॅपरेशन के जरिये प्रसव कराने पर प्रसूता के परिवार को गैर-जरूरी खर्चा वहन करना पड़ता है। जिसके चलते अनेक गरीब परिवार कर्ज में डूब जाते हैं जो कालान्तर में गृह-कलह का कारण बनते हैं। इस कारण नवजात शिशु की उचित देखभाल और पोष्टिक पोषण में दिक्कतें आती हैं।

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[दाम्पत्य सुख को समझने और भोगने के इच्छुक हर एक स्त्री और पुरुष को पढने योग्य अति महत्वपूर्ण और उपयोगी जानकारी प्रदान करने वाला एक पढने योग्य आलेख!-"अतृप्त दाम्पत्य कारण एवं निवारण!" ]
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उपरोक्त हालातों में गर्भवती स्त्रियों को उक्त तकलीफों से बचाने में होम्योपैथी और आयुर्वेद की औषधियां मजबूत प्रसव सुरक्षा चक्र—का काम करती है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि गर्भवती स्त्रियों द्वारा तीसरे महिने के बाद से होम्योपैथिक तथा आयुर्वेदिक दवाईयों का नियमित रूप से सेवन करने से अकल्पनीय और अद्भुत परिणाम सामने आते हैं। हमारी ओर से यह प्रसव सुरक्षा चक्र पिछले दो दशक से अधिक समय से गर्भवती माताओं को उपलब्ध करवाया जा रहा है। 90 फीसदी से अधिक मामलों में गर्भवती स्त्रियों को निम्न फायदे होते हैं:—

1. प्रसव न समय पहले और न निर्धारित समय के बाद।

2. गर्भस्त्राव या गर्भपात का खतरा नहीं के बराबर।

3. पांचवें महिने से ही गर्भस्थ शिशु की देखरेख। जिससे स्वस्थ शिशु का जन्म हो और दांत निकलने में होने वाली तकलीफों में कमी लायी जा सके। 

4. प्रसव से कुछ दिनों पहले होने वाले झूठे दर्द/फॉल्स लेबर पैन (False Labor Pain) नहीं होते और निर्धारित समय पर प्रसव से कुछ घण्टे पूर्व ही प्रसव पीड़ा शुरू होकर सामान्य प्रसव। अनेक मामलों में घर पर ही आसान और सामान्य प्रसव हो जाते हैं।

5. निर्धारित समय पर (280 दिन में) बिना सिजेरियन/आॅपरेशन सामान्य, सुरक्षित और आसान प्रसव।

6. माताओं को होने वाली प्रसव पीड़ा में 40 से 50 फीसदी तक कमी।

7. प्रसव के बाद स्त्री जननांगों में ढीलापन नहीं। प्रसव के 3 माह बाद तक सम्भोग नहीं करने पर स्त्री की योनि लगभग पूर्ववत स्थिति में सिकुड़ जाती है। ​जिससे सम्भोग के दौरान यौनानंद में कोई कमी नहीं आती। योनि ढीलेपन की समस्या नहीं होती।

उपचार कहां से प्राप्त करें?

अपने पास के किसी भी अनुभवी होम्योपैथ तथा आयुर्वेद डॉक्टर से सम्पर्क करें और उनसे प्रसव सुरक्षा चक्र प्राप्त करें। या मोबाईल/वोट्स एप नम्बर 98750 66111 पर हम से सीधे सम्पर्क करें।

खर्चा कितना?

वैसे तो प्रसूता की स्थिति को जानने के बाद ही वास्तविक खर्चा बताया जा सकता है। क्योंकि भारत में अधिकतर मामलों में बिना तैयारी के ही औरतें गर्भवती हो जाती हैं। जिनमें से बहुत सारी ऐनेमिक (Anemic) अर्थात रक्ताल्पता की शिकार होती हैं। अत: यदि किसी विशेष पौष्टिक सप्लीमेंट की जरूरत नहीं हो तो प्रसव सुरक्षा चक्र सामान्यत: पैकिंग और पोस्टेज सहित न्यूनतम 900 रुपये और अधिकतम 1500 रुपये प्रतिमाह के बीच का खर्चा पड़ता है।

क्या व्यक्तिगत रूप से मिलना पड़ता है?

नहीं, गर्भवती स्त्री को हमसे व्यक्तिगत रूप से आकर मिलने की जरूरत नहीं होती है। फोन, मोबाईल और वाट्स एप के जरिये सारी जानकारी बतायी और पूछी सकती हैं। लेकिन समय-समय पर किसी योग्य प्रसूता विशेषज्ञ को दिखाते रहने की सलाह अवश्य दी जाती है।

परामर्श:सम्भव हो तो गर्भधारण से पहले अन्यथा गर्भधारण के तत्काल बाद तुरंत अपने चिकित्सक से परामर्थ करें या वाट्सएप+मो. नं. 9875066111 पर हम से सम्पर्क करें। 95 फीसदी मामलों में हम से व्यक्तिगत रूप से आकर मिलने की जरूरत नहीं पड़ती है।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' आॅन लाईन होम्योपैथ एवं परम्परागत चिकित्सक, मो./वाट्स एप नं.: 09875066111
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डॉ. निरंकुश जी ने लीवर ठीक कर, मेरी सेक्स लाईफ लौटायी! शराब का सेवन कभी नहीं करें। जिन्दगी बर्बाद हो जायेगी।
मेरी एज 58 साल है। मुझे 10-15 साल की एज से ही कब्जी रहती थी। अनेक चूरण, काढे और गोली-कैप्सूल खाये। कब्जी ठीक नहीं हुई। सर्विस लगने के बाद फ्रेंड बने एक पड़ौसी ने 25 साल की उम्र में सलाह दी कि शराब का सेवन करने से कब्जी ठीक हो जाती है। शुरू में एक ढक्कन शराब पीना शुरू किया। कुछ असर हुआ। धीरे-धीरे शराब बढती गयी। मैं शराब का हैबीच्युअल हो गया। इस कारण घर में झगड़े रहने लगे। यदि मैं सरकारी नौकरी में नहीं होता तो मेरी पत्नी मुझे कभी की छोड़कर चली गयी होती। 45 की उम्र आते-आते मेरा वेट 70 से 45 किलो रह गया। पेट में भयंकर दर्द रहने लगा। सेक्स करने की इच्छा और शक्ति खतम सी हो गयी। इस कारण घर में अत्यधिक कलह बढ गयी। 8 साल छोटी पत्नी की हालत मुझ से देखी नहीं जाती थी। कुलमिलाकर जीना हराम हो गया। हरदम टेंशन ही टेंशन रहने लगा।

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अनेक डॉक्टरों को दिखाया। अनेक जांच करवायी तो सबने बताया कि लीवर खराब हो गया। मुझे सलाह दी कि शराब मेरे लिये जहर है। मगर मेरी शराब की लत नहीं छूटी। लीवर में अत्यन्त सोजन आ गयी। आंतों में अल्सर हो गये। पेट में असहनीय दर्द रहने लगा। न भूख लगती और न कुछ खाना पचता। उल्टी होने लगी। सौभाग्य से एक देशी वैद्यजी ने मेरी शराब तो छुड़ा दी। वे लीवर का भी इलाज कर रहे थे कि इसी दौरान एक दुर्घटना में वैद्य जी चल बसे। लीवर की तकलीफ की वजह से मेरा जीवन नर्क हो गया। दफ्तर में बैठकर नौकरी करना भी मुश्किल हो गया। लिव-52, त्रिफला, ईसबगोल, अनेक प्रकार के आसव और सीरप मेरी जिन्दगी के हिस्सा बन गये थे। फिर भी मैं जैसे-तैसे केवल जीवन को घसीटने की हालत में था।
इसी बीच मुझे मेरी एक सहकर्मी माधवीजी (बदला नाम) ने डॉ. निरंकुश जी के बारे में बताया कि उनकी बेटी को भयंकर ल्यूकोरिया था, जो डॉ. निरंकुश जी के इलाज से ठीक हो गया। मुझे भी डॉ. निरंकुश जी से सम्पर्क करने की सलाह दी। मैंने उनके मोबाईल 9875066111 पर बात की। मेरा सारा विवरण वाट्स एप के जरिये जानने के बाद डॉ. साहब ने कहा कि कम से कम 10 से 12 महिने तक दवाई लेनी होंगी। मेरा इलाज शुरू किया। पहले दो महिने कोई खास लाभ नहीं हुआ, तीसरे महिने मुझे लगा कि अब मेरा इलाज हो रहा है। मुझे खाने की थोड़ी-थोड़ी इच्छा होने लगी। चौथे महिने मुझे अच्छी भूख लगने लगी तथा शारीरिक शक्ति का अनुभव हुआ। दवाई लेते सात महिने हो गये हैं। अब मैं 80 परसेंट ठीक हो गया हूं। शरीर में ताकत भी बढी है। सेक्स करने की भी इच्छा होने लगी है। वजन 52 किलो हो गया है। मुझे उम्मीद है कि मैं बहुत जल्दी पूरी तरह से ठीक हो जाउंगा। मैं चाहता हूं कि मेरा नाम उजागर नहीं करें, लेकिन मेरा उक्त विवरण साईट पर सार्वजनिक किया जाये। जिससे दूसरे दु:खी लोग भी मुझे उदाहरण समझ कर अपना जीवन सुधार सकें। मैं यही कहूंगा कि शराब का सेवन कभी नहीं करें। जिन्दगी बर्बाद हो जायेगी।
—राधेश्याम गुप्ता (बदला हुआ नाम) नियर कश्मीरी गैट, दिल्ली।
~~~~~~~~मैने बहुत सारे रोगी देखे हैं। हर दिन सैकड़ों नये रोगियों के काल आते हैं। राधेश्याम गुप्ता जी अपनी आप बीती में सच नहीं लिखा है। इनकी स्थिति बहुत विचित्र रही है। इन्होंने मुझ से लीवर का इलाज करवाने के लिये सम्पर्क नहीं किया, बल्कि सेक्स पावर बढाने की दवाई के लिये सम्पर्क किया। जब इनकी सारी जानकारी प्राप्त की तो पता चला कि इनको शराब की लत थी और इनका लीवर खराब था।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/07.07.2017


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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' आॅन लाईन होम्योपैथ एवं परम्परागत चिकित्सक, 9875066111
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निरोगधाम: पर 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक मकोय
आयुर्वेद शास्त्रियों का कहना है कि मकोय का पौधा इस पृथ्वी पर यकृत के रोगों व हृदय रोगों की सबसे अच्छी औषधि कही जाती है। मकोय पीलिया (जॉन्डिस) की अचूक दवा है और इसका सेवन किसी भी रूप में किया जाए स्वास्थ्य के लिए लाभदायक ही होता है। मकोय भूख को बढ़ाने वाला फल है। इसकी कार्य क्षमता इतनी है कि इसका 10 प्रतिशत भाग भी सही रहे अर्थात् शुद्ध रहे तो भी यह काम करती रहेगी। वर्तमान समय की कड़वी हकीकत यह है कि बहुत कम आयुर्वेदिक औषधियां सही और शुद्ध मिलती हैं। इस कारण अनेक चिकित्सक विद्वानों का ऐसा अनुभव रहा है कि यदि मकोय 10 फीसदी शुद्ध हो तो भी कुछ न कुछ काम अवश्य करती है। 
कल्पना करें कि यदि खतपतवार नाशक कीटनाशकों की मार झेलने के बाद भी खेत में शेष बची मकोय को किसानों द्वारा खेत से काटकर मेड़ के आसपास जो मकोय फेंकी जाती है। वही मकोय जब सूख सड़—गल जाती है और धूप में सूख जाती। ऐसी मकोय को पंसारियों के द्वारा बेचा जायेगा, तो मकोय के सेवन से स्वस्थ होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? दूसरी ओर इस देश का दुर्भाग्य है कि बाजरा, ज्वार जैसी बहुत सस्ती फसल प्राप्त करने के लिये किसानों द्वारा मकोय जैसी महौषधि को नष्ट किया जा रहा है। मकोय के पौधे में अनेक रोगों को नष्ट करने के गुण होते हैं। जैसे—

चर्म रोग, पीलिया, गठिया, बवासीर, सूजन, कोढ़, दिल के रोग, आंखों की बीमारी, खांसी, कफ, स्वर शोधक, रसायन, वीर्य उत्पादक और वीर्यवर्द्धक, प्रमेह नाशक, ज्वर नाशक, वमन को दूर करती, नेत्रों रोगों में हितकर है। मकोय यकृत/लीवर एवं हृदय के रोगों को हरने वाली औषधि है। मकोय त्रिदोषनाशक अर्थात वात,पित्त व कफ तीनों दोषों का शमन करने वाली महौषधि है। इसके अलावा भी मकोय अनेको रोगों को ठीक करती है। 
यकृत की क्रिया विधि जब बिगड़ जाती है तो शरीर में अनेक उपद्रव यथा सूजन, पतले दस्त व पीलिया जैसे रोगों के अलाबा कई बार बवासीर जैसे रोग होने लगते हैं। इन रोगों में मकोय का सेवन बहुत ही लाभ करता है। यह औषधि यकृत की क्रियाविधि को धीरे-धीरे सुदृढ करके लीवर सम्बन्धी सभी रोगों को जड़ से नष्अ कर देती है। कुछ अन्य औषधियों के साथ इस औषधि के प्रयोग से यकृत सम्बन्धी रोग समाप्त हो जाते हैं। भूख बढ जाती है। शरीर पुष्ट हो जाता है। इस औषधि के पत्तों का रस/पाउडर आँतों में पहुँचकर वहाँ इकठ्ठे विषों को नष्ट कर देता है और विषैले द्रव्य पेशाब के मार्ग से शरीर से बाहर निकल जाते हैं। खूनी बबासीर में या मुँह के किसी भी हिस्से से रक्त स्त्राव में मकोय के पत्तों का रस लाभप्रद है। यदि शरीर में खुजली की शिकायत हो तथा वह किसी भी दवाई से मिट नहीं रही हो। तो मकोय के रस की 25 से 50 ग्राम की मात्रा लेते रहने से यह मिट जाऐंगी। इससे शरीर का रक्त शुद्ध हो जाता है और रक्त से जुड़े सभी रोग मिट जाते हैं।
उपरोक्त विवरण एक आम व्यक्ति भी आसानी से समझ सकता है कि मकोय कितनी उपयोगी और अमूल्य औषधि है। अत: हमने जयुपर स्थित हमारे निरोगधाम पर पिछले वर्ष से मकोय की 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक खेती की शुरूआत की है। जिससे मकोय का शुद्ध पाउडर रोगियों को उपलब्ध करवाया जाता है। एक दुर्घटना का शिकार हो जाने के कारण पिछले साल तो हम मकोय का मात्र 5 किलो शुद्ध पाउडर ही उपलब्ध करवा पाये थे। इस वजह से अनेक रोगियों को पर्याप्त मात्रा में मकोय पाउडर उपलब्ध नहीं करवा सके। जिसका हमें खेद है। इस महने वर्ष मकोय की खेती बढा दी है। ​हमारा लक्ष्य है कि इस बार हम मकोय, श्योनाक, शरफुंका, पुनर्नवा, भूई आंवला आदि दर्जनों 100 फीसदी शुद्ध औषधियों के सहयोग से हम कम से कम 2000 ऐसे रोगियों को स्वस्थ कर सकेंगे, जिनको जीवन लीवर या लीवर सम्बन्धी बवासीर, अपच, कब्ज, भगंदर आदि बीमारियों ने परेशान किया हुआ है।

नोट: यहां पर मकोय के जितने भी चित्र दिये गये हैं। सभी हमारे निरोगधाम पर लहलहाती मकोय के हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111, 25.06.2017

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निरोगधाम पर 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच

हमारा मकसद है रोगियों का आरोग्य अर्थात रोगमुक्ति। यह तब ही सम्भव है, जबकि उनको सही, शुद्ध और ताजा दवाईयां उपलब्ध हों। वर्तमान में बड़े-बड़े नाम वाले बाबाओं तक की औषधियां निर्धारित मानदण्डों पर खरी नहीं उतर रही हैं। ऐसे में रोगी करें भी तो करें क्या?

ऐसे में हम कम से कम हमारे सम्पर्क में आने वाले रोगियों को तो 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियां उपलब्ध करवाने की कौशिश कर रहे हैं। इस दिशा में हमने छोटी सी शुरूआत की है। हमने हमारे फॉर्म पर कुछ अति महत्वपूर्ण औषधियों की खेती शुरू की है। जिनमें यौन रोगों के निवारण तथा यौन क्षमता बढाने के लिये सुप्र​षिद्ध——कौंच——नामक औषधि भी शामिल है। पिछले वर्ष भी हमने 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच की खेती की थी। कौंच के पाउडर से अकल्पनीय परिणाम सामने आये हैं। यद्यपि हम रोगियों की जरूरत पूरी करने में असफल रहे। इस कारण इस बार हमने पिछले साल की तुलना में 100 गुणा अधिक कौंच के पौधे लगाये हैं। कौंच के पौधों का रोपण वर्षाकाल के शुरू होने से बहुत पहले ही कर दिया था। अत: अब बेल छोड़ रहे हैं। जिनके ओरिजनल चित्र प्रस्तुत हैं।

कौंच सहित महत्वपूर्ण औषधियों की पैदावार करना इस कारण भी जरूरी हो गया, क्योंकि बाजार में सड़ी—गली और अनुपयोगी औषधियां मिलती हैं। जिनसे सही परिणाम नहीं ​मिलने पर आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के प्रति लोगों का विश्वास टूटता है और उपचार करने वाला चिकित्सक बदनाम होते हैं। साथ ही रोगी के धन का भी अपव्यय होता है। रोगी का स्वास्थ्य खराब हो जाता है। इस बारे में विस्तार से जानने के लिये हमारा लेख—''कौंच : सड़ी-गली-पुरानी अनुपयोगी आयुर्वेदिक औषधियां!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश''' पढा जा सकता है।

यहां पर हमारे फॉर्म पर रोपे गये कौंच की बेलों के नवीनतम 11 जनू, 2017 के चित्र प्रस्तुत हैं।

कौंच के बारे में भी संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत है:

कौंच के पौधे के सभी भागों में औषधीय गुण होते हैं। इसकी पत्तियों, बीजों व शाखाओं का इस्तेमाल दवा के तौर पर किया जाता है। ज्यादातर कौंच का इस्तेमाल लंबे समय तक यौन—शक्ति बरकरार रखने के लिए किया जता है। आयुर्वेदाचार्यों का मत है कि कौंच के बीज अमेरिका की प्रसिद्ध सेक्स शक्ति वर्धक दवा वियग्रा से भी 10 गुना ज्यादा शक्तिशाली होते है। मेरा अपना अनुभव है कि 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक कौंच को सही तरीके से शोधन करके अन्य 100 फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक दवाईयों के साथ सेवन करने से निम्न तकलीफों में अकल्पनीय परिणाम मिलते हैं:
1 लिंग की कमजोरी।
लिंग की नसों की कमजोरी
2 वीर्य का पतलापन।
3 नपुंसकता/नामर्दी।
4 शीघ्रपतन/शीघ्रस्खलन।
5 उत्तेजना में कमी।
6 बदन दर्द/गठिया दर्द।
7 पेट/गैस की तकलीफे।
8 मधुमेह/डायबिटीज।
9 पुराना बुखार।
10 बदन में सूजन।
11 गैस की समस्या।
12 श्वेत प्रदर/ल्यूकोरिया।
13 मासिकधर्म की तकलीफें।
14 स्तन वृद्धि।
15 खिलाडि़यों की मांसपेशियों में खिंचाव।
16 शारीरिक बलवृद्धि।
17 वजन बढ़ाना।
18 पुरानी खांसी।
19 उदर कृमि नष्ट।
20 शुक्राणुओं की कमी।
इत्यादि।


नोट: हमें खेद है कि हमारे पास उपलब्ध सौ फीसदी शुद्ध आॅर्गेनिक औषधियों की उपलब्धता में कमी के कारण हम, हम से सम्पर्क करने वाले सभी आयुर्वेद प्रेक्टिशनर्स को औषधियां उपलब्ध नहीं करवा पाते हैं। क्योंकि हमारी पहली प्राथमिकता हम से सम्पर्क करने वाले रोगियों का उपचार करना है।
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मेरी पत्नी का बदबू मारने वाला ल्यूकोरिया, सिरदर्द और मेरी
नामर्दी, कब्जी, लीवर की बीमारी सहित सभी तकलीफें खत्म हो गयी

रेस्पेक्टेड डॉक्टर निरंकुश सर मैं आपका धन्यवाद किन शब्दों में अदा करूं समझ में नहीं आ रहा। आपने बहुत छोटी सी रकम लेकर मेरा व्यक्तिगत और सेक्सुअल जीवन बचा लिया। मैं 14 साल से 23 साल की उम्र तक लगभग हर रोज हस्तमैथुन करने का अभ्यस्त रहा। अनेक बार एक ही दिन में कई कई बार हस्तमैथुन करता था। इसके बाद एक खूबसूरत आंटी (मकान मालकिन) ने मुझे अपने सौंदर्य के जाल में ऐसा फंसाया कि 28 साल की उम्र तक शादी याद ही नहीं आयी। मकान मालिक अंकल के दफ्तर जाते ही आंटी मेरे साथ और मेरे दोस्त के साथ लगभग हर दिन सेक्स करती थी। अनेक बार एक ही दिन में कई कई बार भी सेक्स करवाती थी। इस चक्कर में हम दोनों का केरियर बर्बाद हो गया। जब अंकल का तबादला दूसरे शहर में हो गया और आंटी भी साथ चली गयी तब हमें पता चला कि अब शादी करनी होगी।




शादी की तो पत्नी को ल्यूकोरिया की इतनी भयंकर बीमारी कि उसकी योनि से बदबू आती थी। मैं उसके साथ सम्बन्ध ही नहीं बना पाया और पत्नी के होते हुए फिर से हस्तमैथुन शुरू हो गया। टेंशन में शराब शुरू कर दी। पत्नी का इलाज कराया तो कुछ सुधार हुआ। जिससे सेक्स शुरू हुआ। 2 बच्चे हो गए। पत्नी बच्चों में खो गयी, लेकिन मैं खुश नहीं हुआ। हमेशा टेंशन ही टेंशन और शराब ही शराब। लीवर खराब हो गया। कब्ज और पाइल्स का शिकार हो गया। पत्नी टेंशन में एकदम सूख कर लकड़ी हो गयी। उसे भयंकर सिरदर्द वाला माइग्रेन हो गया। सिर की नसें फूलने लगी और भयंकर दर्द होने पर उल्टियां होने लगी। उसके लिए रसोई और बच्चे संभालना ही मुश्किल हो गए। मैं पत्नी से विमुख, घर परिवार की कोई परवाह नहीं। मेरी सेक्स उत्तेजना जाती रही। मेरी सेक्स करने की भयंकर इच्छा होती, लेकिन शरीर साथ नहीं देता। पत्नी और मैं दोनों एक दूसरे से सेक्स सुख पाने को तरसने लगे। साथ रहकर भी अजनबी लोगों की तरह रहने लगे। पत्नी का बदन बदबू मारता और मेरा बदन निष्प्राण सा हो गया। बहुतेरी दवाई करवाई। जब तक दवा तब तक थोड़ा बहुत असर। हम दोनों ने इलाज पर डेढ़ लाख से अधिक खर्चा कर दिया, लेकिन अंत में सब बेकार।

जनवरी, 2016 की बात है। एक दिन मेरी पत्नी को उसकी सहेली ने डॉक्टर पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' जी के बारे में बताया और उनकी साईट हैल्थ केयर फ्रेंड के बारे में बताया तो नेट पर पढा। पत्नी ने मुझे बताया। मैंने इलाज और डॉक्टर के नाम से ही तौबा कर ली थी। सो इलाज करवाने से मना कर दिया। पत्नी को अपना इलाज करवाने को बोल दिया। पहले महीने में मेरी पत्नी ने 1570 रुपये की दवाई मंगवाई और उसका सिर दर्द गायब हो गया। पत्नी से मैंने डॉक्टर निरंकुश जी का नम्बर लिया और 9875066111 पर बात की और अपना इलाज शुरू करवाया।
6-7 महीना के लगातार इलाज ने हमारी दोनों की जिंदगी बदल दी। मेरी शराब की लत छुड़वाई। लीवर और कब्ज का इलाज किया तो धीरे-धीरे लिंग में उत्तेजना आने लगी। एक दिन ख़ुशी में मैंने अपनी पत्नी को बाहों में भर लिया और हम फिर से सेक्स के आनंद को पाने में सफल हुए। मेरी पत्नी का बदबू मारने वाला ल्यूकोरिया, माइग्रेन और मेरी नामर्दी, कब्जी, लीवर की बीमारी सहित सभी तकलीफें खत्म हो गयी हैं। हम दोनों डॉक्टर साहब के कर्जदार हैं। हमारा सही इलाज करके और अपने लिटरेचर तथा मौखिक समझाइश के जरिये हमारा सोचने का तरीका ही बदल दिया।-मनमोहन दुबे (परिवर्तित नाम) लखनऊ, उत्तर प्रदेश।
डॉक्टर टिप्पणी:
~~~~~~~~बेशक पेशेंट दम्पत्ति अपने इलाज के लिए मुझे श्रेय दे रहे हैं, लेकिन असल में यह अमृततुल्य तथा हानि रहित होम्योपैथिक दवाईयों और आयुर्वेद की 100 फीसदी शुद्ध ऑर्गेनिक औषधियों का कमाल है। मेरे मतानुसार सभी डॉक्टर अपने रोगी का सही से इलाज करना चाहते हैं। मगर वर्षों तक पंसारी की दुकान की शोभा बढाने वाली सड़ी-गली और निष्प्राण वनौषधियाँ इलाज में सबसे बड़ी बाधा हैं। आयुर्वेद की असफलता का यही सबसे बड़ा कारण है। हम हमारे फ़ार्म पर पैदा की गयी ताजा और 100 फीसदी शुद्ध ऑर्गेनिक औषधियों का ही उपयोग करते हैं। होम्योपैथी की विश्वसनीय फार्मेसी की दवाई खरीदते हैं और रोगी को अपना ग्राहक नहीं, अपनी चिकित्सा का मकसद समझते हैं। रोगी हम पर विश्वास करते हैं। बस सफल चिकित्सा का यही छोटा सा राज है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-9875066111

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निरोगधाम: 100% शुद्ध ऑर्गेनिक बथुआ

जयपुर (राजस्थान) से 25 किमी दूरी पर स्थित 'निरोगधाम" में आइरन के स्रोत 100% शुद्ध ऑर्गेनिक बथुआ (Chenopodium Album) की खेती की जा रही है। हमारे सम्पर्क में आने वाले रोगियों को कैमीकल्स से मुक्त 100% शुद्ध ऑर्गेनिक बथुआ का पाउडर उपलब्ध करवाकर आरोग्य प्रदान कर रहे हैं। आप 100% शुद्ध ऑर्गेनिक बथुआ (Chenopodium Album) के पाउडर का सेवन करके निम्न स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं:—




(1) लीवर रक्षक और पथरी नाशक: शुद्ध ऑर्गेनिक बथुआ का उपयोग यकृत/लीवर को बढ़ने (लीवर एनलार्जमेंट) से रोकता है। इसकी तासीर ठंडी और तर होती है। अत: आमाशय को ताकत देता है और पथरी के बनने को रोकता है।






(2) निरोगी काया: शुद्ध ऑर्गेनिक बथुआ काया को निरोगी बनाता है। शुद्ध ऑर्गेनिक ताजा बथुआ या बथुआ के पाउडर के स्वादिष्ट रायते तथा साग का नित्य सेवन करें। अधिक परिणाम पाने के लिये जहां तक सम्भव हो मसालों का कम से कम प्रयोग करें। नमक यदि डालना ही है तो काला या सैंधा नमक ही काम में लें।






(3) घुटने का दर्द: घुटने में दर्द है तो शुद्ध ऑर्गेनिक ताजा बथुआ या बथुआ का पाउडर पानी में उबालकर इसे छान लें। इस पानी से दर्द वाले घुटने की सिकाई करें। शुद्ध ऑर्गेनिक बथुए का साग अधिकाधिक खाएं। इस प्रकार घुटने के दर्द में राहत मिलेगी।






(4) झुर्रियों से रहित-साफ-सुथरा चेहरा: चेहरे की झुर्रियों को कम करने के लिए शुद्ध ऑर्गेनिक बथुआ या बथुए के पाउडर के पानी से (बथुआ उबालकर पानी छानने के बाद) चेहरा धोएँ, चेहरा चिकना और सुथरा दिखेगा, धीरे-धीरे नित्य सेवन से झुर्रियां भी कम हो जायेंगी।



(5) रक्ताल्पता दूर कर रक्त वृद्धि में सहायक: शरीर में रक्त की कमी पर शुद्ध ऑर्गेनिक बथुए का साग या ब​थुए का पाउडर कुछ दिनों तक सेवन करने अथवा इसे आटे के साथ मिलाकर रोटी बनाकर खाने से रक्ताल्पता दूर होती है और रक्त की वृद्धि होती है।




(6) उदर कृमी : शुद्ध ऑर्गेनिक ताजा बथुआ या बथुआ के पाउडर का सेवन करने से पेट के कृमी स्वत: मर जाते हैं।


(7) अनियमित मासिक धर्म: 50 ग्राम शुद्ध ऑर्गेनिक ताजा बथुआ को एक ग्लास पानी में उबाल-छानकर नियमित कुछ दिनों तक पीने से या एक चम्मच बथुआ पाउडर का काढा बनाकर पीने से अनियमित मासिक धर्म की समस्या से मुक्ति मिल जाती है।



नोट : उपरोक्त के अलावा भी बथुआ के बहुत से स्वास्थ्य लाभ होत हैं, लेकिन शर्त यह है कि शुद्ध और आर्गेनिक बथुआ ही सेवन करें। आम तौर पर गैहूं की खेती के साथ खरपतवार के रूप में उगने वाला बथुआ ही सब्जी मंडी/बाजार में मिलता/उपलब्ध है। जिसमें गैहूं में उपयोग किये जाने वाले सभी उर्वरक खादों और कीटनाशकों के विषैले तत्व मौजूद/मिश्रित रहते हैं। अत: ऐसे ताजा ब​थुआ या बथुआ पाउडर से रोगी को स्वास्थ्य लाभ की उम्मीद नहीं की जा सकती।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-9875066111,110617
M & WA No. 9875066111
http://www.healthcarefriend.in

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--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!

--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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आंवला-Phyllanthus Niruri भूई आमला भूख भूख बढ़ाने भूमि आंवला भोजनलीवर मकोय मकोय-Soleanum nigrum मंजीठ मटर-PEA मंद दृष्टि मंदाग्नि मदार मधुमेह मधुमेह-Diabetes मन्दाग्नि-Dyspepsia मरुआ मर्दाना मलेरिया (Malaria) मस्तिष्क मस्से मस्से-WARTS महाबला माइग्रेन माईग्रेन माईंड सैट माजूफल मानसिक मानसिक-Mental मानिसक तनाव-Mental Stress मायोपिया मासिक मासिक-धर्म मासिकधर्म मासिकस्राव माहवारी मिनरल मिर्गी मिर्च-Chili मुख मैथुन-ओरल सेक्स-Oral Sex मुधमेह मुलहठी मुलेठी मुहाँसे मूँगफली मूड डिस्ऑर्डर-Mood Disorders मूत्र मूत्र असंयमितता मूत्र में जलन-Burning in Urine मूत्राशय मूर्च्छा (Unconsciousness) मूली मृत्यु मृत्युदण्ड मेथी मेथी दाना मेंहदी मैथुन मोगरा (Mogra) मोटापा मोटापा-Obesity मोतियाबिंद मौत मौलसिरी मौसमी बीमारियां यकृत यकृत प्लीहा यकृत वृद्धि-Liver Growth यकृत-लीवर-जिगर-Lever यूपेटोरियम परफोलियेटम योग विज्ञापन योन योनि योनि ढीली योनि शिथिल योनि शूल-Vaginal Colic योनि संकोचन योनी योनी संकोचन यौन यौन आनंद यौन दौर्बल्य यौनशक्ति यौनशिक्षा यौनानंद यौनि रक्त प्रदर (Blood Pradar) रक्त रोहिड़ा-TECOMELLA 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