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स्त्री ​के दिमांग की तुलना में पुरुष का दिमांग करीब 10% बड़ा होता है, लेकिन फिर भी स्त्रियों में संवेदनात्मक बौद्धिक क्षमताएं अधिक होती है!

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
आधुनिक विज्ञान ने मशीनों के माध्यम से अनेक अनसुलझी गुथ्थियों को सुलझा कर सामने रख दिया है। जैसे पोजीट्रान एमिशन टोमोग्राफी (पेट) स्कैन [Positron Emission Tomography (PET) Scans] जैसी मशीनों ने इस बात को सिद्ध कर दिया है कि स्त्री ​के दिमांग की तुलना में पुरुष का दिमांग करीब 10% बड़ा होता है। मगर इसका मतलब यह कतई नहीं कि दिमांग का आकार छोटा होने के कारण स्त्री की दिमांगी क्षमताएं पुरुषों से कम या कमतर होती हैं। बल्कि महिलाओं के दिमांग के कुछ हिस्सों में न्यूरॉन्स (Neurons) पुरुषों के दिमांग में पाये जाने वाले न्यूरॉन्स से अधिक होते हैं। जिनका कार्य मानव शरीर के कार्यों, विचारों और इंद्रियों को नियंत्रित/संचालित करना होता है। 

मामला केवल स्त्रियों के दिमांग के कुछ हिस्सों में न्यूरॉन्स की अधिकता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मनोवैज्ञानिकों का दावा है कि सामान्यत: पुरुष अनादिकाल से अपने दिमांग के केवल बांये हिस्से का ही इस्तेमाल करते आये हैं। जबकि स्त्रियां अपने दिमांग के दोनों हिस्सों का उपयोग करती आयी हैं। इस वजह के दोनों के मध्य के पारस्परिक व्यवहार, हालातों और, या आपसी या पारिवारिक रिश्तों की गहराई, महत्ता और संवेदनशीलता को भावनात्मक रूप से समझने में पुरुषों की तुलना में स्त्रियां जन्म से ही अधिक निपुण तथा दक्ष होती है। यही वजह है कि स्त्रियां अपने पुरुष साथी से भावनात्मक निकटता की चाहत में न चाहते हुए भी, अनचाहे शारीरिक सम्बन्ध बना बैठती हैं या स्त्रियों की भावनाओं से सराबोर निकटता का पुरुष अपने हित में इस्तेमाल कर लेते हैं। शायद यही वजह है कि एक बालिग स्त्री भी पुरुष पर यह आरोप लगाती है कि पुरुष द्वारा उसे फुसलाकर, उसके साथ धोखा किया गया। जिसे कानून द्वारा भी स्वीकृति प्राप्त है। खैर इस विषय पर फिर कभी। 

मानव दिमांग का बायां हिस्सा सामान्यत: संवेदनाहीन-तार्किकता (Senseless-Logicality) का क्षेत्र होता है, जबकि दायां हिस्सा संवेदना से ओतप्रोत/सराबोर होता है। यही वजह है कि जहां पुरुषों के स्वभाव में सामान्यत: तर्क-वितर्क, राजनीतिक उठापटक, कूटनीति, सामने बाले को आहत कर देने वाली तीखी बहस, मारामारी, खोज, संघर्ष, प्रतिशोध इत्यादि में अधिक निपुणता पायी जाती है। जबकि छोटी-छोटी घटनाओं, पेड़-पौधों, सहज व साधारण सी बातों, मोहक दृश्यों, कपड़ों के रंगों तक को याद रखने, दूसरों को धैर्य पूर्वक सुनने और समझने, विषय की संवेदना को गहराई से समझने, वाकपटुता तथा वाकचातुर्य में स्त्रियां पुरुषों से कई कदम आगे होती हैं।

सामान्यत: स्त्री जब किसी विषय की व्याख्या करती है तो उसमें आत्मीय भावों और संवेदनाओं के रंगों का मिश्रण अवश्य पाया जात है, जबकि पुरुष की व्याख्या रूखे तार्किक निष्कर्ष (Rude logical conclusions) तक सीमित होती है। कारण स्त्री अपने दिमांग के दोनों हिस्सों का उपयोग करती हैं। यही वजह है कि स्त्रियां बहुत जल्दी भावुक हो जाती हैं, जबकि छोटी-छोटी बातों पर भावुक नहीं होने को पुरुष अपने अहंकार से जोड़कर अपने आप को मर्द/यौद्धा की भांति सिद्ध करने की कोशिश करते रहते हैं। यही वजह है कि अधिकतर पुरुषों को ऐसी स्त्रियां बिलकुल भी पसंद नहीं जो बात-बात पर आंसू टपकाती रहें, जबकि अधिकतर स्त्रियों को ऐसे पुरुष बिलकुल भी पसंद नहीं जो अपने दु:ख दर्द को अंदर ही अंदर पीकर जीवनभर घुट-घुट कर मरते रहें। बावजूद इसके हर घर की यही कहानी है।

यद्यपि कड़वी हकीकत यह है कि सामान्य पुरुष चाहें तो भी आसानी से भावुक नहीं हो सकते। इसकी वजह पुरुषों के स्वभाव में प्रकृतिदत्त भावुकता की जन्मजात कमी का होना है। अत: पुरुष चाहें तो भी बात-बात पर भावुक और संवेदनशीलता से परिपूर्ण व्यवहार नहीं कर सकते। यद्यपि मनोवैज्ञानिकों तथा मानवव्यवहार शास्त्रियों का कहना है कि पुरुषों द्वारा सतत अभ्यास (continuous practice) के जरिये भावनाओं और संवेदनाओं को स्त्रियों की ही तरह से प्रकट करना सीखा जा सकता है। जैसे कि फिल्मों और नाटकों में काम करने वाले पुरुष सीख लेते हैं।

इस विषय में मेरा मत है कि भावनाओं और संवेदनाओं को प्रकट करना केवल नाटक करने या ऑडियंस (audience) या मिलने-जुलने वालों को प्रभावित करने तक ही सीमित नहीं होना चाहिये, बल्कि इसे दैनिक पारिवारिक जीवन में आपसी व्यवहार में भी सहजता से उपयोग किया जाये तो बहुत से विवाद जन्म ही नहीं लेंगे। लेकिन स्त्रियों को भी पुरुषों की तार्किक मनोस्थिति का ज्ञान होना बहुत जरूरी हैं। भारत जैसे देश में जहां एक मोपेड (Moped) चलाने के लिये तो लाईसेंस की अनिवार्यता है, लेकिन 6 से 8 दशक तक दाम्पत्य जीवन को संचालित करने के लिये किसी प्रकार की व्यावहारिक दाम्पत्य/यौन शिक्षा या उचित परामर्श तक आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में नवदम्पत्तियों के मध्य होने वाले टकराव अस्वाभाविक नही हैं।

किसी भी प्रकार के दाम्पत्य विवाद के समाधान हेतु निकटतम दाम्पत्य विवाद सलाहकार से सम्पर्क करें। अधिक जानकारी हेतु: http://www.healthcarefriend.in पर विजिट/क्लिक करें।

फिर इंतजार किस बात का है, आज से ही दूसरों की भावनाओं को संवेदनापूर्वक समझने की कोशिश की जाये, जिससे कि दूसरे हमारी भावनाओं का भी आदर कर सकें। विशेष रूप से यह कला सुखद दाम्पत्य जीवन के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। टूटते रिश्तों को बचा सकती है। अंत में फिर से दौहरना चाहूंगा कि

'अधिकतर पुरुषों को ऐसी स्त्रियां बिलकुल भी पसंद नहीं जो बात-बात पर आंसू टपकाती रहें, जबकि अधिकतर स्त्रियों को ऐसे पुरुष बिलकुल भी पसंद नहीं जो अपने दु:ख दर्द को अंदर ही अंदर पीकर जीवनभर घुट-घुट कर मरते रहें।'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-दाम्पत्य विवाद सलाहकार, 9875066111
-Online Dr. P. L. Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 8561955619 (10 AM to 10 PM), 17.06.2018.
बवासीर/पाइल्स-Hemorrhoids/Piles:

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
बवासीर गुदा मार्ग की ऊपरी या बाहरी बीमारी नहीं है। क्योंकि बवासीर का मुख्य कारण वर्षों तक कब्ज का कब्जा रहना होता है। अधिक मिर्च मसाले एवं बाजारू भोजन के कारण कब्ज उत्पन्न होने लगती है। जिसके कारण मल कठोर तथा शुष्क हो जाता है। कठोर और शुष्क मल असानी से बाहर नहीं आता है। अत: मल त्याग हेतु व्यक्ति को अधिक जोर लगाना पड़ता है। जिससे गुदा का आंतरिक हिस्सा जख्मी हो जाता है। लगातार यही स्थिति बनी रहने पर तेजी से कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं और आंतरिक तंत्रिकाएं जख्मी हो जाती हैं या फूल जाती है। जिसके चलते मस्से फूल जाते और, या गुदा से मल के साथ रक्त आने लगता है। सामान्यत: इसे ही बवासीर रोग कहा जाता है।




मुख्यत: बवासीर दो प्रकार को होता है-खूनी बवासीर और बादी बवासीर। यदि मल के साथ खून बूंद-बूंद कर आये तो उसे खूनी बवासीर कहते हैं। यदि मलद्वार के बाहर या मलद्वार के आसपास की नसों में या मलद्वार के अंदर सूजन हो और मटर या अंगूर के दानों के समान मस्से बाहर निकलने लगें या गुदा में अंदर मस्से या सोजन अनुभव होने लगे। ऐसे मस्से जो मलत्याग के समय गुदा से बाहर भी आ जाते हों। ऐसी स्थिति में मल के साथ खून न आए तो सामान्यत: इसे बादी बवासीर कहा जाता है।

जब बवासीर में मलद्वार पर मस्से निकल आते हैं और उनमें सूजन और जलन होने के साथ अधिक पीड़ा भी होती हो। बैठने-उठने पर मस्सों में तेज दर्द होता हो। उनमें से रक्त या चिकना सा पदार्थ निकलने लगे। अनेक बार बिना दर्द के भी मल के साथ या ​मलत्योग के बाद या उठने-बैठने पर गुदाद्वार से रक्त निकलने लगे तो सामान्यत: इसे खूनी बवासीर कहते हैं। बवासीर होने पर उचित एवं सही उपचार के अभाव में गुदाद्वारा में जख्म/फोड़ा भी हो सकता है। गुदाद्वार में दरारें आ सकती हैं। जिनमें मलत्याग के समय असहनीय पीड़ा होती है। यदि बवासीर का समय रहते उचित उपचार नहीं करवाया जाये तो यह कुछ मामलों में भगंदर और, या गुदाभ्रंश में भी परिवर्तित हो सकता है।

इस असहनीय दर्दनाक पीड़ा से भयभीत होकर कुछ रोगी नासमझी में बवासीर, भगंदर या ग्रदाभ्रंश का ऑपरेशन करवा लेते हैं। इसके बाद वाकई ये तलीफें लाइलाज बन जाती हैं। ऑपरेशन के बाद, फिर ऑपरेशन यह सिलसिला। लोगों की जिंदगी को जीते जी नर्क बना देता है।

इसका भी कारण समझना जरूरी है। जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है कि बवासीर गुदा मार्ग की ऊपरी या बाहरी बीमारी नहीं है। क्योंकि बवासीर का मुख्य कारण वर्षों तक कब्ज का कब्जा रहना होता है। अधिक मिर्च मसाले एवं बाजारू भोजन के कारण कब्ज उत्पन्न होने लगती है। जिसके कारण मल कठोर तथा शुष्क हो जाता है। कठोर और शुष्क मल असानी से बाहर नहीं आता है। अत: मल त्याग हेतु व्यक्ति को अधिक जोर लगाना पड़ता है। जिससे गुदा का आंतरिक हिस्सा जख्मी हो जाता है। लगातार यही स्थिति बनी रहने पर तेजी से कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं और आंतरिक तंत्रिकाएं जख्मी हो जाती हैं या फूल जाती है। जिसके चलते मस्से फूल जाते और, या गुदा से मल के साथ रक्त आने लगता है। सामान्यत: इसे ही बवासीर रोग कहा जाता है।

इसलिये यदि कोई सामान्य विवेक का व्यक्ति भी इस बात पर विचार करेगा तो उसे आसानी से समझ में आ जायेगा कि जब तक पाचन तंत्र ठीक नहीं होगा। जब तक सख्त और कठोर मल बनना बंद नहीं होगा। बाहरी ऑपरेशन करने के बाद भी बवासीर को ठीक कैसे किया जा सकता है? यही स्थिति गुर्दे की पथरी की भी होती है। जिसको ऑपरेशन से निकाल देना समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि वास्तविक उपचार पथरी का शरीर में बनना बंद करना असली उपचार है। इसके बाद भी हमारे देश में हर दिन बवासीर के हजारों रोगियों के ऑपरेशन किये जा रहे हैं।

बवासीर का उपचार:
बवासीर से पीड़ित अधिकतर लोग शर्म-संकोच के चलते अपनी तकलीफ को परिवार के सदस्यों तक से छिपाते हैं और इधर-उधर ​की दवाइयां लेते रहते हैं। या किसी अनुभवी डॉक्टर से नियमित रूप से उपचार नहीं लेते हैं। अधिकतर रोगियों को तो यह बात ही समझ में नहीं आती कि वर्षों/दशकों तक पेट खराब रहने और कब्ज रहने के बाद जन्मी बवासीर की तकलीफ का बिना कब्ज को ठीक किये सफल उपचार कैसे सम्भव है?

अत: सबसे पहली जरूरत होती है, रोगी के पाचनतंत्र और कब्ज को ठीक करना। जिसके लिये पहले से कोई सुनिश्चित समय सीमा तय नहीं की जा सकती। क्योंकि रोगी का स्वस्थ होना केवल दवाइयों पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि कुछ बातें हैं, जिनके कारण उपचार में कम या अधिक समय लग सकता है। जैसे-पहले लिये गये उपचार के रोगी के दुष्प्रभाव, रोगी की जीवनचर्या, खान-पान की आदतें, लीवर की स्थिति, रोगी के जीवन में चिंता-तनवा और अवसाद की स्थिति, वंशानुगत पाचनतंत्र की क्षमता, रोग प्रतिरोधक क्षमता, रोगी द्वारा दवा पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता इत्यादि। इस सब के बावजूद अधिकतर रोगी डॉक्टर्स से इलाज की निश्चित समय सीमा तथा गारंटेड इलाज की उम्मीद करते हैं। जो व्यावहारिक एवं कानूनी तौर गलत एवं असंभव है, फिर भी रोगी की जेब से पैसे निकलवाने के चक्कर में धन के लोभी अनेक निष्ठुर तथा असंवेदनशील डॉक्टर रोगी की भाषा बोलने लगे हैं। जिसके परिणाम या दुष्परिणाम ऐसे गारंटी मांगने वाले रोगी ही जानते हैं।

मेरा अनुभव तो यही है कि बवासीर का मूल कब्ज है। अत: बवासीर के उपचार के लिये सबसे पहले कब्ज को ठीक करने के लिये सरल, सौम्य तथा उचित दवाइयों का, उचित मात्रा में स्वस्थ होने तक नियमित रूप ये सेवन करना पहली और अंतिम जरूरत है। ठीक होना या नहीं होना, डॉक्टर, रोगी तथा रोग की स्थिति एवं दवाइयों के साथ-साथ प्रकृति पर भी निर्भर करता है। क्योंकि अंतिम सत्य यही है कि डॉक्टर केवल दवाई देता है, रोगी को पूर्णत: स्वस्थ प्रकृति ही करती है।
उपचार हेतु निकट के किसी आयुर्वेद और, या होम्योपैथी के डॉक्टर से सम्पर्क करें। स्वास्थ्य सम्बन्धी अधिक जानकारी हेतु: http://www.healthcarefriend.in पर विजिट/क्लिक करें।

नोट:---->>>>>>>>>>---- ऑर्गेनिक (Organic) देशी जड़ी बूटियों के बारे में पूर्वजों से प्राप्त अनमोल ज्ञान तथा दुष्प्रभाव रहित होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक जर्मन दवाईयों के सतत अध्ययन, शोधन, परीक्षण और उपचार के दौरान हमने अनेक अनुभव सिद्ध उपयोगी नुस्खे तैयार किये हैं। जो बेशक कुछ गरीब या स्वास्थ्य के प्रति कंजूस लोगों को महंगे लग सकते हैं, लेकिन इन नुस्खों से हजारों रोगियों की "लाइलाज समझी जाने वाली" अनेक शारीरिक तथा मानसिक तकलीफों से मुक्ति मिल चुकी है। चुनौतीपूर्ण मानव सेवा का यह क्रम हमारी वेब साइट स्वास्थ्य रक्षक सखा के जरिये हर दिन देशभर में जारी है। लेकिन-गारण्टी की उम्मीद करना खुद को धोखा देना और डॉक्टर को झूठ बोलने हेतु उकसाने जैसा है, क्योंकि इलाज में गारण्टी देना असम्भव और गैर कानूनी है। अतः तुरन्त, गारण्टेड और शर्तिया इलाज की उम्मीद नहीं करें।
-Online Dr. P. L. Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 8561955619 (10AM to 10 PM), 07.06.2018.
कैंसर (Cancer): कहीं देर न हो जाये?


लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
तेजी से भागती दौड़ती 21वीं सदी की पीढी के मन में भी भयावह खौफ है-कैंसर के नाम का। अत: अभी भी कैंसर का नाम ही मौत का पर्याय समझा जाता है। कारण-शुरूआत में कैंसर की मौत भयानक होती थी। वर्तमान में कैंसर को लाइलाज नहीं माना जाता और असाध्य मामलों में भी चिकित्सा विज्ञान ने कैंसर की मौत को असान बना दिया है। इसके बावजूद भी लोगों के मन में कैंसर का आतंक बना हुआ है। समझने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शुरूआत में कैंसर का इलाज संभव है। उचित इलाज के बाद रोगी स्वस्थ और बिल्कुल सामान्य जीवन जी सकता है।




यद्यपि यह दु:खद है कि कैंसर के नाम से रोगी के परिजनों को जमकर लूटा जा रहा है। यह भी देखने में आता है कि यदि कोई वैद्य, हकीम या डॉक्टर सस्से में कैंसर का उपचार करना चाहे तो अधिकतर मामलों में रोगी के परिजन उस पर विश्वास ही नहीं करते हैं। क्योंकि लोगों की मानसिकता (Mentality) इस प्रकार की हो गया है कि जितनी बड़ी बीमारी उतना ही महंगा इलाज (expensive treatment) है। अत: लोग सस्ती दवाईयों पर पर भरोसा नहीं करते। इस वजह से भी अनेक लोग बेमौत मर रहे हैं। जबकि अनेक बहुत सस्ती ऐसी जड़ी-बूटियां और होम्योपैथिक दवाइयां उपलब्ध हैं, जिनके उचित मात्रा में विधिवत तथा नियमित सेवन से कैंसर की प्रारंभिक और कुछ मामलों में अंतिम अवस्था में भी जीवन को बचाया जा सकता है।


खर्चीली कीमोथेरेपी (Chemotherapy) लेने के बाद भी लगातार हो रही कैंसर मौतों से भी लोगों को कैंसर का व्यापारिक गणित समझ में नहीं आना दु:खद है। कैंसर अनेक प्रकार ​के होते हैं। कैंसर के विभिन्न रूपों और उनके लक्षणों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है। लेकिन इन लक्षणों के होने पर जरूरी नहीं कि कैंसर ही हो, लेकिन सावधानी जरूरी है। अत: इन लक्षणों के प्रकट होने पर सतर्कता जरूरी है:-


01. आमाशय कैंसर: उल्टियां होते रहना, उल्टी और दस्त में खून आना, वजन का लगातार घटना, भूख न लगना आदि।
02. फेफड़ों का कैंसर: लगातार बुखार, छाती में दर्द, लगातार खांसी रहना, खांसते वक्त छाती में दर्द, बलगम में खून आना आदि।
03. स्तन कैंसर: शुरू में स्तन में ऐसी गांठ हो] जिसमें दर्द रहता हो, स्तन में रक्त स्राव होना, कांख में गांठ होना, स्तन की त्वचा का अधिक खुरदरा होना, त्वचा पर सूजन होना आदि।
04. लीवर कैंसर: भूख न लगना, बार-बार पीलिया होना, लीवर में सोजन या लीवर बढ़ जाना, दायें ओर की पसलियों के ठीक नीचे दर्द होना आदि।
05. मुख कैंसर: मुख से दुर्गंध आना, खाने व निगलने में तकलीफ, मुंह में लगातार छालों का बने रहना और छालों का जल्दी ठीक न होना आदि।
06. किडनी कैंसर: पीठ में लगातार दर्द बने रहना, पेशाब में रक्त आना, पेट में गांठ का होना आदि।
07. ब्लड कैंसर: बार-बार ज्वर से पीडि़त रहना, शरीर में खून की कमी बने रहना, त्वचा पर लाल चकत्ते उभरना, गर्दन व जांघ में गांठ बन जाना, तिल्ली का बढऩा, गुदा या मूत्र मार्ग से खून आना आदि।
08. ओवरी कैंसर: पेट के निचले हिस्से में गांठ का होना, वजन घटना, पेट के निचले हिस्से में भारीपन बने रहना आदि।
09. गर्भाशय कैंसर: पेट के निचले भाग में भारीपन का रहना और दर्द रहना, मासिक धर्म का अधिक मात्र में और अधिक दिनों तक आना, बदबूदार श्वेतप्रदर स्राव , मल-मूत्र विसर्जन में दर्द होना, अचानक मासिक धर्म के बंद होने के बाद फिर से खून स्राव का होना आदि।
10. त्वचा कैंसर: त्वचा पर घाव होना, घाव का जल्दी न भरना, घाव का फैलते जाना, घाव में मामूली दर्द बने रहना, घाव से खून का रिसना आदि।
11. गुदा कैंसर: शौच के समय बहुत दर्द होना, शौच के साथ खून निकलना, गुदा का बाहर निकलना, गुदा में गांठ का हो जाना आदि।
12. थायराइड कैंसर: गले के बीच में गांठ बनना, उस गांठ में दर्द बने रहना, सांस लेने में तकलीफ होना, खाते, पीते, निगलते समय गले में दर्द होना आदि।
13. ब्रेन कैंसर: सिर में लगातार दर्द बने रहना, मिर्गी के दौरे पडऩा, अशान्त नींद, शरीर के किसी भाग में लकवे का होना, बार-बार बेहोश हो जाना आदि।
14. अण्डकोष का कैंसर: एक तरफ से अण्डकोष का बढऩा, अण्डकोष में दर्द महसूस न होना, खांसते और सांस लेते समय तकलीफ का होना आदि।
15. आहार नली का कैंसर: गले में खाना अटकना, खाना खाते समय दर्द होना, खून की उल्टी होना, खाना बहुत धीरे-धीरे खा पाना आदि।
16. बड़ी आंत का कैंसर: पाचनतंत्र का अस्वस्थ होना, कभी दस्त और कभी कब्ज़ होना, मल के साथ रक्त स्राव होना, शौच के समय तकलीफ होना या दर्द होना, गुदा द्वार के अन्दर गांठ का होना आदि।


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वियोग या जुदाई-Separation में घुट-घुट कर बिलखने या मरने से बेहतर है, अपनी पीड़ा किसी अनुभवी और विश्वसनीय होम्योपैथ को बतायें।

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'




ऐसी किशोरियां या युवतियां जिन्हें प्रेम में निराशा का सामना करना पड़ा हो और जो रात-रात भर अपने दु:ख या शोक या गम या जुदाई के वियोग में दु:खी रहने के कारण या अपने हालातों के बारे में दिनरात सोचते रहने के कारण बराबर सो नहीं पाती हैं। जीवन के प्रति जिनकी आशाओं और उमंगों पर तुषारपात (Fisheries) हो जाता है। इस कारण वे मानसिक तथा अनेक प्रकार के शारीरिक रोगों से पीड़ित हो जाती हैं। उन्हें लगता है। जैसे-हर समय चिरस्थाई दु:ख, शोक, झुंझलाहट, ईर्ष्या, भग्न-प्रेम, चित्त डांवाडोल, निराशा, हतोत्साह में डूबना, जीवन में कुछ अच्छा नहीं लगता, हृदय की धड़कन बढना, हृदय में पीड़ा होती है, सांस लेने में कठिनाई होना, सदा आत्महत्या के विचार आना। इन सब हालातों से लम्बे समय तक परेशान एवं व्यथित रहने के कारण अंतत: पीड़िता ऐसी स्थिति में पहुंच जाती हैं कि वह न तो कुछ सोच सकती हैं, न कुछ कर सकती हैं। हर बात में उन्हें निराशा और उदासीनता नजर आती है।


ऐसी दु:खद मनोशारीरिक हालातों का सामना कर रही लड़कियां आमतौर पर अपने दु:ख को परिजनों को बता नहीं पाती हैं। यदि बताने का साहस भी करती हैं तो उन्हें पागल या बदचलन करार दे दिया जाता है। इस डर से ऐसी लड़कियां, सह सकने की क्षमता शेष रहने तक अपनी पीड़ा ​से अंदर ही अंदर घुटती और रोती-विलखती रहती हैं। जब दर्द और घुटन असहनीय हो जाती हैं, तो अनेकों लड़कियां असमय मौत को गले लगा लेती हैं।

[नि:शुल्क स्वास्थ्य परामर्श हेतु मेरा मोबाईल एवं हेल्थ वाट्सएप नम्बर: 85619-55619 (10AM to 10 PM)]

ऐसी स्थिति का सामना कर रही लड़कियों के लिये विचारणीय सवाल और जरूरी सलाह-प्रेम होना और प्रेम का टूटना प्राकृतिक है। यह कोई ऐसी अनहोनी घटना नहीं जो केवल आपके साथ ही घटी हो? इतिहास में ऐसा लाखों-करोड़ों लड़कियों, लड़कों, स्त्रियों और पुरुषों के साथ होता रहा है और इन हालातों से उबरने के बाद सभी लोग वृद्धावस्था तक सामान्य जीवन जीते हैं। सबसे बड़ी विचारणीय बात यह है कि जीवन अमूल्य है और संसार में हर समस्या का कुछ न कुछ समाधान या निराकरण अवश्य है। अत: वियोग या जुदाई में अंदर ही अंदर घुट-घुट कर हर पल बिलखने या मरने से बेहतर है, अपनी पीड़ा किसी अनुभवी और विश्वसनीय होम्योपैथ को बतायें। होम्योपैथी की दुष्प्रभाव रहित दवाइयां आपकी ऐसी मनोस्थिति को बदलने और आपके जीवन में आशा तथा ऊर्जा का संचार करने में आश्चर्यजनक रूप से सहायक बनेंगी।

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-Online Dr. P.L. Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM), 26.05.2018. केवल नि:शुल्क स्वास्थ्य परामर्श चाहने वालों के लिये सार्वजनिक है। इस पर फालतू सामग्री भेजने वालों को तुरंत ब्लॉक कर दिया जाता है।
सिरदर्द और माईग्रेन-अधिक दर्द निवारक हानिकारक हैं, होम्योपैथी अपनाएं।-Headaches and Migraines-More Painkillers are Harmful, Adopt Homeopathy.


वर्तमान भागमभाग जीवन की व्यस्तता और मानसिक दबावों में अधिकतर लोगों को आमतौर पर सिर में दर्द की शिकायत बनी रहती है। महिलाओं में यह तकलीफ अधिक देखने को मिलती है। शोध प्रमाणित करते हैं कि सिर दर्द के प्रमुख कारण अप्रसन्नता, असंतोष, अनिश्चय, चिंता, तनाव, अवसाद, क्रोध, कार्य का दबाव आदि हैं। इन दिनों यह समस्या बड़ों के साथ-साथ छोटे बच्चों में भी देखी जा सकती है।



यदि सिर दर्द बार-बार होने लगे तो यह तकलीफ माइग्रेन Migraine अर्थात् आधासीसी में बदल सकती है। सामान्यत: माइग्रेन का दर्द, सिर के आधे हिस्से में होता है। जो दायें, बायें, आगे, पीछे या कपाल पर हो सकता है। दर्द का सम्बन्ध सूर्योदय और सूर्यास्त के साथ भी जुड़ा हो सकता है। दर्द इतना भयंकर होता है कि रोगी को दर्द निवारक/पेन किलर दवाइयों का सेवन करने को मजबूर होना पड़ जाता है।

दर्द निवारक दवाओं से कुछ समय के लिए तो राहत मिल सकती है, लेकिन माईग्रेन का उपचार नहीं हो पाता है। अधिक समय तक दर्द निवारक दवाओं का सेवन करना अन्य अनेक नयी और बड़ी तकलीफों को जन्म दे सकता है। इसके बाद भी अनेक उच्च शिक्षित तथा उच्च पदस्थ लोग तक ऐसी तकलीफ को बहुत हल्के में लेते देखे जा सकते हैं। जो उनके स्वास्थ्य की दृष्टि से अनुचित और चिंताजनक है।

होम्योपैथी और देशी जड़ी बूटियों के जरिये माईग्रेन का स्थायी इलाज संभव है। मेरे अनुभव में 80 फीसदी से अधिक रोगी पूरी तरह से रोगमुक्त हो जाते हैं। यद्यपि किसी अनुभवी डॉक्टर की देखरेख में ही इलाज लेना चाहिये। स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरूकता हेतु सिरदर्द एवं माईग्रेन की कुछ होम्योपैथिक दवाईयां रोगी के लक्षणों के अनुसार प्रस्तुत हैं:-

1. Glonoinum: लक्षण-(1) होम्योपैथी में यह सिर-दर्द की विशिष्ट औषधि है। रोगी के सिर में रक्त की अधिकता से सिर-दर्द होता है। लू लगने से या सर्दी से या किसी और कारण से जब सिर में रक्त की अधिकता हो जाती है, तब यह उत्तम कार्य करती है। सामान्यत: सिर-दर्द गर्दन से शुरू होता है। जहां रोगी को भारीपन अनुभव होता है, और हृदय की धड़कन/स्पन्दन के साथ सिर में भी धड़कन/स्पन्दन सी अनुभव होती है। रोगी को लगता है कि सिर बहुत बड़ा हो गया है जो उस की छोटी-सी खोपड़ी में नहीं समा रहा। सिर में धड़कन/स्पन्दन इतना उग्र होता है कि जिस तकिये पर रोगी ने सिर रखा होता है, वह भी स्पन्दन करता दीखता है, सिर के हर स्पन्दन के साथ तकिया हिलता है। ‘सन-स्ट्रोक’ की यह मुख्य दवा है।
(2) रोगी के सिर में एकदम, अचानक रक्त-संचय होने से रक्त-संचार के दौरे-से पड़ते हैं। सिर में रक्त-संचार ऐसे अवसरों पर होने लगता है, जब इसकी बिल्कुल संभावना नहीं होती है। जैसे-रोगी सड़क पर चला जा रहा है। एकदम गर्मी की लहर मस्तिष्क में उठती/चढ़ती हुई सी अनुभव होती है। उसे एकदम पसीना छूटने लगता है। रोगी का चेहरा लाल हो जाता है। रोगी चारों तरफ देखता है, मगर किसी को पहचान नहीं पाता। उसे परिचित लोग हैं वे भी अजनबी से लगने लगते हैं।
[स्वास्थ्य परामर्श हेतु-Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM)]

2. Natrum Muriaticum: लक्षण-सूर्योदय के साथ सिर-दर्द होना और सूर्यास्त के साथ समाप्त हो जाना इस दवाई का प्रमुख लक्षण है। सिर-दर्द में इस औषधि का स्थान किसी अन्य औषधि से कम नहीं है। विशेषतौर पर रक्तक्षीणता/रक्ताल्पता (Anemic) से पीउ़ित लड़कियों/महिलाओं के सिर-दर्द में यह बहुत उपयोगी है। सिर दर्द होने पर रोगी अनुभव करता है कि सैकड़ों हथौड़ों की चोट उसके सिर पर पड़ रही है। कभी-कभी यह सिर-दर्द प्रात: 10-11 बजे शुरू होती है, दोपहर बाद 3 बजे या सूर्य ढलने तक बना रहता है। सूर्यास्त होते ही समाप्त हो जाता है। कभी कभी यह प्रतिदिन, प्रति तीसरे या प्रति चौथे दिन हो सकता हे। सिर-दर्द इतना तीव्र होता है कि कोई नया होम्योपैथ बेलाडोना देने की सोच सकता है, परन्तु अगर रोगी का चेहरा पीला हो, वह रक्त-क्षीण हो, तो नेट्रम म्यूर से ही लाभ होगा। यह सिर-दर्द महिलाओं को माहवारी के बाद होता देखा गया है। जिसका कारण सम्भवत: रोगिणी में रक्तक्षीणता हो जाना है।
[स्वास्थ्य परामर्श हेतु-Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM)]

3. Sanguinaria Canadensis: लक्षण-(1) दायीं ओर के आधे सिर में दर्द जो सूरज के चढ़ने के साथ दाहिनी आँख पर आकर जम जाय तो इस दवाई को अवश्य याद रखना चाहिये। ऐसा सिर-दर्द जो प्रात: काल सूर्य के चढ़ने के साथ शुरू हो। सिर की गुद्दी से चलकर सिर के ऊपर से होकर दाहिनी आंख के ऊपर और सिर के दाहिनी तरफ आकर जम जाता है। इस प्रकार के सिर दर्द को दवा अवश्य ठीक कर देती है। रोगी अंधेरे कमरे में बिस्तर पर जा लेटता है, जिससे उसे कुछ आराम मिलता है। जबकि सिर दर्द दिन में बढ़ता है और तेज रोशनी या प्रकाश में दर्द अधिक बढ़ता जाता है। दर्द के बाद उल्टी आ जाती है और उल्टी आने पर दर्द चला जाता है। अगर रात को बिस्तर पर लेटते हुए रोगी के हाथ-पैरों जलन होती हो और रोगी अपने तपते हुए अंगों को ओढ़नी से बाहर रखना चाहता हो, तो यह इस दवाई का विशेष लक्षण है। इसके अलावा उठकर बैठने से नहीं, बल्कि लेटने से रोगी को आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों में दायीं ओर के सिर-दर्द में यह दवाई बहुत लाभ करती है।
[स्वास्थ्य परामर्श हेतु-Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM)]

4. Spigelia: लक्षण-(1) स्नायु-शूल (दर्द) की यह प्रमुख दवा है। इस दवाई का प्रभाव क्षेत्र विशेष रूप से स्नायु शूल है। जैसे हृदय, सिर, चेहरा, आंख आदि के दर्द के ऊपर इसका मुख्य-प्रभाव है। ऐसा हृदय-शूल तथा सिर दर्द जो बांयीं आंख के ऊपर आकर जम जाये। कभी कभी दायीं आंख के ऊपर भी आकर जम जाता है।
(2) सिर दर्द (Neuralgic headache)–सिर-दर्द, चेहरे का दर्द तथा आंखों के दर्द में इस औषधि का प्रमुख स्थान है। सिर-दर्द प्राय: एक तरफ होता है। प्रात: काल सूर्य के उदय के साथ यह शुरू होता है, ज्यों-ज्यों सूर्य चढ़ता जाता है त्यों-त्यों यह बढ़ता जाता है, और सूर्य के अस्त होने के साथ यह समाप्त हो जाता है। यह दर्द सिर की गुद्दी से उठता है, सिर पर चढ़कर बायीं आंख के ऊपर जाकर ठहर जाता है।

इनके अलावा भी माईग्रेन की बहुत सी अन्या दवाइयां भी हैं, जिनको रोगी के मानसिक एवं शारीरिक लक्षणों के अनुसार उचित शक्ति, मात्रा एवं निर्धारित समय तक सेवन करवाया जाता है।
नोट:---------------->>>>>>>>>>--------------------------ऑर्गेनिक (Organic) देशी जड़ी बूटियों के बारे में पूर्वजों से प्राप्त अनमोल ज्ञान तथा दुष्प्रभाव रहित होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक जर्मन दवाईयों के सतत अध्ययन, शोधन, परीक्षण और उपचार के दौरान हमने अनेक अनुभव सिद्ध उपयोगी नुस्खे तैयार किये हैं। जो बेशक कुछ गरीब या स्वास्थ्य के प्रति कंजूस लोगों को महंगे लग सकते हैं, लेकिन इन नुस्खों से हजारों रोगियों की "लाइलाज समझी जाने वाली" अनेक तकलीफों से मुक्ति मिल चुकी है और चुनौतीपूर्ण मानव सेवा का यह क्रम हमारी वेब साइट स्वास्थ्य रक्षक सखा के जरिये हर दिन देशभर में जारी है। लेकिन -'तुरन्त, गारण्टेड और शर्तिया इलाज' चाहने वाले हमें माफ करें।

-Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा): Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM), 24.05.2018. केवल नि:शुल्क स्वास्थ्य परामर्श चाहने वालों के लिये सार्वजनिक है। इस पर फालतू सामग्री भेजने वालों को तुरंत ब्लॉक कर दिया जाता है।
फेरम फॉस (Ferrum Phosphoricum) खिलाओ खुद-ब-खुद भूख (Appetite) लगने लगेगी।




जब रोगी की तबियत खराब हो और उसे भूख नहीं हो तो रोगी को जबरदस्ती भोजन खिलाकर उसकी पाचनशक्ति नष्ट मत करो, प्राकृतिक तरीके से भूख पैदा करने की कोशिश करो। रोगी की स्थिति के अनुसार उचित मात्रा और शक्ति में बॉयाकैमिक फेरम फॉस खिलाओ। उसे खुद-ब-खुद भूख लगने लगेगी।-Online Dr. P. L. Meena: Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM), 21.05.2018.
A REVIEW ON
TECOMA STANS
Shravan Kumar Dholi
S. Ananditha Reddy
B. Srinidhi Reddy
E. Pramukhya
Associate Professor, Department of Pharmacology, Vaageswari Institute of PharmaceuticalSciences, Beside LMD Police Station, Ramakrishna Colony, Karimnagar, T.S.-505481, India.

Department of Pharmacy, Vaageswari Institute of Pharmaceutical Sciences, Beside LMD Police Station, Ramakrishna Colony, Karimnagar, T.S.-505481, India.). 

Email: shravan21m@gmail.comMobile: + (91) 8008961562.

INTRODUCTION:
Plants are Cultured everywhere not in specific place. It used to human health and well being. The plant is a fast-growing plant with 30 feet in height content yellow flowers and leaves with green. The t.stan is useful to treat diabetes in most countries like Mexico, India, and America and the roots are used to treat diuretic and Anti-fungal. The first preference for this plant is herbal medicines. [1-5]Vernacular (or) other names in other languages: Hindi-Pillakaner English-Yellow bellsTelugu-Paccha Pulu



Classification: Common Name-Yellow trumpet bellsKingdom-Planate-PlantsSubkingdom-Tracheobionta-Vascular plantsSuperdivision-Spermatophyta-Seed PlantsDivision-Magnoliophyta-Flowering PlantsClass-Magnoliopsida-DicotyledonsSubclass-AsteridaeOrder-ScrophularialesFamily-Bignoniaceae-Trumpet-creeper familyGenus-Tecoma Juss, -trumpetbush species-Tecoma Stans (L.) Juss. ex Kunth-Yellowtrumpetbush

Medicinal Use: Pharmacological Activities: T. stanhas various pharmacological Activities anti-oxidant, antidiabetic, anti-fungal, anti-cancer, anti-hyperlipidemic, anti-microbial activities.

1. Anti-oxidant: The presence of Tannins in the extracts of bio-activities to possess potent (शक्तिशाली) antioxidant activity.

2. Anti-spasmodic effect: (spasmodic=अंग-संकोच करनेवाला-मरोड़-संबंधी-अकड़नेवाला-) This effect can be evaluated by using a segment of ileum from rat with trade solution. The TLE dose-dependently which indicate calcium channels are involved in this spasmolytic effect.

3. Anti-microbial activity: The extract of leaf was tested on Bacteria. The extract of phenolic content was showed its anti-microbial activity.

4. Antifungal activity: The extract of t.stan was tested against two species of fungi (sporothrixschenckii and fonsecaea pedrosoi) Shows best effective anti-yeast and anti-fungal activity.

5. Anti-diabetic activity: TAE sub-chronic adminreduces triglycerides and cholesterol without modifying fasting glucose. The chemical composition of the extract was analyzing their content of phenols, flavonoids, and alkaloids reputed to be responsible for hypo-glycemic properties of many antidiabetics.

6. Wound healing property: The methanol extract oft.stans leaf was possess significant wound healing property.[6-10].

CONCLUSION:
Tecoma Stan is used by medical practitioners for treatment of various diseases. Pharmacological reviews on plants will give valuable information which will help in getting more points about a plant species. As per my search, the major activity has been using the leaves and flowers are used for the treatment of various diseases. We can wait and will find something new to cure any other new disease by this Tecoma Stan.
REFERENCES:
1.Research Journal of Pharmaceutical, Biological and Chemical Sciences March - April 2014 RJPBCS 5(2)Page. No. 6052.Divya Sri et al.: Journal of Medical and pharmaceutical Innovation; 1 (2) 2014; 1-4 17-50-1-PB- 
3. Khare C.P. Indian medicinal plant. Springer. 2007:649-650. 4. S Raju et. al. / JPBMS, 2011, 8 (07) 
4. Bhattarai M. K. Medical ethnobotany in the Rapti zone, Nepal. Fitoterapia. 1993; 64; 483- 4895.Bailey, L.H. 1941. The standard cyclopedia of horticulture. Vol. 3. The MacMillan Company, NewYork. p 2,423-3,639.6.Farombi EO. African indigenous plants with chemotherapeutic potentials and biotechnological approach to the production of bioactive prophylactic agents. Afr. J. Biotech. 2003; 2:662-671. 
7.Mohammed Shoeb. Anticancer agents from medicinal plants. Bangladesh. J Pharmacol. 2006;1:35-41. 
8.Liogier HA. Plantas medicinales de Puerto Rico ydel Caribe, Iberoamericana de Ediciones, Inc., SanJuan, PR; 1990. 566.9.Pelton, J. A survey of the ecology of Tecoma stans.Butler University Botanical Studies.1964; 14:53-88.10.Pallavi K, Vaishnavi B, Mamatha, Prakash KV,Amruthapriyanka A. Phytochemical investigation and anti-microbial activity of Tecoma stans. WorldJournal of Pharmaceutical Research. 2014; 3(2):70-72.

Source: https://www.scribd.com/document/368918790/A-REVIEW-ON-TECOMA-STANS
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Tacoma stans, Indian Medicinal Plants:



Tecoma stans is a small, erect Indian medicinal plant that is common in the subcontinent.

Tecoma stan is an erect shrub (छोटा वृक्ष) commonly found in India. The shrub has some common names in different native Indian languages. It is known as Koranekalar in Kannada; Nagasam-Bagram, Sonnapatti, Sornapatti in Tamil and the Telugu people call it Pascagoula. The small tree has a height of up to 4 m and its leaves are opposite, imparipinnate. The length of the leaves is up to 20 cm and they usually have 5 or 7 leaflets. The leaflets are lanceolate to oblong-lanceolate and are long-acuminate at the apex. The base is acute or acuminate and the margins sharply serrate.

The flowers of Tecoma stans are borne in terminal panicles. The calyx of the plant is green, having a length of 5 mm and is 5-toothed. The yellow corolla has a length of 4-4.5 cm and the tube is inflated upward. The fruits or the capsules of the plant are linear, having a length of 12-20 cm and width of 7-8 mm. The acuminate, compressed fruits contain numerous seeds and each of the seeds comes with two thin wings. The plant usually flowers and fruits throughout the year. Though the plant is a native to tropical South America, it is widely planted as a hedge plant in gardens throughout India. The plant is often naturalized on open, degraded sites, as well. 

There are some certain medicinal properties and usages of Tecoma stans. The root of the plant is reported to be a powerful diuretic, vermifuge, and tonic. A grinding of the root and lemon juice is reportedly used as an external application and also taken internally in small quantities as a remedy for snake and rat bites. The grinding is taken as a remedy for scorpion sting, as well. 
(Last Updated on 07/12/2013)
Source: https://www.indianetzone.com/38/tecoma_stans_plants.htm

Yellow Bell for Colic and Abdominal pain and more

Allamanda or Yellow Bell is a climber plant that uses as an ornamental. I usually saw this on our neighbor's fences and some make it as a shed on their gardens. The flower is usually in yellow color which is like a bell. This plant is usually used as an ornament. The stem of this climber plant is hard, unlike other climber plants. This plant is used as a medicinal plant. 
This is the medicinal contribution of this plant

For colic or acute abdominal pain. (उदरशूल  या तीव्र पेट दर्द के लिए।)
As good purgative (जुलाब-पेट साफ़ करनेवाली) which is stronger than a laxative (रेचक-दस्तावर).
It is suggested as an antidote (प्रतिकारक-विषहर औषध) for poisoning (ज़हर खाने का असर).

The preparation of this plant for medicinal use:

Infusion (अर्क-आसव-सत) of the leaves is recommended for acute abdominal pain. It also acts as a purgative.

The bark (छाल) in normal or small doses in decoction (काढ़ा) has a cathartic (दस्तावर-जुलाब) or hydragogue effect. It helps in the evacuation (निष्क्रमण-परित्याग) of the bowels.

The bark and leaves are the part of the plant used for herbal medicine.

Source: http://diseases-of-life.blogspot.in/2011/03/yellow-bell-for-colic-and-abdominal.html
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Phytochemical and pharmacological review study
on Tecoma Stans Linn
Sunita Verma
Abstract
Tecoma stans Linn is an erect shrub commonly found in India. It is also known as yellow bells, yellow
elder, trumpet flower, belonging to the family Bignoniaceae. Tecoma stans, showed exhibited
antidiabetic, antioxidant, hypoglycemic, antitumor, free radical, anti-inflammatory and antimicrobial,
properties. This review aims at describing the botanical description, classification, phytochemical profiles
of various parts of Tecoma stans.
Keywords: Phytochemical, medicinal, drugs, antimicrobial
Introduction
Nature has been a source of medicinal agents for thousands of years and an impressive number
of modern drugs have been isolated from natural sources, many based on their use in
traditional medicine. Higher plants, as sources of medicinal compounds, have continued to
play a dominant role in the maintenance of human health since ancient times [1]. Over 50% of
all modern clinical drugs are of natural product origin and natural products play an important
role in drug development programs in the pharmaceutical industry. In India, people have been
used as plants and natural products for the treatment of various diseases since ancient time.
Nearly 80% of the world’s population depends on traditional medicine [2]. In the last two
decades of the century, the scientists are sincerely trying to evaluate many plant drugs used in
traditional system of medicine. The pharmacognostic study is one of the major criteria for
identification of plant drugs.
Tecoma stans is an erect shrub commonly found in India. Belonging to the family
Bignoniaceae. The shrub has some common names in different native Indian languages.
Tecoma stans Linn is also known as yellow bells, yellow elder, trumpet flower in English and
Piliya in Hindi. Tecoma stans is an important medicinal plant. Ginger Thomas leaves, bark and
roots contain biologically active chemicals, and extracts from those tissues are in use as
traditional folk medicines [3]. Tecoma stans, showed exhibited antitumor, antioxidant,
antimicrobial, hypoglycemic, free radical anti-inflammatory and antidiabetic properties.
Tecoma stans are commonly planted as an ornamental in warmer climates throughout the world
because of its showy yellow flowers and pinnate foliage [4].
Classification
Kingdom = Plantae
Division = Tracheophyta
Subdivision = Spermatophytina
Class = Magnoliopsida
Order = Lamiales
Family = Bignoniaceae
Genus = Tecoma
Species = T. stans
Vernacular name
Hindi = Piliya
Sanskrit = Sidhakya
English = Yellow bells, Yellow trumpet, Yellow elder
Malayalam = Subramanyakiretam
Tamil = Sonnapatti

Botanical description
A large shrub or small tree, much branched, growing upto 1.5-
5m tall, but grows occasionally upto 10m in height. twigs tan
or reddish tan, smooth, scarcely 4-sided; leaves opposite,
pinnately compound, leaflets 1-9, usually 3-7, ovatelanceolate,
apex acuminate, base acute or obliquely acute, very
shortly petiolate or all but subsessile, slightly hirsute on midrib
and in vein axils beneath, margins irregularly serrate, leaves
quite variable, rachis and petiole slender, glabrous.
Inflorescence an axillary or terminal raceme, pedicels short,
irregularly curved or twisted, bracts reduced to minute scales,
flowers rather few, calyx narrowly cylindric-campanulate, 5-7
cm long, with 5 sub-equal acuminate teeth, glabrous; stamens
4, attached at the summit of the tube, in 2 unequal pairs, included, filaments pilose at base, curved above, anthers versatile, linear, yellow, pilose, 6 mm long; sterile fifth stamen much reduced; pistil about equaling stamens, ovary narrowly cylindric, about equaling calyx, style filiform, glabrous, stigma flat, elliptic; capsule linear, compressed, 10-20 cm long, 7-8 mm wide, brown when ripe, with raised line or suture lengthwise on each flat side, tardily dehiscent along suture, septum parallel with
flat sides, firm, seeds flat, oblong, 7-8 x 4 mm, with a
membranous transparent wing on each end, ends of wing erose, seeds entire including wing about 20 x 6 mm" [5

Phytochemical Constitutes
Chemical constituents of this botanical species are well
known; numerous monoterpenic alkaloids have been identified
[6-9]. The biosynthesis of these monoterpene alkaloids in callus tissues of Tecoma stans has been studied, together with the identification of the presence of lapachol and other primary and secondary plant metabolites such as: sugars (glucose, fructose, sucrose and xylose), triterpenoids (ursolic and oleanolic acids and α-amyrine), p-sitosterol and phenolics (chlorogenic, caffeic, vanillic, o-cumaric and sinapicn acids).
All of these compounds have already been identified in the whole plant at different concentrations [10, 11]. A new phenylethanoid, 2-(3,4-dihydroxyphenyl) ethyl-2-O-[ 6-deoxyalpha-L- mannopyranosyl- 4- (3, 4 dihydroxyphenyl) -2- propenoate]-beta-D-glucopyranoside, and a novel monoterpene alkaloid, 5-hydroxy-skytanthine hydrochloride, along with eleven known compounds in the fruits and flowers was established in Tecoma stans [12].

Pharmacological Activities
Tecoma genus possess various bioactive compounds that are reported to exhibit various pharmacological activities such as antioxidant, antimicrobial and antifungal activities [13-15]. The whole alcoholic and aqueous extract of T. stans exhibited the antibacterial activity and isolated tecomine, where the growth of E. coli and B. subtilis was inhibited at different .
Conclusion
Sustainable management of medicinal plant species is
important due to their value as a potential source of new drugs. Tecoma stans is used by traditional medical practitioners for the treatment of various diseases. Phytochemical and Pharmacological reviews on plants will give valuable information which will assist the scientists in getting more advanced knowledge about a plant species.
Source: http://www.plantsjournal.com/archives/2016/vol4issue5/PartC/4-4-19-443.pdf
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नवविवाहित दम्पत्तियों को समर्पित लेख: यदि करते हो पत्नी से प्यार तो होम्योपैथिक प्रसव सुरक्षा चक्र (Pregnancy Safe-Guard) से क्यों इनकार?

हर वर्ष की भांति, इस वर्ष भी हजारों-लाखों युवक-युवती दाम्पत्य जीवन की शुरूआत कर चुके हैं या करने जा रहे हैं। सभी को मुझ डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' की ओर से हार्दिक बधाई तथा सुखद, स्वस्थ एवं सफल दाम्पत्य जीवन की अनंत शुभकामनाएं।



विवाह के बाद आप सभी नव दम्पत्ती रंगीन सपनों की दुनियां में बिल्कुल नये जीवन से सुखद अहसास से मुखातिब हो रहे हैं। इस नयी भूमिका में आप सभी के सामने रोमांचकारी चुनौतियां तथा अनेक जिम्मेदारियां भी हैं। जीवन के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर एक अति महत्वपूर्ण विषय पर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ।


नवदम्पत्तियों (newly married) को भी प्रकृति के अनुक्रम को आगे बढाने के लिये निकट भविष्य में सन्तान सुख की प्राप्ति होनी है। जिसकी भावात्मक अनुभूति का अहसास क्या होता है, इसे सन्तान पाकर ही समझ सकेंगे।


एक लड़की, पत्नी से मां बनकर सम्पूर्ण नारी बनती है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सन्तान को जन्म देकर स्त्री को पुनर्जन्म मिलता है। प्रसव पीड़ा और प्रसव के बाद की सुखानुभूति क्या होती है, इसे सिर्फ एक माँ ही समझ सकती है।


विज्ञान ने हमारे जीवन को आसान बनाया है। इसके उपरांत भी आंकड़े बताते हैं, कि शहरों में 40% तक प्रसव सिजेरियन होने लगे हैं। गांवों में यह आंकड़ा कुछ कम है। आंकड़े यह भी बतलाते हैं कि जिन माताओं के सिजेरियन प्रसव होते हैं, उनमें से 70% से अधिक गैर-जरूरी होते हैं। जिसके मूलत: तीन बड़े कारण बताए जाते हैं:-

1-नवयुवतियों में सामान्य प्रसव को लेकर भ्रांत धारणा तथा युवावस्था की दहलीज पर कदम रखने के साथ ही आसन्न प्रसव (impending delivery or childbirth) की काल्पनिक पीड़ा (fictional pain) का असहनीय दर्दनाक अहसास अवचेतन मन (subconscious mind) में स्थापित कर लेना। जो उनके दिलों-दिमांग पर फोबिया (phobia) बनकर कब्जा कर लेता है।
2-लालची डॉक्टर्स की कभी न तृप्त होने वाली धन की भूख, जिसके कारण सामान्य हो सकने वाले प्रसव को भी सिजेरियन प्रसव बना दिया जाता है। और
3-प्रकृतिदत्त पेचीदगियां। जिनमें जच्चा और बच्चा में से किसी एक या दोनों की जान बचाने के लिए सिजेरियन प्रसव जरूरी हो जाता है।

उपरोक्त हालातों में असामान्य तरीके से मां बनने वाली माताओं का प्रसव के बाद का जीवन जहां शारीरिक एवं मानसिक रूप से अनंत अनचाही पीड़ाओं (unwanted infinite pain) का कारण बन जाता है। वहीं सिजेरियन प्रसव शारीरिक कुरूपता को भी जन्म देता है। जिसका स्त्री के मन पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। सी-सेक्शन प्रसव के बाद भी बहुत सारी महिलाएं आसानी से यौन-सम्बन्ध नहीं बना पाती है। उनके जीवन में यौन-सम्बन्ध पीड़ादायक अहसास बन जाता है। जिससे ऐसे जोड़ों का दाम्पत्य जीवन बिखराव के कगार पर पहुंच जाता है। जिसके कारण अनेक मामलों में विवाहेत्तर यौन सम्बन्धों (extramarital sexual relations) का जन्म होता है। ऐसे हालात परिवारों के बिखराव, तलाक तथा सामाजिक विकृतियों के लिये उत्तरदायी होते हैं।


इस सब अनचाही स्थितियों से 95% से अधिक मामलों में बचा जा सकता है। बशर्ते-
  • 1-गर्भिणी महिलाएं गर्भ के दौरान निठल्ली एवं निष्क्रिय बनकर सिजेरियन प्रसव होने के सपने देखना बंद कर दें और लालची डॉक्टरों के डराने से डरें नहीं। और
  • 2-गर्भ धारण करते ही होम्योपैथी तथा बॉयोकैमी की दुष्प्रभाव रहित दवाईयों का नियमित सेवन करें।

होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक दवाईयां गर्भावस्था एवं प्रसव को कैसे आसान बनाती हैं?

  • 1-गर्भस्राव और गर्भपात को रोकती हैं।
  • 2-गर्भकालीन अनचाही तकलीफों से मुक्ति दिलाती हैं।
  • 3-असमय/समय पूर्व प्रसव (premature delivery) को रोकती हैं।
  • 4-दर्दरहित और आसान प्रसव में सहयोग करती हैं।
  • 5-शिशु के संरक्षण, विकास एवं पोषण में सहायक बनती हैं।

होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक दवाईयों के सेवन के बाद सिजेरियन प्रसव की जरूरत क्यों नहीं पड़ती है?

होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक दवाईयां स्त्री के प्रजनन संस्थान के तंत्रिका-तंत्र में ऐसा संतुलित लचीलापन (balanced flexibility) एवं संकोचन (Contraction) पैदा कर देती हैं। जिसके फलस्वरूप स्त्री का सम्पूर्ण प्रजनन संस्थान निर्धारित समय से पहले प्रसव होने नहीं देता और निर्धारित समय के बाद गर्भ का अतिरिक्त समय बढने नहीं देता। अर्थात न समय से पहले प्रसव (premature delivery), न समय के बाद (undue delay)। जिसे यों कह सकते हैं कि चित भी मेरी और पट भी मेरी।


प्रसव के समय स्त्री के सम्पूर्ण प्रजनन संस्थान का तंत्रिका-तंत्र इतना कोमल और लचीला हो जाता है कि बिना किसी बाहरी एवं अप्राकृतिक हस्तक्षेप तथा विशेष दर्दनाक पीड़ा को झेले बिना ही शिशु बहुत ही आसानी से जन्म ले पाता है। इसी वजह से गर्भिणी को प्रसव पूर्व, झूठी प्रसव पीड़ा भी नहीं झेलनी पड़ती है। भविष्य में स्त्री को गर्भाशयच्युति (Uterus Collapse) की समस्या होने की संभावना नगण्य हो जाती है। प्रसव के बाद स्त्री के प्रजनन अंक सिकुड़कर लगभग पूर्ववत स्त्री में लौट आते हैं, जो भावी सुखद दाम्पत्य जीवन के लिये सुखद अहसास के आधार बनते हैं। अंतिम बात होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक दवाईयों का सेवन बहुत आसान और तुलनात्मक रूप से बहुत कम खर्चीला होता है। मैं गत दो दशक से अधिक समय से प्रसव सुरक्षा चक्र (Pregnancy Safe-Guard-PSG) उपलब्ध करवाता रहा हूं और जिसके परिणामस्वरूप गर्भिणियों को आसानी से प्राकृतिक प्रसव होते रहे हैं। बशर्ते कि लालची डॉक्टर्स के डराने से डरें नहीं।


अत: माता-पिता बनने से पहले और अपनी पहली संतान को जन्म देने से पहले किसी होम्योपैथ की सलाह लेना नहीं भूलें। यह कदम गर्भिणी के लिये सौंदर्य रक्षक, आसान, पीड़ा रहित तथा सामान्य प्रसव का सुखद अहसास और आप दोनों के भावी दाम्पत्य जीवन में रोमांचकारी अनुभव का आधार बनेगा।-Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा): Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM), 09.05.2018. मेरा Health WhatsApp No.: 85619-55619 केवल नि:शुल्क स्वास्थ्य परामर्श चाहने वालों के लिये सार्वजनिक है। इस नम्बर पर फालतू सामग्री भेजने वालों को तुरंत ब्लॉक कर दिया जाता है।
गुदाभ्रंश (Rectum Collapse or Rectal Prolapse) लाइलाज (Incurable) नहीं!



लेखक-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'


गुदाभ्रंश क्या है? (What is Rectum Collapse?)
मलत्याग के समय गुदाद्वारा बाहर निकलने को आम बोलचाल में कांच निकलना बोला जाता है। इसे ही चिकित्सकीय भाषा में गुदाभ्रंश या Rectum Collapse कहा जाता है। य​ह तकलीफ छोटे बच्चों, किशोरों, युवकों, वयस्कों और वृद्धों सहित सभी उम्र के स्त्री-पुरुषों को होती देखी जा सकती है।





गुदाभ्रंश क्यों? (Why the Rectum Collapse?)

वंशानुगत कारणों से या लम्बे समय तक पाचन क्रिया की गड़बड़ी (Digestive System Disorder), सूखे मल को त्यागते समय जोर/ताकत लगाने, पेचिश (Dysentery) आदि की वजह से गुदाद्वार से चिकना पदार्थ/झिल्ली/आंव जैसा पदार्थ निकलने के साथ गुदा क्षेत्र के तंत्रिकातंत्र की मांसपेशियों के कमजोर हो जाने के कारण गुदाद्वारा बाहर निकलने लगता है।

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गुदाभ्रंश की अनदेखी का दुष्परिणाम भगन्दर (The Consequences of Ignoring the Rectum Collapse):
जब गुदाद्वारा बार-बार बाहर निकलता है तो गुदा में सूजन और संक्रमण होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। शर्म और संकोच के कारण अधिकतर लोग इस तकलीफ को लम्बे समय तक किसी को नहीं बताते हैं। शर्म-संकोच इन सभी तकलीफों को बढाने और दुष्कर (Incurable) बनाने में सहायक होते हैं। यही नहीं, इन हालातों में गुदाद्वारा में भगंदर (Fissure) भी हो सकता है। स्त्रियों में योनिभ्रंश (Colpoptosis/Elytroptosis) की तकलीफ भी छिपाने के कारण बढती है। अत: गुदाभ्रंश या योनिभ्रंश की तकलीफों को छिपायें नहीं, बल्कि तुरंत नजदीकतम डॉक्टर को दिखायें और नियमित रूप से ठीक होने तक इलाज करवायें।




गुदाभ्रंश का एलोपैथिक​ उपचार (Allopathic Treatment of Rectum Collapse):
आधुनिक चिकित्सा पद्धति अर्थात् एलोपैथी का मुझे ज्ञान नहीं है। अत: मुझे यह कहने का कोई हक नहीं होगा है कि गुदाभ्रंश का ऐलोपैथी में उपचार नहीं है। हां यह बात सच है कि गुदाभ्रंश की तकलीफ से पीड़ित अधिकतर रोगी मुझे यही कहते हैं कि उन्होंने वर्षों तक एलोपैथिक उपचार करवाया, लेकिन वे ठीक नहीं हुए और अंत में उन्हें ऑपरेशन की सलाह दी गयी। यह भी एक कड़वा सच है कि ऑपरेशन के डर से भी अनेक रोगी हम से सम्पर्क करते हैं।





गुदाभ्रंश का ऑपरेशन पहला नहीं, बल्कि अंतिम विकल्प (Operation not the first, but the last option):
किसी सर्जन डॉक्टर द्वारा ऑपरेशन की सलाह देने पर भी ऑपरेशन करवाने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिये। एक से अधिक डॉक्टर्स से सलाह करें। अन्य चिकित्सा पद्धति के किन्हीं वरिष्ठ डॉक्टर्स से सलाह करें। जब सभी सभी डॉक्टर्स के द्वारा गुदाभ्रंश की तकलीफ का निदान संभव नहीं हो पाये तो और सभी जगह से निराशा मिले फिर भी ऑपरेशन को प्रथम नहीं, बल्कि अंतिम विकल्प (Operation not the first, but the last option) के रूप में ही चुनें।





गुदाभ्रंश का इलाज संभव है (Rectum Collapse is Curable):
सबसे पहली बात खानपीन पर ध्यान रखें और अपनी पाचन क्रिया को दुरुस्त रखें। मेरा अपना अनुभव है कि जब तक आप अपना हाजमा ठीक नहीं करेंगे, गुदाभ्रंश और बवासीर जैसी पीड़ाओं से मुक्ति असम्भव है? पाचन क्रिया में होने वाली गड़बड़ी की बिलकुल भी अनदेखी नहीं करें। क्योंकि इस संसार में स्वास्थ्य से बढकर महत्वूपर्ण कुछ भी नहीं है। इसके बावजूद भी हमारे देश में केवल गरीब और अशिक्षित ही नहीं, बल्कि अनेक उच्च शिक्षित लोग भी स्वास्थ के प्रति लापरवाह होते हैं। गुदाद्वार या प्रजनन अंगों से जुड़ी किसी भी तकलीफ में ऑपरेशन करवाने की जल्दबाजी नहीं करें। ऑपरेशन का निर्णय लेने से पहले 100 बार सोचें। दूसरे-तीसरे डॉक्टर्स की राय लें। मेरा अनुभव है कि इस तकलीफ के कारण हजारों-लाखों ही नहीं, करोड़ों लोग हर दिन असहनीय पीड़ा झेलने को विवश हैं। जबकि लाइलाज (Incurable) समझी जाने वाले गुदाभ्रंश (Rectum Collapse) की पीड़ा से बिना ऑपरेशन मुक्ति सम्भव है। हमारे द्वारा ताजा देशी ऑर्गेनिक (Organic) जड़ी-बूटियों और दुष्प्रभाव रहित जर्मन होम्योपैथक एवं बॉयोकैमिक चिकित्सा पद्धति से गुदाभ्रंश का लम्बे समय से उपचार किया जाता रहा है। सफलता की दर 80% से भी अधिक है। जिसके परिणामस्वरूप अनेकानेक रोगी हर दिन स्वस्थ होकर, सामान्य जीवन जी रहे हैं।


नोट:--------------------------ऑर्गेनिक (Organic) देशी जड़ी बूटियों के बारे में पूर्वजों से प्राप्त अनमोल ज्ञान तथा दुष्प्रभाव रहित होम्योपैथिक एवं बॉयोकैमिक जर्मन दवाईयों के सतत अध्ययन, शोधन, परीक्षण और उपचार के दौरान हमने अनेक अनुभव सिद्ध उपयोगी नुस्खे तैयार किये हैं। जो बेशक कुछ गरीब या कंजूस लोगों को महंगे लग सकते हैं, लेकिन इन नुस्खों से हजारों रोगियों की "लाइलाज समझी जाने वाली" अनेक तकलीफों से मुक्ति मिल चुकी है और चुनौतीपूर्ण मानव सेवा का यह क्रम हमारी वेब साइट स्वास्थ्य रक्षक सखा के जरिये हर दिन देशभर में जारी है। लेकिन 'तुरन्त, गारण्टेड और शर्तिया इलाज' चाहने वाले हमें माफ करें।

-Online Dr. P.L. Meena (डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा): Health Care Friend and Marital Dispute Consultant (स्वास्थ्य रक्षक सक्षा एवं दाम्पत्य विवाद सलाहकार ), Mobile & Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 (10AM to 10 PM), 06.05.2018. Health Advice WhatsApp No.: 85619-55619 केवल नि:शुल्क स्वास्थ्य परामर्श चाहने वालों के लिये सार्वजनिक है। इस पर फालतू सामग्री भेजने वालों को तुरंत ब्लॉक कर दिया जाता है।


--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!

--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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