परंपरागत सब्जियों से हटकर खाएं ये 10 चमत्कारिक सब्जियां
April 25, 2015 01:36 PM

आप भरपूर आलू और टमाटर खाते हैं। इसके अलावा पत्ता गोभी, फूल गोभी, गिलकी, तौरई, भिंडी, लौकी, बैंगन, कद्दू, करेला, पालक, मैथी, अरबी, सरसों का साग, सेम फली (बल्लोर), मटर, बोड़ा (लोभिया या चवला फली), ग्वार फली, सहजन या सुरजने की फली, टिंडा, शिमला मिर्च, भावनगरी मिर्च, शलजम, कटहल, शकरकंद (रतालू) आदि का सेवन करते ही रहे हैं। 

उक्त का सेवन करने के साथ ही आपने प्याज, खीरा, ककड़ी, हरी या लालमिर्च, मूली, धनिया, अदरक, लहसुन, नींबू, आंवला, गाजर, मक्कई, कच्चा आम (केरी) आदि का भी खूब इस्तेमाल किया है।

हम यह भी जानते हैं कि आपने सेंव की सब्जी, चने की भाजी, बेसन, रायता, कढ़ी और पनीर पर भी खूब हाथ साफ किए हैं, पर हम आपको तोटाकुरा, सोया, हरी अजवाइन, हरे प्याज की घास, अरबी का पत्ता, अरबी जड़, पेठा, ब्रोकली, गांठ गोभी, परवल, कच्चे केले की सब्जी, कच्चे केले का तना, कच्चे केले का फूल, पुदीना, धनिया, करी पत्ता, फ्रेंच बीन्स, ग्वार फली, सहजन की फली, पेठा, कमल ककड़ी, सुरतीकंद, अंवलामकाई और मूंगे की फली के बारे में बताने वाले नहीं हैं। लेकिन हम आपको उपरोक्त से अलग ऐसी सब्जियों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आपने शायद ही कभी खाई होगी। आपके लिए हम ढूंढकर लाए हैं ऐसी ही 10 चमत्कारिक सब्जियों की जानकारी जिन्हें जानकर आप रह जाएंगे हैरान...कोझियारी भाजी : कोझियारी भाजी की भाजी साल में एक बार जरूर खाएं। इससे खाने से हर तरह के रोग दूर हो जाते हैं। अधिकतर आदिवासी इस भाजी को खाते हैं। माना जाता है कि इसे खाने वाला कभी बीमार नहीं पड़ता।छत्तीसगढ़ के बैगा आदिवासी लोग इस भाजी को खाकर हमेशा स्वस्थ और तंदुरुस्त बने रहते हैं। बैगा आदिवासी मानते हैं कि जंगलों में पाई जाने वाली कोझियारी भाजी को साल में एक बार जरूर खाना चाहिए। कोझियारी भाजी यानी जंगल में होने वाली सफेद मूसली का पत्ता। ये सभी जानते हैं कि सफेद मूसली शक्तिवर्धक औषधि है। कुंदरु (COCCINIA GRANDIS (Gherkins) : कुंदरू का नाम तो आपने कम ही सुना होगा। कुंदरु को टिंडॉरा नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि 100 ग्राम कुंदरू में 93.5 ग्राम पानी, 1.2 ग्राम प्रोटीन, 18 के. कैलोरी ऊर्जा, 40 मिलीग्राम कैल्शियम, 3.1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 30 मिलीग्राम पोटैशियम, 1.6 ग्राम फाइबर और कई जरूरी पोषक तत्व होते हैं। कहते है कि इसमें बीटा कैरोटिन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।कुंदरू के पत्ते और फूल भी उतने ही गुणकारी हैं जितना इसका फल है। हाल में एक शोध में यह माना गया है कि खाने में रोज 50 ग्राम कुंदरू का सेवन करने से हाई बीपी के मरीजों को आराम मिलता है।चौलाई का साग (amaranth) : चौलाई का साग तो आपने खाया ही होगा लेकिन बहुत कम, कभी-कभार। यह सब्जी बहुत ही आसानी से मिल जाती है। यह हरी पत्तेदार सब्जी है जिसके डंठल और पत्तों में प्रोटीन, विटामिन ए और खनिज की प्रचुर मात्रा होती है। चौलाई में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन-ए, मिनरल्स और आयरन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
इस सब्जी को खाने से आपके पेट और कब्ज संबंधी किसी भी प्रकार के रोग में लाभ मिलेगा। पेट के विभिन्न रोगों से छुटकारा पाने के लिए सुबह-शाम चौलाई का रस पीने से भी लाभ मिलता है। चौलाई की सब्जी का नियमित सेवन करने से वात, रक्त व त्वचा विकार दूर होते हैं।

चौलाई को तंदुलीय भी कहते हैं। संस्कृत में मेघनाथ, मराठी और गुजराती में तांदल्जा, बंगाली में चप्तनिया, तमिल में कपिकिरी, तेलुगु में मोलाकुरा, फारसी में सुपेजमर्ज, अंग्रेजी में Prickly Amaranthus कहते हैं। इसका वानस्पतिक नाम Amaranthus spinosus है। 

चौलाई दो तरह की होती है- एक सामान्य पत्तों वाली तथा दूसरी लाल पत्तों वाली। कटेली चौलाई तिनछठ के व्रत में खोजी जाती है। भादौ की कृष्ण पक्ष की षष्ठी को यह व्रत होता है। चौलाई को खाने से आंतरिक रक्तस्राव बंद हो जाता है। यह सब्जी खूनी बवासीर, चर्मरोग, गर्भ गिरना, पथरी रोग और पेशाब में जलन जैसे रोग में बहुत ही लाभदायक सि‍द्ध हुई है।खुम्ब (Mushroom) : इसे हिन्दी में खुम्ब और वर्तमान में इस पौधे को मशरूम कहा जाता है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के जंगलों में यह स्वादिष्ट और पौष्टिक सब्जी सैकड़ों सालों से बैगा आदिवासी लोग खाते आ रहे हैं। आदिवासी लोग इसे चिरको पिहरी कहते हैं।
भारत के कुछ इलाकों में ऐसी मान्यता है कि यह कुत्तों के मूत्र त्याग के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है, लेकिन यह बिलकुल गलत धारणा है इसीलिए कई लोग इसे कुकुरमुत्ता कहते हैं। स्वाद में यह आलू की तरह ही लगती है लेकिन इसमें भरपूर शारीरिक ताकत पैदा करने की क्षमता होती है। इसके साथ ही कई और भी सब्जियां हैं जैसे पुट्पुरा, बोड़ा, पुटू इनके अलग-अलग इलाके में अलग-अलग नाम हैं।

मशरूम के सेवन से शरीर में सर्विकल कैंसर के लिए जिम्मेदार ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) खत्म हो सकता है जिससे इस कैंसर से निजात संभव हो सकती है। ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी एचपीवी त्वचा, मुंह और गले के जर‌िए सबसे तेजी से फैलने वाले वायरसों में से एक है जिसकी वजह से सर्विकल, मुंह व गले का कैंसर हो सकता है। मशरूम के और भी कई फायदे हैं। इससे पाचनक्रिया सही बनी रहती है और त्वचा में निखार आता है।

मशरूम कई प्रकार होते हैं। भारत के मैदानी भागों में श्वेत बटन मशरूम को शरद ऋतु में नवंबर से फरवरी तक, ग्रीष्मकालीन श्वेत बटन मशरूम को सितंबर से नवंबर व फरवरी से अप्रैल तक, काले कनचपडे़ मशरूम को फरवरी से अप्रैल तक, ढींगरी मशरूम को सितंबर से मई तक, पराली मशरूम को जुलाई से सितंबर तक तथा दूधिया मशरूम को फरवरी से अप्रैल व जुलाई से सितंबर तक उगाया जा सकता है।गोंगुरा (chopped gongura leaves) : गोंगुरा की सब्जी भी बनती है और चटनी व अचार भी। यह बहुत ही स्वादिष्ट होती है। इसमें आयरन, कैल्शियम और विटामिन्स की प्रचुर मात्रा होती है।पालक पत्ते की तरह बनाई जाने वाली गोंगुरा की सब्जी सेहत और पाचन के लिए बहुत ही फायदेमंद है। इसके अलावा इसका अचार भी बनाया जाता है। गोंगुरा को मराठी में अंबाडीची कहते हैं।बथुआ (chenopodium) : बथुआ सब्जी का नाम बहुत कम लोगों ने नहीं सुना होगा। बथुआ एक वनस्पति है, जो खरीफ की फसलों के साथ उगती है। बथुए में लोहा, पारा, सोना और क्षार पाया जाता है। बथुए में आयरन प्रचुर मात्रा में होता है।
ग्रामीण क्षेत्र में इसकी अधिकतर सब्जी बनाई जाती है। इसका रायता भी बनता है। इसका शरबत के रूप में भी उपयोग होता है। जैसे मैथी या गोभी के पराठे बनाए जाते हैं उसी तरह बथुए का पराठा भी स्वादिष्ट होता है। 

यह गोंगुरा या पालक के पत्तों की तरह दिखने वाला छोटा-सा हरा-भरा पौधा काफी लाभदायक है। बथुआ न सिर्फ पाचनशक्ति बढ़ाता बल्कि अन्य कई बीमारियों से भी छुटकारा दिलाता है। सर्दियों में इसका सेवन कई बीमारियों को दूर रखने में मदद करता है। 

यह शाक प्रतिदिन खाने से गुर्दों में पथरी नहीं होती। कब्ज और पेटरोग के लिए तो यह रामबाण है। बथुआ आमाशय को बलवान बनाता है, गर्मी से बढ़े हुए यकृत को ठीक करता है। इसकी प्रकृति तर और ठंडी होती है तथा यह अधिकतर गेहूं के खेत में गेहूं के साथ उगता है और जब गेहूं बोया जाता है, उसी सीजन में मिलता है।जिमिकंद (yam) : जिमिकंद को संस्कृत में सूरण, हिन्दी में सूरन, जिमिकंद, जिमीकंद व मराठी में गोडा सूरण, बांग्ला में ओल, कन्नड़ में सुवर्ण गडड़े, तेलुगु में कंडा डूम्पा और फारसी में जमीकंद कहा जाता है। हाथी के पंजे की आकृति के समान होने के कारण इसे अंग्रेजी में एलीफेंट याम या एलीफेंटफुट याम कहते हैं।
जिमिकंद एक गुणकारी सब्जी है। इसके पत्ते 2-3 फुट लंबे, गहरे हरे रंग के व हल्के हरे धब्बे वाले होते हैं। इसकी पत्तियां अनेक छोटी-छोटी लंबोतरी गोल पत्तियों से गुच्छों में घिरी होती हैं। इसका कंद चपटा, अंडाकार और गहरे भूरे व बादामी रंग का होता है। अनेक संप्रदायों में प्याज-लहसुन के साथ-साथ जिमिकंद से दूर रहने की सलाह दी जाती है, क्योंकि यह कामुकता बढ़ाने वाला होता है।

इसमें विटामिन ए व बी भी होते हैं। यह विटामिन बी-6 का अच्‍छा स्रोत है तथा रक्तचाप को नियंत्रित कर हृदय को स्वस्थ रखता है। इसमें ओमेगा-3 काफी मात्रा में पाया जाता है। यह खून के थक्के जमने से रोकता है। इसमें एंटीऑक्‍सीडेंट, विटामिन सी और बीटा कैरोटीन पाया जाता है, जो कैंसर पैदा करने वाले फ्री रेडिकलों से लड़ने में सहायक होता है। इसमें पोटैशियम होता है जिससे पाचन में सहायता मिलती है। इसमें तांबा पाया जाता है, जो लाल रक्‍त कोशिकाओं को बढ़ाकर शरीर में रक्त के बहाव को दुरुस्त करता है।

आयुर्वेद के अनुसार इसे उन लोगों को नहीं खाना चाहिए जिनको किसी भी प्रकार का चर्म या कुष्ठ रोग हो। जिमिकंद अग्निदीपक, रूखा, कसैला, खुजली करने वाला, रुचिकारक विष्टम्मी, चरपरा, कफ व बवासीर रोगनाशक है। इसे आप कभी-कभार इसलिए खा सकते हैं, क्योंकि इसमें ओमेगा-3 होता है और इसमें भरपूर मात्रा में तांबा पाया जाता है। अजमोद (Parsley) : अजमोद को कई प्रकार से उपयोग में लाया जाता है। इसकी सब्जी भी बनाई जाती है, चूर्ण भी, शरबत भी और चटनी भी। यह कोथमीर या धनिये जैसा होता है। अजमोद में इम्‍यून सिस्‍टम को मजबूत करने की क्षमता होती है, क्योंकि यह विटामिन ए, बी और सी से परिपूर्ण है। इसमें पोटैशियम, मैग्नीज, मैग्‍नीशियम, फॉस्फोरस, कैल्शियम, आयरन, सोडियम और फाइबर भी भरपूर मात्रा में होता है।अजमोद खासकर किडनी की सफाई करने के लिए जाना जाता है। किडनी में मौजूद व्यर्थ पदार्थों को बाहर निकालकर यह आपको स्वस्थ रखता है। अजमोद पेट की समस्याओं को दूर रखने में मदद करता है। श्वास संबंधी रोग में भी यह लाभकारी है। किसी भी तरह की शारीरिक कमजोरी हो तो अजमोद की जड़ के चूर्ण का सेवन करें। ताजा हरा लहसुन (Fresh green garlic) : जैसे हरा प्याज होता है, उसी तरह हरा लहसुन होता है। प्याज के लंबे पत्तों की तरह लहसुन के पत्ते भी लंबे होते हैं। इनको काटकर सब्जी बनाई जाती है, जैसे मूली के पत्तों की सब्जी बनाई जाती है उसी तरह।इसका स्वाद बढ़ाने के लिए लहसुन के पत्तों को किसी अन्य सब्जी जैसे गोभी या आलू के साथ मिलाकर भी बना सकते हैं। यह सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद है।केल की सब्जी (Kell) : केले की नहीं, केल की सब्जी के बारे में सभी लोग जानते होंगे। केल की सब्जी में विटामिन्स, खनिज और रेशे सब कुछ बहुतायत में पाए जाते हैं। 
वैसे केल का प्रयोग सलाद, स्टिर फ्राई, स्मूदी, पास्ता आदि के रूप में किया जाता है लेकिन इसकी भाजी और भूजी भी बनाई जाती है। वनस्पति विज्ञान के अनुसार यह मूली और सरसों परिवार का सदस्य है।

इसके अलावा आप परंपरागत सब्जियों के साथ समय-समय पर उक्त और निम्न सब्जियों का भी सेवन करते रहेंगे ‍तो जीवनपर्यंत निरोगी और तंदुरुस्त बने रहेंगे। 

ये सब्जियां हैं- तोटाकुरा, सोया, हरी अजवाइन, हरे प्याज की घास, अरबी पत्ता, अरबी जड़, पेठा, ब्रोकली, गांठ गोभी, रवल, कच्चे केले की सब्जी, कच्चे केले का तना, कच्चे केले का फूल, पुदीना, धनिया, करी पत्ता, फ्रेंच बीन्स, ग्वार फली, सहजन की फली, पेठा, कमल ककड़ी, सुरतीकंद, अंवलामकाई, मूंगे की फली आदि।
Source : http://tatkalnews.com/news/70862-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%A4-%E0%A4%B8%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A4%9F%E0%A4%95%E0%A4%B0-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A5%87-10-%E0%A4%9A%E0%A4%AE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%82.aspx
चौलाई की सब्जी से करें 50 रोगों का उपचार
By Street Ayurveda on April 27, 2016

एक ऐसी सब्जी जो कैंसर से लेकर सफ़ेद बालो तक लगभग 50 रोगों में फायदेमंद है

★ एक ऐसी सब्जी जो कैंसर से लेकर सफ़ेद बालो तक लगभग 20 रोगों में फायदेमंद है ★

सब्जियों में चौलाई का अपना एक अलग स्थान है। दुनिया भर के लोग इसका उपयोग सब्जी और अनाज के रूप में स्वास्थ्य लाभों के रूप में करते है। यह अनेकों औषधीय गुणों से भरपूर होता है।
चौलाई दो तरह की होती है ,एक सामान्य हरे पत्तों वाली दूसरी लाल पत्तों वाली। यह कफ और पित्त का नाश करती है जिससे रक्त विकार दूर होते हैं। पेट और कब्ज के लिए चौलाई का साग बहुत उत्तम माना जाता है। चौलाई की सब्जी का नियमित सेवन करने से वात, रक्त व त्वचा विकार दूर होते हैं। सबसे बडा गुण सभी प्रकार के विषों का निवारण करना है, इसलिए इसे विषदन नाम दिया गया है। इसके डंठल और पत्तों में पौष्टिक तत्वों की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। पेट और कब्ज के लिए चौलाई बहुत उत्तम मानी जाती है।
चौलाई में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन-ए, मिनिरल्स और आयरन प्रचुर मात्रा में पाए जाते है। इसमें सोना धातु पाया जाता है जो किसी और साग-सब्जियों में नहीं पाया जाता। औषधि के रूप में चौलाई के पंचांग यानि पांचों अंग- जड, डंठल, पत्ते, फल, फूल काम में लाए जाते हैं। इसकी डंडियों, पत्तियों में प्रोटीन, खनिज, विटामिन ए, सी प्रचुर मात्रा में है


कहा गया है कि किसी भी तरह के चर्म रोग में इसके पत्ते पीस कर लेप कर 21 दिनों तक लगातार लेप करने से वह ठीक हो जाता है। शरीर में अगर कही भी खून बह रहा है और बंद नहीं हो रहा लाल पत्ते वाली चौलाई की जड़ को पानी में पीस कर पी लेने से ही रुक जाता है। एक बार पीने से नहीं रुक रहा तो बारह घंटे बाद दुबारा पीने को कहा गया है। चाहे गर्भाशय से खून बह रहा हो या मल द्वार से या बलगम के साथ यह सब में उपयोगी बताई गई है। मान्यता है कि गर्भवती को खून दिखाई दे जाए तो फ़ौरन पी ले, गिरता हुआ गर्भ रुक जायेगा। जिनको गर्भ गिरने की बीमारी हो उन महिलाओं के लिये मासिक धर्म के समय में रोज जड़ पीस कर चावलों के पानी के साथ पीने का उल्लेख मिलता है।


आइये जाने के स्वास्थ्य लाभों के बारे में

सूजन को कम करें :
ऐमरैन्थ यानि चौलाई के तेल और पेप्टाइड में एंटी-इफ्लेमेंटरी गुण होता है जो दर्द और सूजन को सहजता से कम करने में मदद करता है। यह पुरानी स्थितियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है जहां पर सूजन स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

फोड़े-फुंसी :
फोड़े-फुंसी पर चौलाई के पत्तों की पुल्टिस बना कर लगाने से फोड़ा जल्द पक कर फूट जाता है। सूजन होने पर उस स्थान पर इसका लेप करने से सूजन दूर होती है।

वजन करने में मददगार :
जैसा की हम जानते हैं कि प्रोटीन रक्त में इंसुलिन के स्तर को कम कर और हार्मोंन की विज्ञप्ति कर आपकी भूख को दबा देता है जिससे की आप भूख को कम महसूस करते हो। आपको यह जानकर खुशी होगी कि लगभग 15 प्रतिशत चौलाई में प्रोटीन होता है जो आपके वजन घटाने के कार्यक्रम में सहायता कर सकता हैं।

रक्तचाप कम करें :
अध्ययन के अनुसार, ऐमरैन्थ में मौजूद फाइबर और फिटोन्यूट्रीएंट्स नामक तत्व रक्तचाप को कम करने में मदद करते है। जिससे यह कोलेस्ट्रॉल, सूजन और रक्तचाप के साथ प्रभावी ढ़ंग से लड़ता है और दिल की सेहत के लिए भी अच्छा होता है।
शरीर में रक्त की कमी दूर करें :
औषधि के रूप में चौलाई की जड़, पत्ते और बीज सभी काम में लाये जाते है। इसकी पत्तियों और बीजों में प्रोटीन, विटामिन ए और सी प्रचुर मात्रा में होता है। ऐमरैन्थ यानि चौलाई का साग एनिमिया रोग से लड़ने का सबसे कारगर उपाय है। इसके सेवन से शरीर में रक्त की कमी दूर होती है। शरीर में खून की कमी को दूर करने के लिए इसका सेवन सब्जी या सूप के रूप में करें।

कैंसर की रोकथाम :
ऐमरैन्थ में मौजूद पेप्टाइड्स श्ारीर में सूजन को दूर करने के साथ कैंसर के विकास को रोकने में भी बहुत मददगार होता है। इसमें मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त होने से बचाता है जिससे कैंसर को रोकने में मदद मिलती है।

पचाने में आसान :
ऐमरैन्थ में मौजूद फाइबर और अमीनो एसिड के कारण यह पचाने में बहुत आसान होता है। इसमें मौजूद फाइबर कारण यह आंतों से चिपके हुए मल को निकालकर उसे बाहर धकेलने में मदद करता है जिससे पेट साफ होता है और पाचन संस्थान को शक्ति मिलती है। इसी कारण से इसे पारंपरिक रूप से बीमारी से उबर रहे मरीजों को दिया जाता है।

पेशाब में जलन :
पेशाब में होने वाली जलन को शांत करने के लिए चौलाई के रस का कुछ दिनों तक सेवन करने से मूत्रवृध्दि होती है और जलन ठीक होती है।

खूनी बवासीर :
खूनी बवासीर हो या मूत्र में खून आता हो ,चौलाई के पत्ते पीस कर मिश्री मिलाकर शरबत बनाकर ३ दिन लगातार पीजिये।

प्रतिरक्षा प्रणाली को बढावा :
ऐमरैन्थ का एक और स्वास्थ्य लाभ यह भी है कि मौजूद आवश्यक विटामिन, खनिज और शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को ठीक रखने में मदद करते है। इसलिए अगर आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर है तो आपको चौलाई को लेने पर विचार करना चाहिए।

स्तनों का आकार बढ़ने के लिए :
नारियों को अपने स्तनों का आकार बढ़ाना हो तो अरहर की दाल के साथ चौलाई का साग पका कर चालीस दिनों तक लगातार खाइये,जड़ काटकर फेकना नहीं है वह भी पका देनी है।

एनर्जी बूस्टर :
कुछ सब्जियों और अनाजों में आवश्यक अमीनो एसिड की कमी होती है, लेकिन चौलाई में लाइसिन बहुत अधिक मात्रा में होने के कारण यह कैल्शियम को अवशोषित करने के लिए शरीर की मदद करता है। इस कारण से चौलाई मांसपेशियों के निर्माण और ऊर्जा के उत्पादन के लिए बहुत अच्छा होता है।

बालों को सफेद होने से रोकता है :
अगर आप बालों के असमय सफेद होने से चिंतित हैं? तो आपकी इस चिंता का समाधान चौलाई द्वारा हो सकता है। यह बालों को असमय सफेद होने से रोकने का काफी प्रभावी उपाय है। चौलाई को अपने आहार में शामिल कर आप इस समस्या से निजात पा सकते हैं।

पथरी :
पथरी में चौलाई का साग चालीस दिनों तक प्रतिदिन खाने पर पथरी गल जाती है।
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स्वाद और स्वास्थ्य
साग चौलाई का 
क्या आप जानते हैं?
चौलाई दो तरह की होती है, एक सामान्य हरे पत्तों वाली दूसरी लाल पत्तों वाली जिसे लाल साग भी कहते हैं। 


कटेली चौलाई तिनछठ के व्रत में खोजी जाती है। भादों की कृष्ण पक्ष की षष्ठी को यह व्रत होता है। 


चौलाई की कुछ प्रजातियाँ बहुरंगी आकर्षक होती हैं इनका प्रयोग सजावटी पौधों के रूप में किया जाता है।

हरी पत्तेदार सब्जी में चौलाई का मुख्य स्थान है। चौलाई दो तरह की होती है ,एक सामान्य हरे पत्तों वाली दूसरी लाल पत्तों वाली। यह कफ और पित्त का नाश करती है जिससे रक्त विकार दूर होते हैं। पेट और कब्ज के लिए चौलाई का साग बहुत उत्तम माना जाता है। चौलाई की सब्जी का नियमित सेवन करने से वात, रक्त व त्वचा विकार दूर होते हैं। सबसे बडा गुण सभी प्रकार के विषों का निवारण करना है, इसलिए इसे विषदन नाम दिया गया है। इसके डंठल और पत्तों में पौष्टिक तत्वों की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। पेट और कब्ज के लिए चौलाई बहुत उत्तम मानी जाती है। कुल मिलाकर चौलाई एक स्वादिष्ट सब्जी भी है और महत्वपूर्ण दवा भी।

विविध भाषाओं में-इसे तन्दुलीय भी कहते हैं। संस्कृत में मेघनाथ भी कहते है। मराठी, गुजराती में तान्दल्जा, बंगाली में चप्तनिया, तमिल में कपिकिरी, तेलगू में मोलाकुरा, फारसी में सुपेजमर्ज, अंग्रेजी में प्रिकली ऐमरेन्थस,और वैज्ञानिक भाषा में एमरेन्थस स्पिनोसस (Amaranthus spinosus) कहते हैं।

आयुर्वेद में-माना गया है कि किसी भी तरह के चर्म रोग में इसके पत्ते पीस कर लेप कर २१ दिनों तक लगातार लेप करने से वह ठीक हो जाता है। शरीर में अगर कही भी खून बह रहा है और बंद नहीं हो रहा लाल पत्ते वाली चौलाई की जड़ को पानी में पीस कर पी लेने से ही रुक जाता है। एक बार पीने से नहीं रुक रहा तो बारह घंटे बाद दुबारा पीने को कहा गया है। चाहे गर्भाशय से खून बह रहा हो या मल द्वार से या बलगम के साथ यह सबमें उपयोगी बताई गई है। मान्यता है कि गर्भवती को खून दिखाई दे जाए तो फ़ौरन पी ले, गिरता हुआ गर्भ रुक जायेगा। जिनको गर्भ गिरने की बीमारी हो उन महिलाओं के लिये मासिक धर्म के समय में रोज जड़ पीस कर चावलों के पानी के साथ पीने का उल्लेख मिलता है।

रासायनिक तत्व-चौलाई में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन-ए, मिनिरल्स और आयरन प्रचुर मात्रा में पाए जाते है। इसमें सोना धातु पाया जाता है जो किसी और साग-सब्जियों में नहीं पाया जाता। औषधि के रूप में चौलाई के पंचांग यानि पांचों अंग- जड, डंठल, पत्ते, फल, फूल काम में लाए जाते हैं। इसकी डंडियों, पत्तियों में प्रोटीन, खनिज, विटामिन ए, सी प्रचुर मात्रा में है।

घरेलू उपयोग-पेट या आमाशय में कोई रोग हो तो रोज चौलाई का साग खाने से लाभ मिलता है। 
शरीर में जलन हो रही हो चौलाई का काढा लाभदायक होता है। सांप, बिच्छू या किसी जहरीले कीड़े के काट लेने पर चौलाई की जड़ के साथ पंद्रह दाने काली मिर्च एक साथ पीस कर चावलों के धोवन में घोल कर पिलाने से लाभ मिलता है। पथरी में चौलाई का साग चालीस दिनों तक प्रतिदिन खाने पर पथरी गल जाती है। चौलाई जलाकर राख बना लें, उस राख को पानी में मिलाकर लेप बनाएँ, इस लेप को मुंह में लगाकर सूर्य की किरणों में बैठने से कील मुंहासे और झाइयों में लाभ होता है। चौलाई का सेवन गठिया, ब्लडप्रेशर और हृदय रोगियों के लिए लाभदायक है। खूनी बवासीर हो या मूत्र में खून आता हो, चौलाई के पत्ते पीस कर मिश्री मिलाकर शरबत बनाकर 3 दिन लगातार पियें।

अन्य औषधीय गुण-
छोटे बच्चों को कब्ज होने पर उन्हें औषधि के रूप में २-३ चम्मच चौलाई का रस पिलाने से लाभ होता है।
पेट के विभिन्न रोगों से छुटकारा पाने के लिए सुबह शाम चौलाई का रस पीने से लाभ मिलता है।
बालों के टूटने की परेशानी को दूर करने के लिए मौसम में चौलाई का रस १५ मि.ली. (एक बड़ा चम्मच) नियमित लें।

प्रसव के बाद अगर प्रसूता महिला को चौलाई का साग नियमित दिया जाए तो दूध की कमी नहीं रहती।
पेशाब में होने वाली जलन को शांत करने के लिए चौलाई के रस का कुछ दिनों तक सेवन करने से मूत्रवृध्दि होती है और जलन ठीक होती है।

खून की कमी में चौलाई का लाल साग सब्जी के रूप में या सूप के रूप में लेने से लाभ मिलता है। हाथ-पैर, शरीर की जलन में एक कप चौलाई के रस में थोड़ी शक्कर मिलाकर पीने से लाभ मिलता है।

फोड़े-फुंसी पर चौलाई के पत्तों की पुल्टिस बना कर लगाने से फोड़ा जल्द पक कर फूट जाता है। सूजन होने पर उस स्थान पर इसका लेप करने से सूजन दूर होती है।

धार्मिक उपयोग-

भारतीय संस्कृति में आमतौर पर यह देखा गया है कि स्वास्थ्य के लिये उपयोगी वस्तुओं को उस मौसम के धर्मिक उत्सवों या परंपराओं से जोड़ा गया है। इसी क्रम में भादों की कृष्ण पक्ष की षष्ठी को मनाए जाने वाले तिनछठ व्रत में कटेली चौलाई का बहुत महत्व है।

सजावटी उपयोग-चौलाई की अनेक प्रजातियों की पत्तियाँ बहुत सुंदर रंगों वाली होती हैं जिनका प्रयोग बगीचे में सजावटी पौधों के रूप में किया जाता है। गौरैया जैसे बहुत से पक्षी इनके रंगों से आकर्षित होते हैं और इन्हें चाव से खाते हैं इसलिये इनके छोटे पौधों को चिड़ियों से बचाकर रखने की आवश्यकता होती है।

१६ फरवरी २०१५
Source : http://www.abhivyakti-hindi.org/ss/2015/chaulai.htm
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TUESDAY, FEBRUARY 9, 2016



हरे पत्ते की सब्जी स्वास्थ्य के लिये बहुत ही लाभ कारी होती हैं। चौलाई को मालवा मे खाटी भाजी के नाम से जानते हैं| इन हरे पत्ते की सब्जियों को यदि रोजाना के खाने के साथ प्रयोग किया जाय तो शरीर में होने वाले विटामिन्स की कमी को काफी हद तक पूरा किया जा सकता है।
चौलाई दो तरह की होती है- एक सामान्य पत्तों वाली तथा दूसरी लाल पत्तों वाली। कटेली चौलाई तिनछठ के व्रत में खोजी जाती है। भादौ की कृष्ण पक्ष की षष्ठी को यह व्रत होता है। चौलाई को खाने से आंतरिक रक्तस्राव बंद हो जाता है। यह सब्जी खूनी बवासीर, चर्मरोग, गर्भ गिरना, पथरी रोग और पेशाब में जलन जैसे रोग में बहुत ही लाभदायक सि‍द्ध हुई है।

यह कफ और पित्त का नाश करती है जिससे रक्त विकार दूर होते हैं। पेट और कब्ज के लिए चौलाई का साग बहुत उत्तम माना जाता है। चौलाई की सब्जी का नियमित सेवन करने से वात, रक्त व त्वचा विकार दूर होते हैं। सबसे बडा गुण सभी प्रकार के विषों का निवारण करना है, इसलिए इसे विषघ्न भी कहा गया है| इसके डंठल और पत्तों में पौष्टिक तत्वों की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। पेट और कब्ज के लिए चौलाई बहुत उत्तम मानी जाती है 

इसे हम अनेकों प्रकार से बनाते हैं जैसे चौलाई के पत्तों में दाल मिला कर साग बनाते हैं, चौलाई को आलू के साथ मिला कर चौलाई आलू भुजिया बनाते हैं, चौलाई को बैंगन में मिला कर चौलाई बैंगन भाजी बनाते हैं ।
आप अपने स्वाद के हिसाब से इसे अन्य मनचाही सब्जियों में मिलाकर बना सकते हैं. चौलाई के पत्ते को मूंग के दाल के साथ मिला कर बहुत ही स्वादिष्ट सब्जी बनायी जाती है। कुछ घरों में मूंग दाल की जगह तुअर अथवा उड़द दाल को मिलाकर भी बनाते हैं।
कुल मिलाकर चौलाई एक स्वादिष्ट सब्जी भी है और महत्वपूर्ण दवा भी।

चौलाई की औषधीय उपयोगिता-
1) औषधि के रूप में चौलाई के पंचाग यानि पांचों अंग जड़, डंठल, पत्ते, फल और फूल काम में लाये जाते हैं। इसकी डंडियों और पत्तियों में प्रोटीन, खनिज, विटामिन ए, सी प्रचुर मात्रा में है। इसका सेवन सब्जी या सूप के रूप में होता है। चौलाई पेट के रोगों के लिए गुणकारी है। इसमें रेशे, क्षार द्रव्य होते हैं, जो आंतों में चिपके हुए मल को निकालकर उसे बाहर धकेलने में मदद करते हैं। इससे पेट साफ होता है और कब्ज दूर होता है। पाचन संस्थान को ताकत मिलती है। छोटे बच्चों को यदि इसका दो-तीन चम्मच रस दिया जाय, तो कब्ज दूर करता है।
2) दूध पिलाने वाली माताओं के लिए यह उपयोगी है अगर उन्हें दूध कम उतरता है, तो चौलाई के साग का सेवन करें।
3) चौलाई की जड़ को पीसकर चावल के माड (पसावन) में डालकर, शहद मिलाकर पीने से प्रदर रोग ठीक होता है। जिन स्त्रियों को बार-बार गर्भपात होता है। उनके लिए चौलाई साग का सेवन लाभकारी है।
4) चूहे, बिच्छू, संखिया किसी का भी विष चढ़ गया हो, तो चौलाई का रस या जड़ का क्वाथ में काली मिर्च डालकर पीने से विष दूर हो जाता है।
5) ये सिद्ध हो चुका है कि धूम्रपान, शराब सेवन करने वाली महिलाएं मंदबुद्धि तथा कम वजन वाले बच्चे को जन्म देती हैं। ऐसी महिलाओं को चौलाई साग का लगातार सेवन करना चाहिये। शराब सेवन व धूम्रपान छूट जायेगा।
6) चौलाई का साग भूख बढ़ाता है। इस साग में लोह तत्व पाया जाता है, जो हमारे शरीर को भरपूर आयरन देता है।
7) अगर कोई एनीमिक होताहै तो इसकी सब्जी व पत्तों एवं डंठल छीलकर उसका सूप कुछ दिनों तक पियें जल्द फायदा करेगा।
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Tuesday, 10 June 2014

पुुरुषों को मजबूत बनाने वाले 15 नुस्खे, ये करने से मिलेगी जबरदस्त ताकत

किसी भी तरह की कमजोरी पुरुषों में आत्मविश्वास की कमी का कारण बन सकती है। जो पुरुष ताकतवर होते हैं, उनका दांपत्य जीवन भी सुखी रहता है। कई बार पुरुषों में पाई जाने वाली शारीरिक कमजोरियां अस्वस्थ संबंधों का कारण बन जाती हैं।

कुछ शारीरिक कमजोरियां जैसे स्वप्न दोष, शीघ्र पतन व कमजोरी आदि ऐसी समस्याएं हैं, जो मन पर नियंत्रण न होने के कारण होती हैं। किसी व्यक्ति के जीवन में यौन समस्याएं उसके यौन जीवन में शुरुआत में विकसित हो सकती हैं या असुखद व असंतोषजनक यौन अनुभव होने के बाद भी विकसित हो सकती हैं।

यौन समस्याओं के कारण शारीरिक, मानसिक, या दोनों हो सकते हैं। आज हम आपको बता रहे हैं पुरुषों में कमजोरी पैदा करने वाली समस्याओं को खत्म करने के लिए कुछ नेचुरल नुस्खे। ये इस समस्या में रामबाण की तरह काम करते हैं।
  1. - रोज रात को सोने से पहले लहसुन की दो कलियां निगल लें। फिर थोड़ा-सा पानी पिएं। आंवले के चूर्ण में मिश्री पीसकर मिलाएं। इसके बाद प्रतिदिन रात को सोने से पहले करीब एक चम्मच इस मिश्रित चूर्ण का सेवन करें। इसके बाद थोड़ा-सा पानी पिएं।
  2. - आंवले का मुरब्बा खाएं। केला पुरुष की शक्ति को बढ़ाने वाला फल है। प्रतिदिन केले खाएं और संभव हो तो केला खाने के बाद दूध भी पिएं।
  3. - अजवाइन की पत्तियां स्वप्नदोष की समस्या के लिए एक बेहतरीन दवा है। अजवाइन की पत्तियों का जूस निकालकर उसे शहद के साथ लें। अजवाइन का रस इस तरह से लेने से बहुत जल्दी लाभ होता है।
  4. - नपुंसकता दूर करने के लिए पुरुषों को कच्ची भिंडी चबानी चाहिए। इस समस्या में भिंडी एक बेहतरीन दवा का काम करती है।
  5. - प्याज के सफेद कंद का रस, शहद, अदरक का रस और घी का मिश्रण 21 दिनों तक लगातार लेने से नपुंसकता दूर होकर पौरुष शक्ति प्राप्त होती है।
  6. -छुई-मुई के बीजों के चूर्ण (3 ग्राम) को दूध में मिलाकर रोजाना रात को सोने से पहले लिया जाए तो शारीरिक दुर्बलता दूर हो जाती है।
  7. - स्वस्थ सोच से ही शरीर स्वस्थ रहता है। यह एक सच्चाई है। इन समस्याओं के लिए हमारे मन की भावनाएं भी काफी हद तक जिम्मेदार होती हैं। मन में भोग-विलास के वासनात्मक ख्याल रहना या मन में हमेशा काम-वासना के विचार घुमड़ते रहना स्वप्नदोष व शीघ्रपतन जैसी समस्याओं का एक बड़ा कारण है।
  8. -मेथी को इस समस्या की बहुत कारगर दवा माना गया है। दो चम्मच मेथी के जूस में आधा चम्मच शहद मिलाकर रोजाना रात को लेने से इस समस्या में बहुत जल्दी आराम मिलता है।
  9. - हमारी आदतें भी स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती है। यही कारण है कि कई बार सिर्फ गलत आहार-विहार यानी गलत समय पर गलत चीजें गलत तरीके से गलत मात्रा में लेने और अप्राकृतिक तरीके से अपनी दिनचर्या रखने से समस्याएं पैदा होती हैं।
  10. इन सभी कारणों से न सिर्फ स्वास्थ्य पर, बल्कि विवाहित जीवन पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही, आवश्यकता से अधिक भोजन करना भी पुरुषों में शारीरिक कमजोरी का एक बड़ा कारण बन सकता है।
  11. - बहुत अधिक गरिष्ठ भोजन, जैसे पिज्जा, बर्गर जैसे फास्ट फूड भी इसका एक बड़ा कारण हैं। अधिक घी-दूध, मेवे-मिठाई आदि का सेवन करना भी आयुर्वेद की दृष्टि से अच्छा नहीं माना गया है।
  12. - कच्चे प्याज का सेवन स्वप्नदोष की समस्या में बहुत अच्छा माना गया है। खाने में किसी भी रूप में प्याज का सेवन किया जाए तो इस समस्या में लाभ पहुंचता है। साथ ही, अगर इसे कच्चा खाया जाए तो बेहतर परिणाम मिलते हैं।
  13. - कुछ पौधों को कभी खर-पतवार तो कभी कचरा या कभी फालतू पौधा मानकर उखाड़ फेंक दिया जाता है। ऐसा ही एक पौधा है पुनर्नवा। पुनर्नवा का वानस्पतिक नाम बोहराविया डिफ्यूसा है। पुनर्नवा की ताजी जड़ों का रस (2 चम्मच) दो से तीन माह तक लगातार दूध के साथ सेवन करने से वृद्ध व्यक्ति भी युवा की तरह महसूस करने लगता है।
  14. - तिल का तेल भी इस समस्या में रामबाण की तरह काम करता है। तिल के तेल को जितनी मात्रा में लें, उतनी ही मात्रा में लौकी का जूस भी लें। रात को सोने से पहले इस तेल के मिश्रण से अपने सिर और बॉडी पर मसाज करें। यह एक बहुत प्रभावी नुस्खा है, जो बिना किसी खास खर्च के आपको इस समस्या से पूरी तरह राहत देगा।
  15. - स्वस्थ सोच से ही शरीर स्वस्थ रहता है। यह एक बड़ी सच्चाई है। इन समस्याओं के लिए हमारे मन की भावनाएं भी काफी हद तक जिम्मेदार होती हैं। मन में भोग-विलास के वासनात्मक ख्याल लाना या मन में काम-वासना के विचार करना स्वप्रदोष व शीघ्रपतन जैसी समस्याओं का एक बड़ा कारण है।
  16. - साबुत अनाज को भिगोकर अंकुरित कर खाने से खून बढ़ता है। इसके नियमित सेवन से स्वप्नदोष की समस्या कम हो जाती है।
पुनर्नवा (साटी) Punarnava

बडी आसानी से मील जाने वाली यह वनस्पती (पुनर्नवा) के गुणों के बारे मे सुन यकीन मानिऐ आप हैरान हो जाऐगे ।
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पुनर्नवा का संस्कृत पर्याय 'शोथघ्नी' (सूजन को हरने वाली) है। पुनर्नवा (साटी) या विषखपरा के नाम से विख्यात यह वनस्पति वर्षा ऋतु में बहुतायत से पायी जाती है। शरीर की आँतरिक एवं बाह्य सूजन को दूर करने के लिए यह अत्यंत उपयोगी है।

यह तीन प्रकार की होती हैः सफेद, लाल, एवं काली। काली पुनर्नवा प्रायः देखने में भी नहीं आती, सफेद ही देखने में आती है। काली प्रजाति बहुत कम स्थलों पर पायी जाती है। जैसे तांदूल तथा पालक की भाजी बनाते हैं, वैसे ही पुनर्नवा की सब्जी बनाकर खायी जाती है। इसकी सब्जी शोथ (सूजन) की नाशक, मूत्रल तथा स्वास्थ्यवर्धक है।

पुनर्नवा कड़वी, उष्ण, तीखी, कसैली, रूच्य, अग्निदीपक, रुक्ष, मधुर, खारी, सारक, मूत्रल एवं हृदय के लिए लाभदायक है। यह वायु, कफ, सूजन, खाँसी, बवासीर, व्रण, पांडुरोग, विषदोष एवं शूल का नाश करती है।

पुनर्नवा में से पुनर्नवादि क्वाथ, पुनर्नवा मंडूर, पुनर्नवामूल धनवटी, पुनर्नवाचूर्ण आदि औषधियाँ बनती हैं।
बड़ी पुनर्नवा को साटोड़ी (वर्षाभू) कहा जाता है। उसके गुण भी पुनर्नवा के जैसे ही हैं।

-------------------------औषधि-प्रयोगः------------------------

नेत्रों की फूलीः पुनर्नवा की जड़ को घी में घिसकर आँखों में आँजें।
नेत्रों की खुजलीः पुनर्नवा की जड़ को शहद अथवा दूध में घिसकर आँजने से लाभ होता है।
नेत्रों से पानी गिरनाः पुनर्नवा की जड़ को शहद में घिसकर आँखों में आँजने से लाभ होता है।
रतौंधीः पुनर्नवा की जड़ को काँजी में घिसकर आँखों में आँजें।
खूनी बवासीरः पुनर्नवा की जड़ को हल्दी के काढ़े में देने से लाभ होता है।
पीलियाः पुनर्नवा के पंचांग (जड़, छाल, पत्ती, फूल और बीज) को शहद एवं मिश्री के साथ लें अथवा उसका रस या काढ़ा पियें।
मस्तक रोग व ज्वर रोगः पुनर्नवा के पंचांग का 2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम घी एवं 20 ग्राम शहद में सुबह-शाम देने से लाभ होता है।
जलोदरः पुनर्नवा की जड़ के चूर्ण को शहद के साथ खायें।
सूजनः पुनर्नवा की जड़ का काढ़ा पिलाने एवं सूजन पर लेप करने से लाभ होता है।
पथरीः पुनर्नवामूल को दूध में उबालकर सुबह-शाम पियें।

-----------------------------------विष------------------------------
चूहे का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 2-2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम शहद के साथ दिन में 2 बार दें।
पागल कुत्ते का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 25 से 50 ग्राम रस, 20 ग्राम घी में मिलाकर रोज पियें।
विद्राधि (फोड़ा) : पुनर्नवा के मूल का काढ़ा पीने से कच्चा अथवा पका हुआ फोड़ा भी मिट जाता है।
अनिद्राः पुनर्नवा के मूल का क्वाथ 100-100 मि.ली. दिन में 2 बार पीने से निद्रा अच्छी आती है।
संधिवातः पुनर्नवा के पत्तों की भाजी सोंठ डालकर खायें।
वातकंटकः वायुप्रकोप से पैर की एड़ी में वेदना होती हो तो पुनर्नवा में सिद्ध किया हुआ तेल पैर की एड़ी पर पिसें एवं सेंक करें।
योनिशूलः पुनर्नवा के हरे पत्तों को पीसकर बनायी गयी उँगली जैसे आकार की सोगटी को योनि में धारण करने से भयंकर योनिशूल भी मिटता है।
विलंबित प्रसव-मूढ़गर्भः पुनर्नवा के मूल के रस में थोड़ा तिल का तेल मिलाकर योनि में लगायें। इससे रुका हुआ बच्चा तुरंत बाहर आ जाता है।

गैसः 2 ग्राम पुनर्नवा के मूल का चूर्ण, आधा ग्राम हींग तथा 1 ग्राम काला नमक गर्म पानी से लें।
स्थूलता-मेदवृद्धिः पुनर्नवा के 5 ग्राम चूर्ण में 10 ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम लें। पुनर्नवा की सब्जी बना कर खायें।
मूत्रावरोधः पुनर्नवा का 40 मि.ली. रस अथवा उतना ही काढ़ा पियें। पुनर्नवा के पान बाफकर पेड़ू पर बाँधें। 1 ग्राम पुनर्नवाक्षार (आयुर्वेदिक औषधियों की दुकान से मिलेगा) गरम पानी के साथ पीने से तुरंत फायदा होता है।
खूनी बवासीरः पुनर्नवा के मूल को पीसकर फीकी छाछ (200 मि.ली.) या बकरी के दूध (200 मि.ली.) के साथ पियें।
पेट के रोगः गोमूत्र एवं पुनर्नवा का रस समान मात्रा में मिलाकर पियें।
श्लीपद (हाथीरोग) : 50 मि.ली. पुनर्नवा का रस और उतना ही गोमूत्र मिलाकर सुबह शाम पियें।
वृषण शोथः पुनर्नवा का मूल दूध में घिसकर लेप करने से वृषण की सूजन मिटती है। यह हाड्रोसील में भी फायदेमंद है।
हृदयरोगः हृदयरोग के कारण सर्वांगसूजन हो गयी हो तो पुनर्नवा के मूल का 10 ग्राम चूर्ण और अर्जुन की छाल का 10 ग्राम चूर्ण 200 मि.ली. पानी में काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पियें।
श्वास (दमा) : 10 ग्राम भारंगमूल चूर्ण और 10 ग्राम पुनर्नवा चूर्ण को 200 मि.ली. पानी में उबालकर काढ़ा बनायें। जब 50 मि.ली. बचे तब उसमें आधा ग्राम श्रृंगभस्म डालकर सुबह-शाम पियें।
रसायन प्रयोगः हमेशा उत्तम स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए रोज सुबह पुनर्नवा के मूल का या पत्ते का 2 चम्मच (10 मि.ली.) रस पियें अथवा पुनर्नवा के मूल का चूर्ण 2 से 4 ग्राम की मात्रा में दूध या पानी से लें या सप्ताह में 2 दिन पुनर्नवा की सब्जी बनाकर खायें।


पुनर्नवा में मूँग व चने की छिलकेवाली दाल मिलाकर इसकी बढ़िया सब्जी बनती है। ऊपर वर्णित तमाम प्रकार के रोग हों ही नहीं, स्वास्थ्य बना रहे इसलिए इसकी सब्जी या ताजे पत्तों का रस काली मिर्च व शहद मिलाकर पीना हितकर है। बीमार तो क्या स्वस्थ व्यक्ति भी अपना स्वास्थ्य अच्छा रखने के लिए इसकी सब्जी खा सकते हैं। भारत में यह सर्वत्र पायी जाती है। संत श्री आसारामजी आश्रम (दिल्ली, अमदावाद, सूरत आदि) में पुनर्नवा का नमूना देखा जा सकता है। आपके इलाकों में भी यह पर्याप्त मात्रा में होती होगी।.

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स्रोत : https://desinushkhe.blogspot.in/2013/06/punarnava.html
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पुनर्नवा (NYETAGINACEASE) SPEREADING HOGWEED, BOETHAAVIA DIFFUSA

परिचय : पुनर्नवा का अभिप्राय है यह है कि जो रसायन व रक्तवर्धक होने से शरीर को फिर से नया जैसा बना दे, उसे पुनर्ववा कहते हैं। पुनर्नवा का सूखा पौधा बारिश के मौसम में नया जीवन पाकर फूलने-फलने लगता है। पुनर्नवा पूरे भारत में खासकर गर्म प्रदेशों में बहुतायत से प्राप्त होता है। हर साल बारिश के मौसम में नए पौधे निकलना और गर्मी के मौसम में सूख जाना इसकी खासियत होती है। पुनर्नवा की 2 प्रकार की जातियां लाल और सफेद पाई जाती हैं। इनमें रक्त (खून) जाति वनस्पति का प्रयोग अधिकता से औषधि के रूप में किया जाता है। पुनर्नवा का कांड (तना), पत्ते, फूल सभी रक्त (खून या लाल) रंग के होते हैं। फलों के पक जाने पर वायवीय भाग सूख जाता है। परंतु भूमि में पड़ी रहती है, जो बारिश के मौसम में फिर से उग आती है।

स्वाद : सफेद पुनर्नवा का रस पीने में मधुर (मीठा), तीखा और कषैला होता है।


स्वरूप : पुनर्नवा एक लेटी हुई छत्ताकार जड़ होती है, यह बारिश के मौसम में पैदा होकर बढ़ती है और हेमन्त ऋतु के तुषार से सूख जाती है। श्वेत सांठ के पत्ते, डंठल सफेद तथा लाल होते हैं। रक्त (लाल) के लाल होते हैं। लाल पुनर्नवा के पत्ते श्वेत की अपेक्षा चक्राकार न होकर कुछ लंबे होते हैं पुनर्नवा गांवों में सब्जी के काम में लाई जाती है। पुनर्नवा का पौधा 3 से 6 फुट ऊंचा होता है, जिसका तना लाल रंग लिए कड़ा पतला और गोल होता हैं। इसके जड़ों पर तना कुछ मोटा होता है। पुनर्नवा की शाखाएं अनेक और पत्ते छोटे, बड़े 2 तरह के होते हैं। पुनर्नवा के पत्ते कोमल, मांसल, गोल या अंडाकार और निचला तला सफेद होता है। इसमें पुष्प (फूल) सफेद या गुलाबी छोटे-छोटे, छतरीनुमा लगते हैं। फल आधा इंच के छोटे, चिपचिपे बीजों से युक्त तथा पांच धारियों वाले होते हैं। पुनर्नवा के फूलों और फलों की बहार सर्दी के मौसम में आती है। इसकी जड़ 1 फुट लंबी, उंगली जितनी मोटी, गूदेदार, 2 से 3 शाखाओं से युक्त, तेजगंध वाली तथा स्वाद में तीखी होती है। इसे तोड़ने पर इसमें से दूध बहने लगता है। औषधि प्रयोग के लिए इसकी जड़ और पत्ते काम में आते हैं।

स्वभाव : पुनर्नवा खाने में ठंडी, सूखी और हल्की होती है।

गुण : श्वेत पुनर्नवा भारी, वातकारक और पाचनशक्तिवर्द्धक है। यह पीलिया, पेट के रोग, खून के विकार, सूजन, सूजाक (गिनोरिया), मूत्राल्पता (पेशाब का कम आना), बुखार तथा मोटापा आदि विकारों को नष्ट करती है। पुनर्नवा का प्रयोग जलोदर (पेट में पानी का भरना), मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में परेशानी या जलन), घाव की सूजन, श्वास (दमा), हृदय (दिल) रोग, बेरी-बेरी, यकृत (जिगर) रोग, खांसी, विष (जहर) के दुष्प्रभाव को दूर करता है। यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार पुनर्नवा दूसरे दर्जे की गर्म और रूक्ष होती है। यह गुर्दे के कार्यो में वृद्वि करके पेशाब की मात्रा बढ़ाती है, खून साफ करती है, सूजन दूर करती है, भूख को बढ़ाती है और हृदय के रोगों को दूर करती है। इसके साथ ही यह बलवर्द्धक, खून में वृद्धि करने वाला, पेट साफ करने वाला, खांसी और मोटापा को कम करने वाला होता है।

मात्रा : पुनर्नवा के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर, जड़ का चूर्ण 3 से 5 ग्राम, बीजों का चूर्ण 1 से 3 ग्राम, पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) चूर्ण 5 से 10 ग्राम।
स्रोत : http://naturethehealth.blogspot.in/2012/10/nyetaginacease-spereading-hogweed.html
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रांची के सड़कों के किनारे पनप रहा है पुनर्नवा का पौधा

किडनी के मरीजों में होता है इसका (पुनर्नवा) उपयोग
द्वारा : 
नितीश प्रियदर्शी














रांची के सड़कों के किनारे इस समय औषधीय पोधौं का राजा पुनर्नवा कुछ कुछ स्थानों पर पाया जा रहा है 1 अगर जानकारों की माने तो इस पौधे का इस्तेमाल उन मरीजों पर ज्यादा किया जाता है जो गुर्दे (किडनी ) की बीमारी से ग्रसित हैं1 रांची की मिट्टी, चट्टानें एवं जलवायु इस पौधे के लिये काफी उपयूक्त हैं 1 बहुत सारी निजी संस्थाएँ इन पौधों को औषधि के रूप में ऊँचे दामों पर बेचती हैं1 रांची में ये खासकर करमटोली , मोरहाबादी आदि स्थानों में लेखक को ये पौधा दिखा है1

पुनर्नवा पूरे भारत में खासकर गर्म प्रदेशों में बहुतायत से प्राप्त होता है। हर साल बारिश के मौसम में नए पौधे निकलना और गर्मी के मौसम में सूख जाना इसकी खासियत होती है।

पुनर्नवा एक आयुर्वेदिक औषधि है। इस विशेषणात्मक उक्ति की पृष्ठभूमि पूर्णतः वैज्ञानिक है । पुनर्नवा का पौधा जब सूख जाता है तो वर्षा ऋतु आने पर इन से शाखाएँ पुनः फूट पड़ती हैं और पौधा अपनी मृत जीर्ण-शीर्णावस्था से दुबारा नया जीवन प्राप्त कर लेता है । इस विलक्षणता के कारण ही इसे ऋषिगणों ने पुनर्नवा नाम दिया है । इसे शोथहीन व गदहपूरना भी कहते हैं । पुनर्नवा के नामों के संबंध में भारी मतभेद रहा है। भारत के भिन्न-भिन्न भागों में तीन अलग-अलग प्रकार के पौधे पुनर्नवा नाम से जाने जाते हैं । ये हैं-बोअरहेविया डिफ्यूजा, इरेक्टा तथा रीपेण्डा । आय.सी.एम.आर. के वैज्ञानिकों ने वानस्पतिकी के क्षेत्र में शोधकर 'मेडीसिनल प्लाण्ट्स ऑफ इण्डिया' नामक ग्रंथ में इस विषय पर लिखकर काफी कुछ भ्रम को मिटाया है । उनके अनुसार बोअरहेविया डिफ्यूजा जिसके पुष्प श्वेत होते हैं औषधीय पौधे की श्रेणी में आते हैं। पुनर्नवा खाने में ठंडी, सूखी और हल्की होती है।
रक्त पुनर्नवा एक सामान्य पायी जाने वाली घास है जो सर्वत्र सड़कों के किनारे उगी फैली हुई मिलती है । श्वेत पुनर्नवा रक्त वाली प्रजाति से बहुत कम सुलभ है इसलिए श्वेत औषधीय प्रजाति में रक्त पुनर्नवा की अक्सर मिलावट कर दी जाती है ।

इस औषधि का मुख्य औषधीय घटक एक प्रकार का एल्केलायड है, जिसे पुनर्नवा कहा गया है । इसकी मात्रा जड़ में लगभग 0.04 प्रतिशत होती है । अन्य एल्केलायड्स की मात्रा लगभग 6.5 प्रतिशत होती है । पुनर्नवा के जल में न घुल पाने वाले भाग में स्टेरॉन पाए गए हैं, जिनमें बीटा-साइटोस्टीराल और एल्फा-टू साईटोस्टीराल प्रमुख है । इसके निष्कर्ष में एक ओषजन युक्त पदार्थ ऐसेण्टाइन भी मिला है । इसके अतिरिक्त कुछ महत्त्वपूर्ण् कार्बनिक अम्ल तथा लवण भी पाए जाते हैं । अम्लों में स्टायरिक तथा पामिटिक अम्ल एवं लवणों में पोटेशियम नाइट्रेट, सोडियम सल्फेट एवं क्लोराइड प्रमुख हैं । इन्हीं के कारण सूक्ष्म स्तर पर कार्य करने की सामर्थ्य बढ़ती है ।

जानकारों के अनुसार, यह पीलिया, पेट के रोग, खून के विकार, सूजन, सूजाक (गिनोरिया), मूत्राल्पता (पेशाब का कम आना), बुखार तथा मोटापा आदि विकारों को नष्ट करती है। पुनर्नवा का प्रयोग जलोदर (पेट में पानी का भरना), मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में परेशानी या जलन), घाव की सूजन, श्वास (दमा), हृदय (दिल) रोग, बेरी-बेरी, यकृत (जिगर) रोग, खांसी, विष (जहर) के दुष्प्रभाव को दूर करता है।

आज भी बहुत कम लोग इस पौधे की चमत्कारी गुणों को जानते हैं. लेखक ने जब इस पौधे की तस्वीर उतरने की कोशिश की तो कई लोग कोतुहल वश इसकी जानकारी चाही. हो सकता है ये आपके घरों के आसपास ही हो और आपको इसकी जानकारी न हो 1 अगर आप इनको पहचान लेते हैं तो इसे बचाने की कोशिश करें ताकि अगले वर्ष बरसात में फिर से उग जाएँ 1 झारखण्ड में वैसे भी औषधीय पौधों का भंडार है जिनकी विस्तृत जानकारी और संगरक्षण जरुरी है.
स्रोत : http://nitishpriyadarshi.blogspot.in/2011/07/1.html
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Monday, June 8, 2015
पथरी का पौधा की सब्जी खाना प्रारम्भ कर दे तब पथरी गल कर बह जाती है |
गिरिजा शंकर शुक्ल : मित्रों यह पथरी है,इसे पहचान लें | पथरी नाम इस लिये नहीं है कि यह पथरी बनाता है वरन इस लिये है कि यह पथरी समाप्त करता है | आज इसके गुणों पर बात करते हैं | यह आजकल गर्मियों में बहुतायत पाया जाता है | वैसे इसे पथरी,पत्थरचूर,(यहां कुछ लोग इसे भी पत्थरट्टा ही कहते हैं) व गदपूरना भी कहते हैं |
१- यदि किसी भाई को पथरी हो जाय तब वह यदि इसकी सब्जी खाना प्रारम्भ कर दे तब उसकी पथरी गल कर बह जाती है |
२- यदि किसी के कोई फोड़ा या बालतोड़ हो जाय तब चिकित्सक के पास जाने पर वह सूमैग दवा की पट्टी बांधता है (पट्टी करने का व्यय लगभग दस रूपये मान लें ) जो कभी-कभी दो दिन में पकाती है | तब चीरा लगाता है व सुखाने की दवा बांधता है | यह तो लगभग प्रत्येक भाई-बहन अनुभव किये होंगे | अब यदि कभी फोड़ा फुंसी हो जाय तब यह प्रयोग कीजिये,विधि है- पथरी का पौधा लाकर धो लें व सूखी-सूखी चटनी की तरह पीस लें | फिर सोते समय उस फोड़े पर एक लेप की तरह चिपका दें | यदि अधिक जल्द असर चाहिये तब उस चटनी में थोड़ा नमक मिला लें व सेंक लें | फिर उस फोड़े पर लेप लगा दें | यह लेप तीन तरह से काम करता है ! 
  •  क) यदि वह फोड़ा दबने योग्य होगा तब उसे रात भर में दबाकर गायब कर देगा | 
  •  ख) यदि वह पकाने योग्य होगा तब रातभर में पकाकर बहा देगा | 
  • ग) यदि इस रात नहीं बहा तब,पुनः लगाने पर उसे पूर्णरूपेण पकाकर मुंह बनाकर पूरी तरह मवाद आदि को निकाल देगा | इस प्रकार आप डाक्टरों के चक्कर,व्यर्थ धन व्यय,चीरा,दर्द व शारीरिक कष्ट से बच जाते हैं |
३- इसमें पुनर्नवीन तत्व होता है जो पुनर्नवा की भांति गुणकारी बना देता है इस वनस्पति को | यह लिवर आदि को भी संभवतः मजबूत करता है |इसे लंगूर प्रिय मन से खाते हैं | विशेषतः इसकी सब्जी खाने से पतली दस्त होकर पेट साफ हो जाता है | अतः विशेष परिस्थितियों में ही खायें,परन्तु फोडये आदि के लिये स्वानुभूत रामबाण प्रयोग है |
संस्कृत पुनर्नवा? : यह पुनर्नवा का दूसरा रूप है,पुनर्नवीन इसमें भी होता है | इसमें व पुनरनवा में मुख्य अंतर यह है कि पुनर्नवा शुष्क रूखा व पथरी मांशल व लिसलिसा होता है | यह जमीन पर फैलता है व पुनर्नवा झाड़ियों पर भी चढ़ जाता है |
स्रोत : http://indiahonest.blogspot.in/2015/06/blog-post_14.html
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पुनर्नवा
पुनर्नवा एक ऐसी वनस्पति है, जो हर वर्ष नवीन हो जाती है, इसलिए इसे पुनर्नवा नाम दिया गया है।

सेवन करने वाले के शरीर को यह रसायन और नया कर देता है, इसलिए भी इसका नाम पुनर्नवा सार्थक सिद्ध होता है। 

विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- पुनर्नवा। हिन्दी- सफेद पुनर्नवा, विषखपरा, गदपूरना। मराठी- घेंटूली। गुजराती- साटोडी। बंगला-श्वेत पुनर्नवा, गदापुण्या। तेलुगू- गाल्जेरू। कन्नड़-मुच्चुकोनि। तमिल- मुकरत्तेकिरे, शरून्नै। फारसी- दब्ब अस्पत। इंग्लिश- स्प्रेडिंग हागवीड। लैटिन- ट्रायेंथिमा पोर्टयूलेकस्ट्रम।

गुण : श्वेत पुनर्नवा चरपरी, कसैली, अत्यन्त आग्निप्रदीपक और पाण्डु रोग, सूजन, वायु, विष, कफ और उदर रोग नाशक है।

रासायनिक संघटन : इसमें पुनर्नवीन नामक एक किंचित तिक्त क्षाराभ (0.04 प्रतिशत) और पोटेशियम नाइट्रेट (0.52 प्रतिशत) पाए जाते हैं। भस्म में सल्फेट, क्लोराइड, नाइट्रेट और क्लोरेट पाए जाते हैं।

परिचय : यह भारत के सभी भागों में पैदा होती है। इसकी जड़ और पंचांग का प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है। सफेद और लाल पुनर्नवा की पहचान यह है कि सफेद पुनर्नवा के पत्ते चिकने, दलदार और रस भरे हुए होते हैं और लाल पुनर्नवा के पत्ते सफेद पुनर्नवा के पत्तों से छोटे और पतले होते हैं। यह जड़ी-बूटियां बेचने वाली दुकान पर हमेशा उपलब्ध रहती है।

उपयोग : इस वनस्पति का उपयोग शोथ, पेशाब की रुकावट, त्रिदोष प्रकोप और नेत्र रोगों को दूर करने के लिए विशेष रूप से किया जाता है। आयुर्वेदिक योग पुनर्नवासव, पुनर्नवाष्टक, पुनर्नवा मण्डूर आदि में इसका उपयोग प्रमुख घटक द्रव्य के रूप में किया जाता है। 

* नेत्र रोग की यह उत्तम औषधि है। सफेद पुनर्नवा की जड़ को दूध में घिसकर, यह लेप आँखों में लगाएँ। आँख में फूला हो तो इसे घी के साथ घिसकर लगाएँ। तिमिर रोग के लिए तेल में और बार-बार जल्दी से जल्दी आँसू गिरते हो तो शहद में घिसकर आँखों में आँजना चाहिए। इसकी जड़ को गाय के गीले गोबर के रस में घिस कर आँखों में लगाने से मोतियाबिन्द ठीक होता है। 

* पुनर्नवा के साथ काली कुटकी, चिरायता और सोंठ समान मात्रा में लेकर जौकुट करके काढ़ा बनाकर 2-2 चम्मच सुबह-शाम पीने से सूजन, एनीमिया में बहुत लाभ होता है।
कामला : इसे पीलिया भी कहते हैं। इस रोग में पित्त को विरेचन द्वारा बाहर निकालने के लिए पुनर्नवा की जड़ का महीन पिसा-छना चूर्ण आधा-आधा चम्मच, ऊपर बताए गए 2-2 चम्मच काढ़े और आधा कप पानी के साथ पीने से 2-4 दिन में ही कामला रोग का शमन हो जाता है। इस रोग के लिए इस नुस्खे का प्रयोग निर्भय होकर निरापद रूप से किया जा सकता है।

श्वास (दमा) रोग : जब दमा रोग का दौरा पड़ता है, तब रोगी को पीड़ा और बेचैनी होती है। खासकर इस रोग का दौरा रात में पड़ता है और रोगी को रातभर बैठे रहना पड़ता है। इसके दौरे के वेग को शांत करने के लिए भी इस काढ़े के साथ पुनर्नवा की जड़ का चूर्ण उपरोक्त विधि से सेवन करने पर धीरे-धीरे रोगी को आराम मिल जाता है।

पथरी : गुर्दों में पथरी हो जाए तो संगेयहूद भस्म 2-2 रत्ती और आधा-आधा चम्मच पुनर्नवा की जड़ का चूर्ण, शहद में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से पथरी निकल जाती है।

मासिक धर्म : स्त्रियों के गर्भाशय में शोथ होने पर मासिक ऋतु स्राव में अनियमितता, कमी और अवरोध की स्थिति पैदा हो जाती है, ऋतु स्राव कष्ट के साथ होता है। इस स्थिति में पुनर्नवा और कपास की जड़ का काढ़ा 2-2 चम्मच सुबह-शाम आधा कप पानी में डालकर पीने से लाभ होता है।

पुनर्नवा के आयुर्वेदिक योग

पुनर्नवाष्टक क्वाथ : पनुर्नवा की जड़, नीम की अंतरछाल, पटोलपत्र, सोंठ, कुटकी, गिलोय, दारुहल्दी और हरड़ ये आठों द्रव्य समान मात्रा में लेकर मोटा-मोटा कूट लें। 2 चम्मच चूर्ण लेकर 2 कप पानी में डालें और काढ़ा करें। जब पानी आधा कप बचे तब उतारकर छान लें व ठंडा करके पी लें। इसी प्रकार शाम को भी काढ़ा बनाकर पिएं। यह योग उत्तम मूत्रल और शोथनाशक औषधि है। इसके सेवन से सर्वांग शोथ, उदर विकार और श्वास-कास में भी लाभ होता है तथा दस्त साफ होता है।

पुनर्नवासव : पुनर्नवा, सोंठ, पीपल, काली मिर्च, हरड़, बहेड़ा, आँवला, दारुहल्दी, गोखरू, छोटी कटेली, बड़ी कटेली, अडूसे के पत्ते, एरण्ड की जड़, कुटकी, गजपीपल, नीम की अंतरछाल, गिलोय, सूखी मूली, धमासा, पटोलपत्र ये 20 द्रव्य 10-10 ग्राम, धाय के फूल 150 ग्राम, मुनक्का 200 ग्राम, मिश्री एक किलो और शहद आधा किलो लें। सब द्रव्यों को कूट-पीसकर शहद सहित 5 लीटर पानी में डालकर काँच के बर्तन में भरकर एक मास तक रखा रहने दें। एक मास बाद मोटे कपड़े से छानकर बोतलों में भर लें। यह पुनर्नवासव है। इसे 2-2 बड़े चम्मच, आधा कप पानी में डालकर सुबह-शाम दोनों वक्त भोजन के बाद पीना चाहिए।

यह योग शोथ, उदर रोग, प्लीहा वृद्धि, यकृत (लीवर) वृद्धि, अम्ल पित्त, गुल्म, ज्वर आदि जैसे कष्टसाध्य रोगों को ठीक करता है। यह उत्तम मूत्रल (पेशाब लाने वाला) और हृदय के लिए हितकारी है। शरीर में किसी भी कारण से आए शोथ को यह योग दूर कर देता है। यदि शोथ बहुत तीव्र हो तो इसके साथ ही सारिवासव 2-2 चम्मच मिलाकर लेना चाहिए।

पुनर्नवा अर्क : पुनर्नवा पंचांग को चौगुने जल में डालकर, अर्क निकालने की विधि से इसका अर्क निकाल लें। इसे दिन में 2-3 बार 2-2 छोटे चम्मच, आधा कप पानी में डालकर पीने से सब प्रकार के शोथ मिट जाते हैं, पेशाब की रुकावट दूर होती है और खुलकर पेशाब होता है। 2-2 बूँद आँखों में डालने से आँखों की शोथ (सूजन), जलन व पीड़ा दूर होती है।
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पुनर्नवा – लाजवाब औषधि

आयुर्वेद में पुनर्नवा का अभिप्राय इस प्रकार बताया है कि ऐसा रसायन जो मानव शरीर को फिर से नया बना दे। पुनर्नवा (English name: Horse Purslane, वानस्पतिक नाम: Boerhaavia diffusa) एक प्रकार का खरपतवार (Weed) है जो बरसात से लेकर हेमंतऋतु तक भारत में लगभग हर जगह सुलभ है.

पुनर्नवा का सूखा पौधा बारिश के मौसम में नया जीवन पाकर फूलने-फलने लगता है। पुनर्नवा पूरे भारत में विशेषत: गर्म प्रदेशों में बहुतायत से प्राप्त होता है। हर वर्ष बरसात के मौसम में नए पौधे निकलना और गर्मी के मौसम में सूख जाना इसकी विशेषता है। पुनर्नवा की 2 प्रकार की जातियां लाल और सफेद पाई जाती हैं। इनमें रक्त जाति वनस्पति का प्रयोग अधिकता से औषधि के रूप में किया जाता है।

पत्तों को छोड़, पुनर्नवा का कांड (तना), फूल सभी लालिमा लिये होते हैं। पत्ते भी पृष्ठ भाग में लालिमा लिये होते हैं. पक जाने पर बाहरी भाग सूख जाता है। परंतु जड़ें भूमि में पड़ी रहती है, जो बरसात के मौसम में फिर से उग आती है।

पहचान

पुनर्नवा लेटी हुई छत्ताकार बेलनुमा होती है; यह बरसात के मौसम में पैदा होकर बढ़ती है और हेमन्त ऋतु में सूख जाती है। इसके दो प्रकार हैं श्वेत व लाल। श्वेत के पत्ते तथा डंठल सफेदी लिये लाल होते हैं। रक्त (लाल) के हल्के लाल होते हैं। लाल पुनर्नवा के पत्ते श्वेत की अपेक्षा चक्राकार न होकर कुछ लंबे होते हैं। इसके पत्ते कोमल, मांसल, गोल या अंडाकार और निचला तला सफेद होता है। इसमें पुष्प (फूल) सफेद या गुलाबी छोटे-छोटे, छतरीनुमा लगते हैं। फल आधा इंच के छोटे, चिपचिपे बीजों से युक्त तथा पांच धारियों वाले होते हैं। इसकी जड़ 1 फुट तक लंबी, उंगली जितनी मोटी, गूदेदार, 2 से 3 शाखाओं से युक्त, तेजगंध वाली तथा स्वाद में तीखी होती है। औषधि प्रयोग के लिए इसकी जड़ और पत्ते काम में आते हैं।
पुनर्नवा के अन्य नाम

रक्त पुनर्नवा, रक्तपुष्पा, शिलाटीका, शोथघ्नी, क्षुद्रवर्षाभू, वर्षकेतू, कठिल्ल्क, विशखपरा, विषकपरा, शरुन्ने, साबुनी, वसु इत्यादि नाम आयुर्वेद भावप्रकाश ग्रन्थ में वर्णित हैं.
पुनर्नवा के औषधीय गुण

पुनर्नवा गांवों में शाक सब्जी के काम में भी लाई जाती है। पुनर्नवा खाने में ठंडी, सूखी और हल्की होती है। पुनर्नवा उष्णवीर्य, तिक्त, रूखी और कफ नाशक होती है। जोड़ों पेट इत्यादि की सूजन (Inflamation), पांडुरोग (Anemia), ह्रदयरोग, लिवर,पथरी (Kidney, urinary stone), खांसी, डायबिटीज, उर:क्षत(सीने, फेफड़ों के घाव) आर्थराइटिस और पीड़ा (Pain) के लिये पुनर्नवा संजीवनी मानी जाती है। कुछ शोध पुनर्नवा को कैंसर, पेट के रोगों जैसे amoebiasis में लाभकारी व रोग प्रतिरोधक भी मानते हैं.

पुनर्नवा का मुख्य औषधीय घटक एक एल्केलायड है, जिसे पुनर्नवाइन (Punarnavine) कहा जाता है। इसकी मात्रा जड़ में लगभग 0.04 प्रतिशत होती है। अन्य एल्केलायड्स की मात्रा लगभग 6.5 प्रतिशत होती है। पुनर्नवा के जल में न घुल पाने वाले भाग में स्टेरॉन पाए गए हैं, जिनमें बीटा-साइटोस्टीराल (Beta-cytosterol) और एल्फा-टू (Alfa-2) स्टीराल प्रमुख है।

पुनर्नवा में एक ओषजन युक्त पदार्थ ऐसेण्टाइन भी मिला है। इसके अतिरिक्त कुछ महत्त्वपूर्ण् कार्बनिक अम्ल तथा लवण भी पाए जाते हैं। अम्लों में स्टायरिक तथा पामिटिक अम्ल एवं लवणों में पोटेशियम नाइट्रेट, सोडियम सल्फेट एवं क्लोराइड प्रमुख हैं। इन्हीं के कारण पुनर्नवा सूक्ष्म स्तर पर कार्य करने की सामर्थ्य रखती है।

पुनर्नवा विशेष

पुनर्नवा एक बेहतरीन मूत्रल (Diuretic) औषधि है जिस कारण इसे किडनी व मूत्राशय की पथरी को हरने वाली औषधि माना जाता है. मूत्रल होने के कारण ही इसेउच्च रक्तचाप ( High Blood Pressure) में भी लाभकारी जाना गया है. पुनर्नवा फेफड़ों में कफ़ का निस्सारण करने में भी अत्यंत लाभकारी पायी गयी है. इसके उपयोग से छाती की जकड़न (lungs congestion) में अदभुत लाभ होता है.

पुनर्नवा के एंटीएजिंग (Anti-aging), व शरीर के दर्द निवारक गुणों के कारण बहुत से लोग इसके supplements भी लेते हैं जो amazon जैसे ऑनलाइन स्टोर्स से घर बैठे मंगाए जा सकते हैं. नीचे के लिंक पर पुनर्नवा के प्रोडक्ट्स देखे व खरीदे जा सकते हैं.

कैसे करें उपयोग

पुनर्नवा का साग बना कर खाईये या काढ़ा बना कर सेवन कीजिये. दोनों ही उपयोगी हैं. बस इसमें थोडा सा स्वादानुसार अदरक या अजवायन या दालचीनी; व काली मिर्च अवश्य मिलाएं जिससे इसका वायवीय प्रभाव कम हो जाए व औषधीय उपयोगिता बढ़ जाए।
आयुर्वेद में पुनर्नवा की मात्रा

पुनर्नवा के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर, जड़ का चूर्ण 3 से 5 ग्राम, बीजों का चूर्ण 1 से 3 ग्राम, पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) चूर्ण 5 से 10 ग्राम।
सारशब्द

पुनर्नवा एक मुफ्त में पायी जाने वाली उत्तम औषधि है जिसका उपयोग कर हम फेफड़ों, लिवर, पेट के रोगों व उच्च रक्तचाप, पथरी, त्वचा विकार जैसी विसंगतियों से बचे रह सकते हैं।
स्रोत : http://ayurvedcentral.com/2016/08/19/%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%BE-%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AC-%E0%A4%94%E0%A4%B7%E0%A4%A7%E0%A4%BF/
सरफोंकानाम - सं - शरपुंखा , हि- सरफोंका,बं- वनलील ,म-उन्हाली,अं- परपलटेफ्राझिया |

विवरण - सरफोंके का क्षुप होता है , पत्ते नील के समान होते हैं | पत्ता तोडने पर उसका एक हिस्सा अन्नीदार बाण की पोंछ की तरह ऐसा हो जाता है और दूसरा हिस्सा 7 ऐसा हो जाता है | फूल लाल और बारीक होते हैं | फल्लियों पर रूँआसे होते हैं | दूसरे प्रकार की कलियों पर रूआँसे नहीं होते हैं | सफेद सरफोंके का क्षुप पृथ्वी में फैला होता है | पत्ते लाल सरफोंके से कुछ छोटे होते हैं | फूल सफेद होता है |

सरफों के जड का धूँआ पीने से श्वास - कास नष्ट होता है | सरफोंके की मात्रा 4 माशा और कण्ठपुंखे की मात्रा 4 माशे है | यह पटियाला में बहुत होता है | गुण - सरफोंका चरपरा , गरम , कडुवा , कसैला और हलका है | इसी से यकृत,प्लीहा,गुल्म,व्रण , विषविकार ,रूधिरविकार ,कास ,श्वास ,ज्वर,कृमि और वात रोग नष्ट होते हैं | तथा यह कफोदर ,हृदय रोग, गलगण्ड ,और कुष्ट रोग को नष्ट करता है | सफेद सरफोंका अधिक गुण वाला है | इसका एक भेद कण्ठपुंखा है -कण्ठपुंखा- चरपरा ,गरम ,तथा कृमि एवं शूल विनाशक है | प्रदर में सरफोंका जड पीस कर पानी के साथ पीना चाहिये | खून की खराबी में सरफोंका की पत्ते का रस पीना चाहिये




सेमल (वैज्ञानिक नाम:बॉम्बैक्स सेइबा), इस जीनस के अन्य पादपों की तरह सामान्यतया ‘कॉटन ट्री’ कहा जाता है। इस उष्णकटिबंधीय वृक्ष का सीधा उर्ध्वाधर तना होता है। इसकी पत्तियां डेशिडुअस होतीं हैं। इसके लाल पुष्प की पाँच पंखुड़ियाँ होतीं हैं। ये वसंत ऋतु के पहले ही आ जातीं हैं।

इसका फल एक कैपसूल जैसा होता है। ये फल पकने पर श्वेत रंग के रेशे, कुछ कुछ कपास की तरह के निकालते हैं। इसके तने पर एक इंच तक के मजबूत कांटे भरे होते हैं। इसकी लकड़ी इमारती काम के उपयुक्त नहीं होती है।
रोजगार का साधन

फल के पकने पर जो बीज निकलते हैं, उन बीजों से रूई निकलती है, जो मुलायम व सफ़ेद होती है। इस रूई का प्रयोग कई कामों में किया जाता है। दिलचस्प तथ्य यह है कि सेमल का उपयोग लोग पहले तो करते थे, लेकिन उस समय इसे व्यावसायिक रूप में प्रयोग नहीं किया जाता था। सेमल से कुछ समय के लिए लोगों को रोजगार भी मिल जाता है। इसके फूल बाज़ार में 15 से 20 रुपये कि.ग्रा. तक बिकते हैं। इसके अतिरिक्त फल भी 10 से 15 रुपये और बीज तो 50 से 70 रुपये कि.ग्रा. तक आसानी से बेचे जा सकते हैं। सेमल वृक्ष से व्यवसाय करने वाले लोग एक सीजन में तीस से चालीस हज़ार रुपया तक कमा लेते हैं। सेमल केवल सब्जी तक सीमित नहीं है, उसका औषधीय उपयोग भी है, जिस कारण इसकी बड़े बाज़ारों में भारी माँग है।[2]

सेमल के डोड या फलों की निस्सारता भारतीय कविपरंपरा में बहुत काल से प्रसिद्ध है और यह अनेक अन्योक्तियों का विषय रहा है । ‘सेमर सेइ सुवा पछ्ताने’ यह एक कहावत सी हो गई है । सेमल की रूई रेशम सी मुलायम और चमकीली होती है और गद्दों तथा तकियों में भरने के काम में आती है, क्योंकि काती नहीं जा सकती । इसकी लकड़ी पानी में खूब ठहरती है और नाव बनाने के काम में आती है । आयुर्वेद में सेमल बहुत उपकारी ओषधि मानी गई है । यह मधुर, कसैला, शीतल, हलका, स्निग्ध, पिच्छिल तथा शुक्र और कफ को बढ़ानेवाला कहा गया है । सेमल की छाल कसैली और कफनाशक; फूल शीतल, कड़वा, भारी, कसैला, वातकारक, मलरोधक, रूखा तथा कफ, पित्त और रक्तविकार को शांत करनेवाला कहा गया है । फल के गुण फूल ही के समान हैं ।

सेमल के नए पौधे की जड़ को सेमल का मूसला कहते हैं, जो बहुत पुष्टिकारक, कामोद्दीपक और नपुंसकता को दूर करनेवाला माना जाता है । सेमल का गोंद मोचरस कहलाता है । यह अतिसार को दूर करनेवाला और बलकारक कहा गया है । इसके बीज स्निग्धताकारक और मदकारी होते है; और काँटों में फोड़े, फुंसी, घाव, छीप आदि दूर करने का गुण होता है ।

वन विभाग ने विभिन्न नर्सरियों में सेमल के एक हजार से अधिक पौधे तैयार किए हैं। विशालकाय होने से जहां यह गर्मियों में छाया की सुखद अनुभूति देते हैं। वहीं इन पर लगने वाले लाल व सफेद फूल भी आकर्षित बनाते हैं। इनकी छाल, पत्ते,फूल व बीज का उपयोग किडनी गनोरिया सहित कई रोगों के निदान के लिए किया जाता है। मान्यता है कि इन्हें आंगन में लगाने पर सांप आदि विषैले जीव जंतु घर में नहीं आते।
विभिन्न रोगों में सहायक

सेमल वृक्ष के फल, फूल, पत्तियाँ और छाल आदि का विभिन्न प्रकार के रोगों का निदान करने में प्रयोग किया जाता है। जैसे-
प्रदर रोग – सेमल के फलों को घी और सेंधा नमक के साथ साग के रूप में बनाकर खाने से स्त्रियों का प्रदर रोग ठीक हो जाता है।
जख्म – इस वृक्ष की छाल को पीस कर लेप करने से जख्म जल्दी भर जाता है।
रक्तपित्त – सेमल के एक से दो ग्राम फूलों का चूर्ण शहद के साथ दिन में दो बार रोगी को देने से रक्तपित्त का रोग ठीक हो जाता है।
अतिसार – सेमल वृक्ष के पत्तों के डंठल का ठंडा काढ़ा दिन में तीन बार 50 से 100 मिलीलीटर की मात्रा में रोगी को देने से अतिसार (दस्त) बंद हो जाते हैं।
आग से जलने पर – इस वृक्ष की रूई को जला कर उसकी राख को शरीर के जले हुए भाग पर लगाने से आराम मिलता है।
नपुंसकता – दस ग्राम सेमल के फल का चूर्ण, दस ग्राम चीनी और 100 मिलीलीटर पानी के साथ घोट कर सुबह-शाम लेने से बाजीकरण होता है और नपुंसकता भी दूर हो जाती है।
पेचिश – यदि पेचिश आदि की शिकायत हो तो सेमल के फूल का ऊपरी बक्कल रात में पानी में भिगों दें। सुबह उस पानी में मिश्री मिलाकर पीने से पेचिश का रोग दूर हो जाता है।
प्रदर रोग – सेमल के फूलों की सब्जी देशी घी में भूनकर सेवन करने से प्रदर रोग में लाभ मिलता है।
गिल्टी या ट्यूमर – सेमल के पत्तों को पीसकर लगाने या बाँधने से गाँठों की सूजन कम हो जाती है।
रक्तप्रदर – इस वृक्ष की गोंद एक से तीन ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से रक्तप्रदर में बहुत अधिक लाभ मिलता है।
नपुंसकता – सेमल वृक्ष की छाल के 20 मिलीलीटर रस में मिश्री मिलाकर पीने से शरीर में वीर्य बढ़ता है और मैथुन शक्ति बढ़ती है।

Source : https://sambodhihealingcenter.wordpress.com/2013/12/06/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9B%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%AB%E0%A5%82%E0%A4%B2-%E0%A4%B5-%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%9C/
आसान डिलेवरी—इजी डिलेवरी—सैफ डिलेवरी
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एक अध्ययन में सामने आये तथ्यों के अनुसार वर्तमान में एक—चौथाई गर्भवती महिलाओं के प्रसव सिजेरियन/आॅपरेशन के जरिये हो रहे हैं। जिसके कारण—



1. प्रसूता को असहनीय पीड़ा सहनी पड़ती है।
2. अधिकतर स्त्रियों का दूसरा प्रसव भी सिजेरियन/आॅपरेशन के जरिये ही होता है।
3. प्रसूता का शारीरिक सौन्दर्य नष्ट हो जाता है।
4. प्रसूता अनेक प्रकार के घरेलु शारीरिक कार्य करने में अक्षम हो जाती हैं।
5. प्रसव सिजेरियन/आॅपरेशन के जरिये कराने पर प्रसूता के परिवार को गैर—जरूरी खर्चा वहन करना पड़ता है।
6. सिजेरियन/आॅपरेशन के जरिये प्रसव कराने पर अनेक प्रकार की मानसिक तकलीफें होने के मामले भी सामने आये हैं।
7. सिजेरियन/आॅपरेशन के जरिये जितने प्रसव होते हैं, उनमें से करीब एक—तिहाई गैर—जरूरी होते हैं।



इन हालातों में गर्भवती स्त्रियों को उक्त तकलीफों से बचाने में होम्योपैथी—सुरक्षा चक्र—का काम करती है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि गर्भवती स्त्रियों द्वारा तीसरे महिने के बाद से होम्योपैथिक दवाईयों का नियमित सेवन करने से अकल्पनीय और अद्भुत परिणाम सामने आते हैं। 90 फीसदी से अधिक मामलों में गर्भवती स्त्रियों को निम्न फायदे होते हैं:—



1. निर्धारित समय पर प्रसव। न समय पूर्व और लेट।
2. गर्भस्त्राव या गर्भपात का खतरा नहीं के बराबर।
3. प्रसव पूर्व होने वाले झूठे दर्द नहीं और प्रसव से कुछ घण्टे पूर्व ही प्रसव पीड़ा।
4. प्रसव पीड़ा में 40 फीसदी तक कमी।
5. पांचवे माह से ही गर्भस्थ शिशु का उपचार।
6. बिना सिजेरियन/आॅपरेशन सामान्य और सुरक्षित प्रसव।
7. प्रसव के बाद स्त्री जननांगों में ढीलापन नहीं।
नोट : किसी भी प्रकार की अधिक जानकारी के लिये तुरंत सम्पर्क करें।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
मो./वाट्स एप नं. : 09875066111
कमाल के गुण होते हैं केले के छिलके में भी, फेंकिए मत
Last Updated: Friday, October 10, 2014 - 17:07

ज़ी मीडिया ब्यूरो

नई दिल्ली : इस खबर को पढ़ने के साथ ही केले खाकर इसके छिलके को इधर-उधर फेंकने की अपनी आदत बदल डालिए। क्योंकि इसके छिलकों में सेहत के मद्देनजर कमाल के गुण हैं।

चीन में हुए शोध के मुताबिक केले के छिलके में सेरोटोनिन हार्मोन को सामान्य बनाए रखने के गुण मौजूद होते हैं। कहते हैं कि यह हार्मोन खुश रहने के लिए जरूरी होता है। केले के छिलकों में भरपूर मात्रा में पोषक तत्व और कार्बोहाइड्रेट होते हैं। इसमें विटामिन बी-6, बी-12, मैगनीशियम, कार्बोहाइड्रेट, एंटीऑक्सीडेंट, पोटेशियम, मैगनीशियम और मैंगनीज जैसे पोषक तत्व होते हैं जो मेटाबॉलिज्म के लिए बेहद उपयोगी होते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार केले के छिलके को पीसकर उसका पेस्ट दर्द के स्थान पर 15 मिनट तक लगाए रखने से सिरदर्द दूर होता है। सिर का दर्द खून की धमनियों में पैदा होने वाले तनाव के कारण होता है और केले के छिलके में मौजूद मैग्नीशियम धमनियों में जाकर सिर के दर्द को रोकने में सहायक सिद्ध होता है।
केले के छिलके को रोजाना दांतों पर रगड़ने से उनमें चमक आती है क्योंकि इसमें उपस्थित पोटेशियम, मैग्नीशियम और मैंगनीज दांतों पर जमे पीलेपन को हटाने में मदद करता है। नियमित रूप से ऐसा करने से कुछ दिनों में दांतों में कुदरती चमक आ जाती है। दिन में दो बार केले के छिलके दांतों पर रगड़ने से लाभ होता है।

पैरों या हाथों में निकले मस्सों पर केले के छिलके को रगड़ने और रातभर ऐसे ही छोड़ देने से दोबारा उस जगह पर मस्से नहीं निकलते हैं। मुंहासों पर छिलके को मसलकर पांच मिनट तक लगाने से फायदा होता है। इसके अलावा केले के छिलके त्वचा में पानी की कमी को भी पूरा करते हैं। अंडे की जर्दी में केले के छिलके (पीसकर) को मिलाकर चेहरे पर लगाने से झुर्रियां दूर होती हैं।
Source : http://zeenews.india.com/hindi/news/health/benefits-of-banana-peel/235255
Posted in Daily Healthy Tips, Education By Dr. D K Goyal On May 25, 2016

हरसिंगार/ Nyctanthes arbor-tristis

हरसिंगार यानी हरि का श्रृंगार! इसके और भी कई नाम हैं ; शेफालिका , पारिजात , शिवली , मल्लिका , स्वर्णमल्लिका और अंग्रेजी में इसे night jasmine कहते हैं . इसके पुष्प रात को खिलते हैं. पूरी रात सुगंधी बिखेरता हुआ यह वृक्ष भोर होते ही अपने सभी फूल पृथ्वी पर बिखेर देता है . अलौकिक सुगंध में सराबोर इसके पुष्प केवल मन को ही प्रसन्न नहीं करते ; तन को भी शक्ति देते हैं . हरसिंगार जिसे नाइट जैस्मिन भी कहते हैं, एक सुन्दर झाड़ीनुमा छोटा पेड़ है, जिस पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं। हरसिंगार उन प्रमुख पेड़ों में से एक है, जिसके फूल ईश्वर की आराधना में महत्वपूर्ण स्थान रखते है। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। यह लगभग पूरे भारत में पाया जाता है। इसके पत्तों में टेनिक एसिड, मैथिल सिलसिलेट और ग्लूकोसाइड होता है ये द्रव्य औषधीय गुणों से भरपूर हैं। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग सायटिका रोग को दूर करने में किया जाता है।
इस वृक्ष के फूल सर्वथा भगवान के श्रृंगार के लिए उपयुक्त हैं

हरसिंगार के लाभ / गुण / फायदे 

शारीरिक विकास में हरसिंगार का प्रयोग :- इसके फूलों को छाया में सुखाकर पावडर कर लीजिये और फिर मिश्री मिलाकर खाली पेट लीजिए शारीरिक शक्ति का विकास होगा .
जोड़ों के दर्द में हरसिंगार के प्रयोग :- जोड़ों का दर्द होने पर इसके पंचांग का काढ़ा पीजिए . 5 gram पंचांग +400 ग्राम पानी लेकर धीमी आंच पर पकाएं . जब एक तिहाई रह जाए तो खाली पेट पीयें .

खांसी में हरसिंगार के प्रयोग :- इसकी दो पत्तियां +एक फूल +तुलसी के पत्ते ! ये सब लेकर इसको एक गिलास पानी में उबालें और चाय की तरह पी लें . इससे पेट का जमा हुआ मल भी निकल जाएगा .

पेट में कीड़े में हरसिंगार के प्रयोग :- पत्तों का रस लें .छोटा बच्चा है तो एक चम्मच और बड़ा व्यक्ति है तो दो चम्मच . सुबह खाली पेट थोडा पानी और चीनी मिलाकर लें . साल में कभी-कभी यह रस ले लें तो पेट में कीड़े होंगे ही नहीं .

पुराने बुखार में हरसिंगार के प्रयोग :- पुराना बुखार हो या शरीर की टूटन हो तो , इसकी तीन ग्राम छाल +दो पत्तियां +3-4 तुलसी की पत्तियां पानी में उबालकर सुबह शाम लें .

Sciatica की बीमारी में हरसिंगार के प्रयोग :- Sciatica का तो इलाज ही यह पेड़ है . इसके दो तीन बड़े पत्तों का काढ़ा सवेरे शाम खाली पेट पीयें .

बवासीर में हरसिंगार के प्रयोग :- बवासीर के लिए इसके बीज रामबाण औषधि की तरह काम करते हैं। इसके एक बीज का सेवन प्रतिदिन करने से बवासीर ठीक हो जाता है। या हारसिंगार के बीज 10 ग्राम तथा कालीमिर्च 3 ग्राम को मिलाकर पीस लें और चने के बराबर आकार की गोलियां बनाकर खायें। रोजाना 1-1 गोली गुनगुने जल के साथ सुबह-शाम खाने से बवासीर ठीक होती है। यदि गुदाद्वार में सूजन या मस्से की समस्‍या है तो हरसिंगार के बीजों का लेप बनाकर गुदे पर लगाने से लाभ मिलता है।

सूजन में में में हरसिंगार के प्रयोग :- शरीर के किसी भी हिस्से में सूजन है तो इसकी पत्तियाँ पानी में उबालकर उससे झराई करें . सूजन पर इसके पत्तों को बांधें .
चीन और ताईवान जैसे देशों में तो इसके फूल पत्तों की हर्बल चाय पीते हैं . इसके दो पत्ते और चार फूल लेकर पांच कप चाय बना सकते हैं . बिना दूध की यह चाय स्फूर्तिदायक होती है .
विशेष :- यह वृक्ष आसपास लगा हो खुशबू तो प्रदान करता ही है ; साथ ही नकारात्मक उर्जा को भी भगाता है . इस उपयोगी वृक्ष को अवश्य ही घर के आसपास लगाना चाहिए .
Source : http://dkgoyal.com/%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B0-nyctanthes-arbor-tristis/
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Benefits Of Night Jasmine ( जघन्य रोगों को ठीक करने कि रामबाण औषधी:हरसिंगार )

हारसिंगार जिसे पारिजात भी कहते हैं, एक सुन्दर वृक्ष होता है, जिस पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। यह सारे भारत में पैदा होता है।
पारिजात या 'हरसिंगार' उन प्रमुख वृक्षों में से एक है, जिसके फूल ईश्वर की आराधना में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इसे प्राजक्ता, परिजात, हरसिंगार, शेफालिका, शेफाली, शिउली भी कहा जाता है। उर्दू में इसे गुलज़ाफ़री कहा जाता है। हिन्दू धर्म में इस वृक्ष को बहुत ही ख़ास स्थान प्राप्त है। पारिजात का वृक्ष बड़ा ही सुन्दर होता है, जिस पर आकर्षक व सुगन्धित फूल लगते हैं। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग विविध प्रकार की औषधि आदि के रूप में भी किया जाता है। यह सारे भारत में पैदा होता है। यह माना जाता है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है।

परिचय :
हारसिंगार के पेड़ बहुत बड़े नहीं होते हैं। इसमें गोल बीज आते हैं। इसके फूल अत्यन्त सुकुमार और बड़े ही सुगन्धित होते हैं। पेड़ को हिलाने से वे नीचे गिर पड़ते हैं। वायु के साथ जब दूर से इन फूलों की सुगन्ध आती है,तब मन बहुत ही प्रसन्न और आनन्दित होता है। इसके फूलों की डण्डियों को सुखाकर पानी में डालने से बढ़िया पीला रंग तैयार हो जाता है। किसी औषधि भस्म को पीले रंग में करने के लिए इन डण्डियों के रंग का उपयोग किया जाता है। हारसिंगार के पत्तों को चबाकर खाने से जीभ पीली हो जाती है।


रंग : हारसिंगार के पत्ते हरे, फूल का ऊपरी भाग सफेद तथा इसकी डण्डी पीली होती है।



स्वाद : इसका स्वाद फीका होता है।

स्वरूप : हारसिंगार के पेड़ जंगलों तथा बाग-बगीचों में अधिक पाये जाते हैं। इसके फूल सुन्दर व मनमोहक होते हैं तथा उनकी डण्डी केसरिया होती हैं। हारसिंगार की डण्डियों को पीसकर कपड़ों को रंगा जाता है। इसके फल छोटे व चपटे होते है। पत्ते अड़हुल के समान खरखरे होते हैं।

स्वभाव : हारसिंहार ठण्डा और रूखा होता है। मगर कोई-कोई गरम होता है।
हानिकारक : हारसिंहार खांसी में नुकसानदायक है।
दोषों को दूर करने के लिए : हारसिंगार के दोषों को दूर करने के लिए कुटकी का उपयोग किया जाता है।
मात्रा : 3 ग्राम।

गुण : हारसिंगार बुखार को खत्म करता है। यह कडुवा होता है। शरीर में वीर्य की मात्रा को बढ़ाता है। इसकी छाल को अगर पान के साथ खाये तो खांसी दूर हो जाती है। इसके पत्ते दाद, झांई और छीप को खत्म करते हैं। इसके फूल ठण्डे दिमाग वालों को शक्ति देता है और गर्मी को कम करता है। हारसिंगार की जड़ व गोंद भी वीर्य को बढ़ाती है।

विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- पारिजात, शेफालिका। हिन्दी- हरसिंगार, परजा, पारिजात। मराठी- पारिजातक। गुजराती- हरशणगार। बंगाली- शेफालिका, शिउली। तेलुगू- पारिजातमु, पगडमल्लै। तमिल- पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम - पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़- पारिजात। उर्दू- गुलजाफरी। इंग्लिश- नाइट जेस्मिन। लैटिन- निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस।
उपयोग : इस वृक्ष के पत्ते और छाल विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है।

विभिन्न रोगों में उपयोग :

v पालतू जानवरों को कोदो का विष चढ़ने पर: हारसिंगार के पत्तों का रस निकालकर जानवरों को पिला देना चाहिए।


v खुजली: हारसिंगार के पत्ते और नाचकी का आटा मिलाकर पीसकर लगाने या दही में सोनागेरू घिसकर पिलाने या हरसिंगार के पत्ते दूध में पीसकर लेप करने से लाभ मिलता है।

v गलगण्ड:(Thyroid) हारसिंगार के पत्ते, बांस के पत्ते और फल्गुन के पत्ते इकट्ठे पीसकर सात दिन तक लेप करें।


v श्वास या दमा का रोग:



Ø हारसिंगार की छाल का चूर्ण 1 से 2 रत्ती पान में रखकर प्रतिदिन 3-4 बार खाने से कफ का चिपचिपापन कम होकर श्वास रोग (दमा) में लाभकारी होता है।


Ø हारसिंगार के पौधे की छाल का 2 चुटकी चूर्ण पान में रखकर सेवन करना चाहिए।

v मलेरिया का बुखार: हारसिंगार के 7-8 पत्तों का रस, अदरक का रस और शहद को मिलाकर सुबह और शाम सेवन करने से पुराने से पुराना मलेरिया बुखार समाप्त हो जाता है।


v खांसी: खांसी में 12-24 मिलीग्राम हारसिंगार की छाल का चूर्ण लेकर पान में रखकर दिन में 3-4 बार खाने से बलगम का चिपचिपापन दूर हो जाता है और खांसी में बहुत लाभ मिलता है।


v बालों का झड़ना (गंजेपन का रोग): हारसिंगार के बीज को पानी के साथ पीसकर सिर के गंजेपन की जगह लगाने से सिर में नये बाल आना शुरू हो जाते हैं।
v बवासीर (अर्श):
Ø हारसिंगार का (बिना छिलके का) बीज 10 ग्राम तथा कालीमिर्च 3 ग्राम को मिलाकर पीस लें और चने के बराबर आकार की गोलियां बनाकर खायें। रोजाना 1-1 गोली गुनगुने जल के साथ सुबह-शाम खाने से बवासीर ठीक होती है। 
Ø हारसिगांर के 2 ग्राम फूलों को 30 मिलीलीटर पानी में रात को भिगोकर रखें। सुबह फूलों को पानी में मसलकर छान लें और 1 चम्मच चीनी मिलाकर खाली पेट खायें। इसे नियमित 1 सप्ताह तक खाने से बवासीर मिट जाती है।
Ø हारसिंगार के बीजों को छील लें। 10 ग्राम बीज में 3 ग्राम कालीमिर्च मिलाकर पीसकर गुदा पर लगाने से बादी बवासीर ठीक होती है।
v यकृत का बढ़ना: 7-8 हारसिंगार के पत्तों के रस को अदरक के रस और शहद के सुबह-शाम सेवन करने से यकृत और प्लीहा (तिल्ली) की वृद्धि ठीक हो जाती है।

v नखूनों की खुजली: नाखूनों की खुजली में रोगी का नाखून खुजलाकर हारसिंगार का रस लगाने से रोग दूर होता है।
v तालु रोग: तालु रोग दूर करने के लिए हारसिंगार की जड़ को चबाने से रोगी को लाभ मिलता है।

v दाद: हारसिंगार की पत्तियों को पीसकर लगाने से `दाद´ ठीक हो जाता है।


v मानसिक उन्माद (पागलपन): गर्मी की घबराहट को दूर करने के लिए हारसिंगार के सफेद फूलों के गुलकन्द का सेवन करना चाहिए।



v गृध्रसी (सायटिका) : 
Ø हरसिंगार के ढाई सौ ग्राम पत्ते साफ करके एक लीटर पानी में उबालें। जब पानी लगभग 700 मिली बचे तब उतारकर ठण्डा करके छान लें, पत्ते फेंक दें और 1-2 रत्ती केसर घोंटकर इस पानी में घोल दें।
Ø इस पानी को दो बड़ी बोतलों में भरकर रोज सुबह-शाम एक कप मात्रा में इसे पिएँ। ऐसी चार बोतलें पीने तक सायटिका रोग जड़ से चला जाता है।
Ø किसी-किसी को जल्दी फायदा होता है फिर भी पूरी तरह चार बोतल पी लेना अच्छा होता है।

Ø इस प्रयोग में एक बात का खयाल रखें कि वसन्त ऋतु में ये पत्ते गुणहीन रहते हैं अतः यह प्रयोग वसन्त ऋतु में लाभ नहीं करता।

आर्थराइटिस का उपचार : 

१. दोनों तरह के आर्थराइटिस (Osteoarthritis और Rheumatoid arthritis) मे आप एक दावा का प्रयोग करे जिसका नाम है चुना, वोही चुना जो आप पान मे खाते हो | गेहूं के दाने के बराबर चुना रोज सुबह खाली पेट एक कप दही मे मिलाके खाना चाहिए, नही तो दाल मे मिलाके, नही तो पानी मे मिलाके पीना लगातार तिन महीने तक, तो आर्थराइटिस ठीक हो जाती है | ध्यान रहे पानी पिने के समय हमेशा बैठ के पीना चाहिए नही तो ठीक होने मे समय लगेगा | अगर आपके हात या पैर के हड्डी मे खट खट आवाज आती हो तो वो भी चुने से ठीक हो जायेगा | 
२. दोनों तरह के आर्थराइटिस के लिए और एक अछि दावा है मेथी का दाना | एक छोटा चम्मच मेथी का दाना एक काच की गिलास मे गरम पानी लेके उसमे डालना, फिर उसको रात भर भिगोके रखना | सबेरे उठके पानी सिप सिप करके पीना और मेथी का दाना चबाके खाना | तिन महीने तक लेने से आर्थराइटिस ठीक हो जाती है | ध्यान रहे पानी पिने के समय हमेशा बैठ के पीना चाहिए नही तो ठीक होने मे समय लगेगा |

३. ऐसे आर्थराइटिस के मरीज जो पूरी तरह बिस्तर पकड़ जुके है, चाल्लिस साल से तकलीफ है या तिस साल से तकलीफ है, कोई कहेगा बीस साल से तकलीफ है, और ऐसी हालत हो सकती है के वे दो कदम भी न चल सके, हात भी नही हिला सकते है, लेटे रहते है बेड पे, करवट भी नही बदल सकते ऐसी अवस्था हो गयी है .... ऐसे रोगियों के लिए एक बहुत अच्छी औषधि है जो इसीके लिए काम आती है | एक पेड़ होता है उसे हिंदी में हरसिंगार कहते है, संस्कृत पे पारिजात कहते है, बंगला में शिउली कहते है , उस पेड़ पर छोटे छोटे सफ़ेद फूल आते है, और फुल की डंडी नारंगी रंग की होती है, और उसमे खुसबू बहुत आती है, रात को फूल खिलते है और सुबह जमीन में गिर जाते है । इस पेड़ के छह सात पत्ते तोड़ के पत्थर में पिस के चटनी बनाइये और एक ग्लास पानी में इतना गरम करो के पानी आधा हो जाये फिर इसको ठंडा करके रोज सुबह खाली पेट पिलाना है जिसको भी बीस तिस चाल्लिस साल पुराना आर्थराइटिस हो या जोड़ो का दर्द हो | यह उन सबके लिए अमृत की तरह काम करेगा | इसको तिन महिना लगातार देना है अगर पूरी तरह ठीक नही हुआ तो फिर 10-15 दिन का गैप देके फिर से तिन महीने देना है | अधिकतम केसेस मे जादा से जादा एक से देड महीने मे रोगी ठीक हो जाते है | इसको हर रोज नया बनाके पीना है | ये औषधि exclusiveExclusive है और बहुत strong औषधि है इसलिए अकेली हि देना चाहिये, इसके साथ कोई भी दूसरी दावा न दे नही तो तकलीफ होगी | ध्यान रहे पानी पिने के समय हमेशा बैठ के पीना चाहिए नही तो ठीक होने मे समय लगेगा |

बुखार का दर्द का उपचार : 

डेंगू जैसे बुखार मे शरीर मे बहुत दर्द होता है .. बुखार चला जाता है पर कई बार दर्द नही जाता | ऐसे केसेस मे आप हरसिंगार की पत्ते की काड़ा इस्तेमाल करे, 10-15 दिन मे ठीक हो जायेगा | 

घुटने मत बदलिए : 
 
RA Factor जिनका प्रोब्लेमाटिक है और डॉक्टर कहता है के इसके ठीक होने का कोई चांस नही है | कई बार कार्टिलेज पूरी तरह से ख़त्म हो जाती है और डॉक्टर कहते है के अब कोई चांस नही है Knee Joints आपको replace करने ही पड़ेंगे, Hip joints आपको replace करने ही पड़ेंगे | तो जिनके घुटने निकाल के नया लगाने की नौबत आ गयी हो, Hip joints निकालके नया लगाना पड़ रहा हो उन सबके लिए यह औषधि है जिसका नाम है हरसिंगार का काड़ा |

राजीव भाई का कहना है के आप कभी भी Knee Joints को और Hip joints को replace मत कराइए | चाहे कितना भी अच्छा डॉक्टर आये और कितना भी बड़ा गारंटी दे पर कभी भी मत करिये | भगवान की जो बनाई हुई है आपको कोई भी दोबारा बनाके नही दे सकता | आपके पास जो है उसिको repair करके काम चलाइए | हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री अटलजी ने यह प्रयास किया था, Knee Joints का replace हुआ अमेरिका के एक बहुत बड़े डॉक्टर ने किया पर आज उनकी तकलीफ पहले से जादा है | पहले तो थोडा बहुत चल लेते थे अब चलना बिलकुल बंध हो गया है कुर्सी पे ले जाना पड़ता है | आप सोचिये जब प्रधानमंत्री के साथ यह हो सकता है आप तो आम आदमी है |
https://arogyasanjeevani.blogspot.in/2015/03/blog-post.html
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जानिये हरसिंगार के फायदे। स्रोत : http://nihsarg.com/benefits-of-jasmine/
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खांसी-बुखार-सायटिका में लाभकारी हरसिंगार, जानें और भी गुण
By: PurnimaUpdated: Friday, February 19, 2016, 16:38 [IST]

बात चाहे खूबसूरती निखारने की हो या फिर सेहत को फायदा पहुंचाने की, हरसिंगार फूल का कोई जवाब नहीं। हिंदू धर्म में हरसिंगार का बहुत महत्‍व है, इसे ईश्‍वर की अराधना में भी एक खास स्‍थान प्रदान किया गया है। अंग्रेजी में इसे नाइट जेस्मिन और उर्दू में इसे गुलज़ाफ़री कहा जाता है।

बडे़ काम के हैं ये फूल, इन्‍हें खा कर करें बीमारियों को दूर

हरसिंगार के फूल देखने में छोटे और सफेद रंग के होते हैं। इसकी डंडी नारंगी रंग की होती है। यह फूल रात को खिलते हैं आर सुबह जमीन पर बिखरे नज़र आते हैं। इसके पूरे पेड़ का इस्‍तमाल दवाइयों और सौंदर्य सामग्रियों को बनाने में किया जाता है।


इसमें फूलों में सुगंधित तेल होता है जो सौंदर्य सामग्री में यूज़ किया जाता है। इसके पत्‍तों का प्रयोग सायटिका और गठिया रोग के लिये किया जाता है। साथ ही यह फूल वात-कफ नाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्तशोधक होता है।

सुंदरता ही नहीं सेहत का भी खजाना है गुलाब

यह एक बड़ा ही खूबसूरत फूल है जिसे महिलाएं गजरे में भी लगाती हैं। इस फूल की विशेषता यहीं नहीं खतम होती है, इसमें और कौन कौन से गुण हैं, आइये जानते हैं उसके बारे में भी...
Source : http://hindi.boldsky.com/health/wellness/2016/medicinal-uses-night-jasmine-plant-harsingar-008752.html
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हरसिंगार के गुण भी सुंदर
सायटिका में लाभदायक पारिजात : हरसिंगार जिसे पारिजात भी कहते हैं, एक सुन्दर वृक्ष होता है, जिस पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। यह सारे भारत में पैदा होता है।

परिचय : यह 10 से 15 फीट ऊँचा और कहीं 25-30 फीट ऊँचा एक वृक्ष होता है और देशभर में खास तौर पर बाग-बगीचों में लगा हुआ मिलता है। विशेषकर मध्यभारत और हिमालय की नीची तराइयों में ज्यादातर पैदा होता है। इसके फूल बहुत सुगंधित और सुन्दर होते हैं जो रात को खिलते हैं और सुबह मुरझा जाते हैं।

विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- पारिजात, शेफालिका। हिन्दी- हरसिंगार, परजा, पारिजात। मराठी- पारिजातक। गुजराती- हरशणगार। बंगाली- शेफालिका, शिउली। तेलुगू- पारिजातमु, पगडमल्लै। तमिल- पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम-पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़- पारिजात। उर्दू- गुलजाफरी। इंग्लिश- नाइट जेस्मिन। लैटिन- निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस।

गुण : यह हलका, रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-कफनाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्तशोधक होता है। सायटिका रोग को दूर करने का इसमें विशेष गुण है।


रासायनिक संघटन : इसके फूलों में सुगंधित तेल होता है। रंगीन पुष्प नलिका में निक्टैन्थीन नामक रंग द्रव्य ग्लूकोसाइड के रूप में 0.1% होता है जो केसर में स्थित ए-क्रोसेटिन के सदृश्य होता है। बीज मज्जा से 12-16% पीले भूरे रंग का स्थिर तेल निकलता है। पत्तों में टैनिक एसिड, मेथिलसेलिसिलेट, एक ग्लाइकोसाइड (1%), मैनिटाल (1.3%), एक राल (1.2%), कुछ उड़नशील तेल, विटामिन सी और ए पाया जाता है। छाल में एक ग्लाइकोसाइड और दो क्षाराभ होते हैं।

उपयोग : इस वृक्ष के पत्ते और छाल विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है।

गृध्रसी (सायटिका) : हरसिंगार के ढाई सौ ग्राम पत्ते साफ करके एक लीटर पानी में उबालें। जब पानी लगभग 700 मिली बचे तब उतारकर ठण्डा करके छान लें, पत्ते फेंक दें और 1-2 रत्ती केसर घोंटकर इस पानी में घोल दें। इस पानी को दो बड़ी बोतलों में भरकर रोज सुबह-शाम एक कप मात्रा में इसे पिएँ।

ऐसी चार बोतलें पीने तक सायटिका रोग जड़ से चला जाता है। किसी-किसी को जल्दी फायदा होता है फिर भी पूरी तरह चार बोतल पी लेना अच्छा होता है। इस प्रयोग में एक बात का खयाल रखें कि वसन्त ऋतु में ये पत्ते गुणहीन रहते हैं अतः यह प्रयोग वसन्त ऋतु में लाभ नहीं करता।
Source : http://hindi.webdunia.com/natural-medicine/%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%A3-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%B0-109031800108_1.htm
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पारिजात/हरसिंगार के बारे में और जानें।
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