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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा

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लाइलाज का इलाज (Treatment of Incurable)


होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में किसी रोग की कोई पेटेंट दवा नहीं होती। फिर भी होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में असाध्य बीमारियों का भी इलाज सम्भव है। क्योंकि होम्योपैथ चिकित्सक मरीज के सम्पूर्ण लक्षणों के आधार पर दवा निर्धारित करते हैं।
There is no patent drug for any disease in homeopathic medicine. Nevertheless, Treatment of incurable diseases is also possible in homeopathic medicines. Because homeopath doctors determine the drug based on the patient's entire symptoms.-Dr. Purushottam Meena-M-9875066111, Health WhatsApp-85619-55619, 20112017

मित्रो क्या आप होम्योपैथी के बारे में जानते हैं?
Friends do you know about Homoeopathy?



होमियोपैथी एक मरीज के लिए बहुत आसान है, लेकिन एक होम्योपैथ के लिए बहुत मुश्किल काम है। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि एक होम्योपैथ चिकित्सक असफल हो सकता है, लेकिन होम्योपैथी कभी विफल नहीं होती, क्योंकि यह एक व्यक्ति को संपूर्णता से ठीक करने में सक्षम है। इसके अलावा, होम्योपैथिक दवाइयां तुलनात्मक रूप से सस्ती और लेने में बहुत आसान हैं।  यह सुरक्षित और दुष्प्रभावरहित हैं। यह न तो खतरनाक है और न ही जीवन के लिए हानिकारक है।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा-M-9875066111, Health WA-85619-55619

Homoeopathy is very easy for a patient but very tough-task to a Homoeopath. Therefore it is said that a Homoeopath doctor may fail, but Homoeopathy never fail, because it is able to cure a person with totality. Other than this, Homoeopathic medicines are Comparatively Cheap and very easy to take. It is safe and side effects less. It is neither dangerous nor Harmful for life.-Dr. Purushottam Meena-M-9875066111, Health WA-85619-55619
लक्षणों का मिलान करें और लाइलाज बीमारियों से मुक्ति पायें। भाग-1

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

होम्योपैथी के मूल सिद्धान्त के अनुसार, होम्योपैथी में किसी भी रोग की कोई सुनिश्चित दवाई नहीं होती है। (There is no sure medication for any disease) केवल इतना ही नहीं, बल्कि-

1-दो बीमार लोगों की एक जैसी बीमारी के लिये, अलग-अलग दवाई दी जा सकती है। (For the same illness of two sick people, different medicines can be given)

2-एक ही दवाई से, एक या एकाधिक रोगियों के अनेक रोगों को ठीक किया जा सकता है। (With the same medication, many diseases of one or more patients can be cured)

3-इसकी मूल वजह यह है कि होम्योपैथी में हम रोग का नहीं, रोगी का इलाज करते हैं। (We treat the patient, not the disease)

4-रोगी के मानसिक एवं शारीरिक लक्षणों के अनुसार मेल खाने वाली दवाई का चयन/सिलेक्शन करके रोगी की सभी प्रकार की तकलीफों का इलाज किया जा सकता है। (All types of diseases of the patient can be cured)

5-होम्योपैथी की किसी भी दवाई के कोई साईड इफैक्ट/दुष्प्रभाव नहीं होते हैं। (There are no side effects of any medicine in Homeopathy)

होम्योपैथी के लाक्षणिक चिकित्सा सिद्धान्त को आम लोगों के लिये सरल, सुगम और रोचक बनाने के लिये मेरी ओर से छोटा सा प्रयास शुरू किया जा रहा है। जिसके तहत विश्व के महान होम्योपैथिक चिकित्सकों द्वारा अनुभवसिद्ध कुछ अति-महत्वूपर्ण लक्षणों को पाठकों के समक्ष सरल तरीके से पेश कर रहा हूं।

प्रस्तुत निम्न लक्षणों से यदि आप में से किसी के भी लक्षण मेल खाते हैं, तो आप इनके आधार पर अपनी किसी भी और कितनी भी पुरानी मानसिक या शारीरिक बीमारी या व्यसन (mental or physical illness or addiction) के इलाज की उम्मीद कर सकते हैं।

कृपया 50 फीसदी से अधिक लक्षण मेल खाने पर किसी अनुभवी होम्योपैथ चिकित्सक से सम्पर्क करें। हो सकता है कि अभी तक 'लाइलाज समझी जाने वाली' (incurable considered) आपकी तकलीफ/लत से आपको मुक्ति मिल जाये?

आपके इलाज के लिए आधारभूत लक्षण
Basic Symptoms for Your Cure

1. जैसे स्त्रियों के सिर के बाल उलझते हैं, वैसे ही रोगी की आँखों की पलकों के बाल उलझ कर पलकों के अन्दर की ओर मुड़ जाते हैं।

2. युवतियों की नाक नोक पर चमकीली लाली सी दिखती है।

3. बच्चों के बालों के अगले सिरे अर्थात बालों की नोक एक-दूसरे से उलझ कर लट बंध जाती है। यदि इनको काट दिया जाये, तो फिर जो नये बाल निकलते हैं वे भी इसी प्रकार उलझते रहते हैं।

4. मुँह के अन्दर, होठों में, जीभ में, गाल के आंतरिक भाग में छाले या छालों के घाव पड़ जाते हैं। अनेक रोगियों के ऐसे छालें गले के अंदर, आतों में, यहां तक कि मल-द्वार तक पहुँच जाते हैं।

5. रोगिणी की योनि से अंडे की सफेदी की तरह का गाढ़ा श्वेत प्रदर निकलता है। श्वेत प्रदर के दौरान रोगिणी को ऐसा अनुभव होता है, मानो गर्म पानी की धार बह रही है।

6. रोगी/रोगिणी का ऊपर से नीचे की ओर गति से डरना, घबराना है। वह झूला नहीं झूल सकता। इस कारण वह ऊपर से नीचे की ओर गति करने से बचने की कोशिश करता है।















7. स्त्रियों को माहवारी समय से पहले तथा अधिक मात्रा में आती है। माहवारी के दौरान पेट में मरोड़ जैसा दर्द होता है। रोगिणी का जी मिचलाता है। पेट दर्द जो धीरे-धीरे पेट से कमर तक फैल जाता है। माहवारी के दौरान योनि का मुं​ह फूला हुआ सा महसूस होता है। साथ ही योनि में कुछ गड़ने/चुभने जैसा दर्द भी होता रहता है।

8. माहवारी के दौरान योनि से श्लैष्मिक-झिल्ली के कुछ टुकड़े-थक्के से निकलते रहते हैं। क्योंकि यह श्लैष्मिक-झिल्ली रुधिर के प्रवाह को रोकती है। इसलिये इस झिल्ली को बाहर धकेलने के लिये स्त्री के भीतरी अंगों से प्रसव-पीड़ा के समान दर्द उठता रहता है। उसे ऐसा अनुभव होता है कि भग में से जरायु बाहर निकल पड़ेगी। माहवारी के दौरान जब तक झिल्ली के ये टुकड़े बाहर नहीं निकल जाते, तब-तक अन्दर से प्रसव-पीड़ा के समान दर्द उठता रहता है।

9. इसी झिल्ली के कारण अनेक स्त्रियों को बांझपन की समस्या भी हो सकता है।

10. विचित्र-लक्षण रोगी/रोगिणी को किसी भी रोग में घबराहट 11 बजे दोपहर तक रहती है, उसके बाद घबराहट समाप्त हो जाती है।

11. दूसरा विचित्र-लक्षण कि रोगी अपने मुँह पर मकड़ी का जाला-सा लिपटा हुआ अनुभव करता है, और बार-बार उसे हटाने के लिये चेहरे पर हाथ फेरा करता है, लेकिन चेहरे पर होता कुछ भी नहीं है।

12. तीसरा विचित्र-लक्षण रोगी जब कुछ देर तक मानसिक-कार्य करता है, जैसे-लिखना, पढ़ना आदि तो उसका जी मिचलाने लगता है।

13. चौथा विचित्र-लक्षण स्त्री के स्तनों में दूध अधिक होने के कारण दूध अपने आप स्तनों से निकलने लगता है। साथ ही बच्चे को स्तनपान कराते समय, दूसरे स्तन में दर्द होता है।

14. हाथ की अंगुलियों के जोड़ों के पिछले भाग में खुजली होती रहती है तथा त्वचा अधिक मैली सी दिखती है। जिसके पसीने से बदबू आती रहती है।

15. रोगी/रोगिणी को अधिक गर्मी लगना, विशेषकर सिर में अधिक गर्मी लगने के कारण रात को ठीक से नींद नहीं आना। नींद में डरावने या काम वासना वाले सपने आना। सोते-सोते अचानक चिल्लाकर उठ जाना तथा डर लगना।

16. नीचे की ओर गति करने, शोरगुल, धूम्रपान करने तथा गर्मी के मौसम या गर्म कमरे में रहने से रोगी/रोगिणी के सभी प्रकार के रोगों का बढना या रोगी का मिजाज बिगड़ जाना।

MY Ref-(HOMEO15112017XEROB)
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
आॅल लाईन स्वास्थ्य रक्षक सखा।
परामर्श समय: सुबह 10 से सायं 10 बजे के बीच।
दाम्पत्य विवाद सलाहकार
Marital Dispute Consultant
हेल्थ वाट्सएप: 8561955619
मोबाईन नम्बर: 9875066111
15 नवम्बर, 2017
रूढिवादी समाज में तड़फते वैवाहिक रिश्तों की हकीकत!
The reality of suffocated marital relationships in a conservative society!

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

हम सब जानते हैं कि विवाह के लिये एक विषम लिंगी की जरूरत होती है। लेकिन विवाह की सफलता के लिये यह पर्याप्त नहीं है। विवाह की सफलता के लिये, आपको ऐसा साथी तलाशना चाहिये, जो मानसिक और शारीरिक रूप से आपके अनुकूल हो। लेकिन क्या एक रूढिवादी समाज में यह सम्भव है? बिलकुल नहीं है। बल्कि असम्भव है। इसका अभिप्राय यह भी है कि, यदि आप अपने अनुकूल साथी तलाश नहीं कर सकते तो, जीवनभर इसकी वांछित कीमत चुकाते रहने को तैयार रहें।
We all know that there is a need for an opposite sex to marry. But this is not enough for the success of marriage. For the success of marriage, you should search a partner, who would Mentally and physically friendly with you. But is it possible in a conservative society? Not at all. Rather, it is impossible. It also means that, if you can not find a suitable partner, then be prepared to keep paying the desired price throughout your life.

इस विषय में वैवाहिक विवाद सलाहकार विशेषज्ञों का कहना है कि-क्या आप में सामाजिक रूढियों को तोड़ने का साहस है? ताकि आप अपने लिये उपयुक्त तथा अनुकूल वैवाहिक साथी तलाश कर सकें। जिसके बदले ताउम्र खुश रह सकें। या आप समाज की रूढियों के सामने नतमस्तक हो जायें। जिसके प्रतिफल में, आप जीवनभर खुद ही खुद की हत्या करते रहेंगे। सब कुछ आप पर निर्भर करता है, कि आखिर आप अपने लिये चाहते क्या हैं?
In this regard, marital dispute consultants say that, do you have the courage to break the Social customs? So that you can find suitable and friendly marriage partners for you. After which you can remain happy. Or you can bow to the principles of society. In the result of which, you will continue to kill yourself all the time in life. Everything depends on you, what do you want for yourself?

मैं इसमें इतना और जोड़ना चाहूंगा कि, रूढिवादी समाजों में, दोनों ही स्थितियों में धोखा होने का अंदेशा बना रहेगा। हां, धोखे की सम्भावना कम या अधिक हो सकती है। क्योंकि रूढ़िवादी समाजों में, विवाह जैसा अति महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले, भावी वैवाहिक साथियों में, एक दूसरे से खुलकर बात करने की परम्परा नहीं रही है।
I would like to add more in that, in conservative societies, there will be fear of cheating in both situations. Yes, the probability of deception can be less or more. Because in conservative societies, before taking a very important decision like marriage, there is no tradition to talk openly to each other in future marital partners.

इस कारण, वे एक-दूसरे के भूतकाल, आदतों, विचारों और यौन व्यवहारों के बारे में खुलकर बात करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं। इसके अलावा, संयोग तथा नियती के निर्णयों का कभी नहीं टाला जा सकता। बहुत से लोगों को ऐसी सोच के परिणाम भी भोगने पड़ते हैं।
Because of this, they do not have the courage to speak openly about each other's past, habits, thoughts and sexual behaviors. Apart from this, coincidence and destiny decisions can never be avoided. Many people also have to suffer the consequences of such thinking.

केवल इतना ही नहीं, बल्कि टूटते परिवारों, बढते तलाकों और अनेक आत्महत्या प्रकरणों के पीछे भी, कहीं न कहीं-बेमेल विवाह, यौन असंतोष, विवाहेत्तर सम्बन्ध या विवाहपूर्व यौन सम्बन्धों में विवाहोपरान्त भी लिप्तता और पुरुषों द्वारा स्त्रियों के रूढिगत शर्मीले स्वभाव तथा उनके विलम्बित चर्मोत्कर्ष यौनांद स्वभाव को नहीं समझना की अक्षमता, साथ ही साथ स्त्रियों द्वारा पुरुषों के अवसादपूर्व यौनव्यवहारों को नहीं समझना भी मूल कारण होते हैं। साथ ही साथ पुरुषों की एक तरफा यौन आनंद प्राप्त करने की स्वार्थी प्रवृत्ति को चुपचाप सहने का स्त्रियों का स्वाभाव।
Not only this, but also even behind the broken families, increasing divorces, and many suicide cases, somewhere-Unmatched marriages, sexual dissatisfaction, extramarital relationships or Even after marriage also continuing premarital sex relations and men's ineligibility, to understand women's orthodox shy nature and their delayed orgasm nature (sexual satisfaction), Simultaneously, women's nature to quietly tolerate men's selfish tendency for one-sided sexual pleasure.

इस विषय को सरलता से समझने के लिये, हमें विभिन्न स्वास्थ्य वैब साइट्स पर यौन विशेषज्ञों से पूछे जाने वाले सवालों पर विचार करना चाहिये। जिनमें हमें युवा पीढी के यौन-विषयक सवालों, जिज्ञासाओं, और भ्रान्तियों को समझना चाहिये। साथ ही साथ विवाहित लोगों की, वैवाहिक समस्याएं, उनका यौन असन्तोष, यौनिक पीड़ा और यौन दुर्व्यवहार भी इस विषय को समझने में सहायक हो सकते हैं।
In order to understand this topic easily, we should consider the questions asked to the sexual experts on various health websites. In which we should understand the questions, curiosities, and myths of the young generation. As well as married people's marital problems, their sexual dissatisfaction, sexual harassment and sexual abuse can also help in understanding this subject.

सबसे पहली बात तो यह है कि रूढीवादी समाज में स्थापित धारणाओं तथा असुरक्षा की भावना के चलते स्त्री और पुरुष का संसार बिलकुल अलग-अलग होता है। किन्हीं अपवादों को छोड़ दिया जाये तो, ​वैवाहिक रिश्ते में बंधने से पहले और विवाह के बाद भी, यौन-विषयक मामलों में एक दूसरे के प्रति ईमानदारी होती ही नहीं। बल्कि यह कहना अधिक सही होगा कि उनके मध्य निष्कपटता हो ही नहीं सकती। इसका एक बड़ा कारण यह है, उनके मन में कुछ पाने की तुलना में सबकुछ खो देने का डर अधिक होता है।
First of all, because of the Established assumptions and insecurity set up in a conservative society, the world of man and woman is totally different. Except for any exceptions, even before marriage and after marriage, there is no sincerity in each other in sexual matters. Rather it would be more right to say that they can not be honest in their midst. One of the major reasons for this is that the fear of losing everything is more than getting something in their mind.

अत: रूढिवादी समाज में, विवाहित लोगों को यथास्थिति से समझौता करके, जैसे-तैसे वैवाहिक रिश्ते को निभाना अधिक सुरक्षित लगता है।
So in a conservative society, married people get more secure by compromising the status quo, as well as maintaining a marital relationship.

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
दाम्पत्य विवाद सलाहकार
Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
Marital Dispute Consultant
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12 नवम्बर, 2017
*जिन रोगियों को अपने बारे में जानकारी देना*
*तक गवारा नहीं, उनका इलाज कैसे सम्भव है?*



आधुनिक चिकित्सा पद्धति से लम्बे समय तक इलाज करवाकर और थक हारकर अनेक रोगी आयुर्वेद या होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति की ओर रुख करते हैं। यद्यपि उनकी इलाज करवाने की मानसिकता आधुनिक चिकित्सा पद्धति के अनुसार ही होती है।

विशेषकर होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में रोग के नाम से नहीं, बल्कि रोगी के लक्षणों के मुताबिक रोगी का इलाज किया जाता है। जिसके लिये डॉक्टर को रोगी की सम्पूर्ण लाक्षणिक जानकारी जानना अत्यंत जरूरी होती है। जबकि रोगी, रोग का नाम बताने के अलावा कुछ भी नहीं बताना चाहते हैं।

इसका दु:खद दुष्पपरिणाम यह होता है कि ऐसे रोगियों को लम्बे समय तक तकलीफ भोगनी पड़ती है। वास्तव में रोगियों की होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति के प्रति अज्ञानता इसका मूल कारण है। जिसके लिये केन्द्रीय सरकार की नीति जिम्मेदार है।
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:कृपया ध्यान दें:
स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता हेतु प्रकाशित सामग्री को पढकर आप खुद अपना या अपने किसी स्वजन का उपचार करने का खतरा नहीं उठायें, क्योंकि रोगी के लक्षणों को जानने के बाद, उपयुक्त दवाई की शक्ति और मात्रा का निर्धारण, एक अनुभवी डॉक्टर ही कर सकता है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
हेल्थ वाट्सएप: 85-619-55-619
मोबाईल नम्बर: 98750-66111
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रोगियों को इस बात का ज्ञान ही नहीं होता कि एक होम्योपैथ डॉक्टर के लिये रोगी का इलाज शुरू करने के लिये, किसी भी रोगी के मानसिक, स्वभावगत और शारीरिक लक्षणों, खाने-पीने, कार्य, सोने-जागने आदि की आदतों इत्यादि को सम्पूर्णता से जानना अत्यन्त जरूरी होता है।

इसके ठीक विपरीत आॅन लाइन चिकित्सा परामर्श हेतु सम्पर्क करने वाले अधिसंख्य रोगी भी अपनी लाक्षणिक जानकारी लिखकर देने में अत्यधिक संकोच करते हैं। उन्हें ऐसा लगता है, मानों वे अपने लक्षण बताकर डॉक्टर पर उपकार कर रहे हैं और उनसे लक्षण पूछने पर उन्हें अपमानजनक अनुभव होता है। ऐसे लोगों का कम से कम होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति से इलाज सम्भव नहीं!

अत: एक होम्योपैथ होने के नाते मैं, जनहित में सार्वजनिक रूप से सभी पाठकों को अवगत करवाना चाहता हूं कि होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति से इलाज करवाने के इच्छुक रोगी, आधुनिक चिकित्सा पद्धति/एलोपैथी वाली मानसिकता को त्यागकर और खुले मन से किसी भी होम्यापैथ से सम्पर्क करेंगे तो *"लाइलाज मानी जाने वाली"* बीमारियों का भी सही से उपचार हो सकेगा।

*सबसे महत्वपूर्ण बात:* आज के समय में जबकि डॉक्टर्स के पास रोगियों की लम्बी लाइल लगी होती हैं। ऐसे में समयाभाव के चलते रोगी के लक्षण जानने के लिये होम्योपैथ डॉक्टर्स के पास समय की अत्यंत कमी होती है। फिर भी *यदि कोई होम्योपैथ डॉक्टर आपके लक्षण जानना चाहता है, तो रोगी को ऐसे डॉक्टर्स के प्रति कृतज्ञ होना चाहिये और खुशी-खुशी अपनी सम्पूर्ण लाक्षणिक जानकारी देनी चाहिये। अन्यथा सफल इलाज की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिये।*
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', आॅल लाईन स्वास्थ्य रक्षक सखा। परामर्श समय: सुबह 10 से सायं 10 बजे के बीच। हेल्थ परामर्श हेतु मो. नं.: 98750-66111, वाट्सएप नम्बर: 85-619-55-619, 06.11.2017
*डेंगू एवं चिकनगुनिया का होम्योपैथिक तथा आयुर्वेदिक इलाज*



*सबसे महत्वपूर्ण बात:* इम्युनिटी/रोग प्रतिरोधक क्षमता अर्थात रोगों से लड़ने की शारीरिक क्षमता सही हो तो मौसमी तथा संक्रामक बीमारी आसानी से दबोच ही नहीं सकती। बेशक यह सच है कि इम्युनिटी एक-दो दिन में नहीं बढ़ सकती। इम्युनिटी बढ़ाने के लिए नियमित रूप से पर्याप्त, पोषक और संतुलित भोजन करें, नशे तथा अखाद्य एवं असुपाच्य भोजन से बचें। मौसमी फल, हरी सब्जियां, दाल, दूध-दही आदि का भी खूब सेवन करते रहें। आपका लीवर हमेशा स्वस्थ रहे इसका विशेष रूप से ध्यान रखें।

इन दिनों वायरल फीवर के साथ-साथ डेंगू और चिकनगुनिया भी फैल रहा है। अत: इनसे बचाव और इनका उपचार जरूरी है। इस बारे में चिकित्सकीय परामर्श तो अनिवार्य है ही, लेकिन कुछ उपयोगी जानकारी प्रस्तुत है:-

  • *1. अपने आसपास गंदगी तथा गंदे पानी में मच्छरों को पनपने का मौका नहीं दें।*
  • *2. अभी तक डेंगू और चिकनगुनिया का कोई टीका नहीं है। अनुभव बताता है कि ऐलोपैथिक एंटीबायोटिक्स असरकारी नहीं होते हैं। अत: बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल नहीं करें।*
  • *3. रोगी को पर्याप्त आराम और सकारात्मक माहौल मिले तथा अधिक से अधिक मात्रा में सुपाच्य तरल आहार, नारियल पानी एवं ओआरएस का घोल आदि देना चाहिए।
  • *4. बॉडी पैन होने पर बिना डॉक्टर की सलाह के किसी भी प्रकार की दर्द निवारक गोली एस्प्रिन, ब्रूफेन या कॉम्बिफ्लेम को नहीं लेना चाहिए।*

*लक्षणानुसार होम्यापैथिक इलाज:* होम्योपैथी में किसी भी बीमारी की कोई फिक्स दवाई नहीं होती है। रोगी के लक्षणों के अनुसार और किसी भी होम्योपैथ के अनुभव के अनुसार दवाई दी जाती है। अत: *कोई भी दवाई देने से पहले रोगी के लक्षणों का मिलान और चिकित्सकीय परामर्श अवश्य कर लेना चाहिये।*

*1. यूपेटोरियम परफोलियेटम (Eupatorium Perfoliatum) 30:* रोग की प्रथम अवस्था में यूपेटोरियम पर्फ 30 को दिया जा सकता है। इसके लक्षण-मलेरिया, चिकनगुनिया, डेंगू बुखार और इन्फ्लुएंजा आदि किसी भी बुखार में जब रोगी का हर अंग और प्रत्येक मांसपेशी दर्द करने लगती है। हर हड्डी और हर जोड़, खासकर हाथ की कलाई, ऐसा दर्द करने लगती है, मानो हड्डियां चूर-चूर हो गई हों, तब इस बुखार तथा दर्द को यह दवा दूर कर देती है। जिस किसी भी बुखार में *हड्डियां दर्द करने लगें उसमें यह औषधि रामबाण का काम करती है।*

*2. रस टॉक्स (Rhus Tox=Rhus Toxicodendron) 30:* किसी भी प्रकार के बुखार में इस औषधि का मुख्य प्रभाव मांसपेशियों, पुट्ठों पर होता है। मांसपेशियों के पुट्ठे अकड़ जाते हैं, दर्द करने लगते हैं। सामान्यत: आराम/विश्राम से दर्द घटा करता है, परन्तु इस औषधि का विलक्षण-लक्षण यह है कि दर्द विश्राम से बढ़ता और हरकत से घटता है। अत: रोगी लगातार हरकत किया करता है। इसके अलावा रोगी नमी या ठंडी नहीं सह सकता। रोगी वायु-मंडल के लगातार होने वाले परिवर्तनों को नहीं सह सकता है। आसमान में बादल आने पर एहतियातन वह गर्म कपड़ा ओढ़ लेता है। *थोड़ी-सी भी नम या हवा लगने से रोगी का दर्द उभर आते हैं।*

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:कृपया ध्यान दें:
स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता हेतु प्रकाशित सामग्री को पढकर आप खुद अपना या अपने किसी स्वजन का उपचार करने का खतरा नहीं उठायें, क्योंकि रोगी के लक्षणों को जानने के बाद, उपयुक्त दवाई की शक्ति और मात्रा का निर्धारण, एक अनुभवी डॉक्टर ही कर सकता है।
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*3. पाइरोजिनियम (Pyrogenium) 30:* यह सभी बुखारों के लिये एक महान औषधि है। रोगी को बिस्तर कड़ा अनुभव होता है, रोगी बिस्तर पर पड़ा ऐसा अनुभव करता है मानो चट्टान पर पड़ा हो, तकिया भी बड़ा कड़ा प्रतीत होता है। रोगी को सिर्फ मांस-पेशियां ही नहीं, बल्कि उसकी हड्डियों में भी दर्द होता है। रोगी बेचैन रहता है, और यह बेचैनी ‘गर्मी’ और ‘हरकत’ से कम होती है। *रोगी के प्रत्येक स्राव से असहनीय दुर्गन्ध आती है।* पेशाब, ऋतु-स्राव, मैला-पानी, पसीना, सांस, मुंह-इन सब से अत्यंत बदबू आना। जब रोगी को बुखार अधिक हो तो पाइरोजिनियम 30 अवश्य दी जा सकती है।

*4. पल्साटिला (Pulsatilla) 30:* दर्द एक जोड़ से दूसरे जोड़ में चला जाता है, दर्द का लक्षण बदलता रहता है। दर्द में ठंड की झुरझुरी या सिहरन महसूस होती है। रोगी को सहानुभूति की चाहत होती है। यदि रोगी को *तेज बुखार होने पर भी प्यास नहीं लगती।* रोगी का मुंह खुश्क हो तो प्यास लगनी चाहिये, परन्तु इस रोगी के मुंह में खुश्क होने पर भी प्यास नहीं लगती। रोगी को ‘खुली हवा की इच्छा’ होती है और ‘चलने-फिरने से आराम’ का अनुभव होता है।

*5. ब्रायोलिया (Bryonia) 30:* यदि हरकत से दर्द की वृद्धि हो और विश्राम से दर्द में कमी हो तो ब्रायोलिया दी जा सकती है। यहां यह समझ लें कि दर्द होने पर हरकत से रोग बढ़ेगा, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, परन्तु हरकत से रोग बढ़ने का गूढ़ अर्थ है। अगर रोगी लेटा हुआ है, तो आंख खोलने या आवाज सुनने तक से रोगी कष्ट अनुभव करता है। जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटने से रोगी को आराम मिलता है। असल में, यह लक्षण ‘हरकत से रोग की वृद्धि’-इस लक्षण का ही दूसरा रूप है। जब दर्द का हिस्सा दब जाता है, तब उस अंग में हरकत बन्द हो जाती है तो रोगी को आराम मिलता है। यही नहीं रोगी ठंडी हवा पसन्द करता है, ठंडा कपड़ा ओढ़ना चाहता है, परन्तु दर्द में अपनी प्रकृति के विरुद्ध उसे सेंक/गर्मी से आराम मिलता है। इसके अलावा रोगी को खुश्की के कारण प्यास बहुत लगती है। यद्यपि *रोगी जल्दी-जल्दी नहीं, बल्कि देर-देर में अधिक मात्रा पानी पीता है।*

*6. केरिका पपाया (Carica Papaya) Q एवं टीनोस्पोरा (Tinospora) Q क्रमश: पपीते के पत्ते का रस एवं गिलोय का सत है जो कि प्लेटलेट्स काउंट को नियंत्रित करता है। इसे 15-15 बूंद एक कप पानी में मिलाकर दिन में दो बार दे सकते हैं।*

*7. अन्य:* उपरोक्त के अलावा रोगी के लक्षणों के अनुसार Phosphorus, Calcarea carb, Sulphur, Tuberculinum, Sepia, Arsenicum album, Natrium mur, Nux vomica, Lycopodium, Belladonna, Merc sol, Causticum, Lachesis, China, Ferrum met आदि में से किसी उपयुक्त दवाई का चुनाव किया जा सकता है। लेकिन प्रथम दवाई अर्थात *यूपेटोरियम परफोलियेटम (Eupatorium Perfoliatum) 30 को अवश्य साथ में चलने दें।*

*डेंगू और चिकनगुनिया की प्रतिषेधक दवाई:*

1. अनेक होम्योपैथ का अनुभव है कि यूपेटोरियम परफोलियेटम (Eupatorium Perfoliatum) 200 सप्ताह में एक बार और पाइरोजिनियम (Pyrogenium) 30 दिन में दो बार, जब तक परिवार के सभी सदस्यों को डेंगू का संक्रामक प्रकोप फैला हो, तब देते रहें। इससे सामान्य अवस्था में डेंगू और चिकनगुनिया से बचाव हो सकता है।

2. अनेक होम्योपैथ का यह भी अनुभव है कि ओसीमम सेक्टम (Ocimum Sanctum) Q तथा एजाडिरेक्टा इण्डिका (Azadirachta Indica) Q इन दोनों को आपस में मिलाकर प्रतिदिन सुबह या शाम, केवल एक मात्रा लेते रहने से इसके प्रभाव से मच्छर नहीं काटते हैं या काट भी लेते हैं तो शरीर में डेंगू के वायरस नहीं पनपते हैं।

*मेरा अनुभवसिद्ध चिकनगुनिया/डेंगू नाशक काढा*
  • 1. नीम गिलोय की चार इंच लम्बी, 1/2 इंच मोटी डंडी।
  • (नीम चढी गिलोय नहीं मिले तो दो-तीन नीम के पत्ते मिला लें)
  • 2. तुलसी के मध्यम आकार के पांच पत्ते।
  • 3. काली मिर्च-तीन दाने।
  • 4. मूंगफली के एक दाने के बराबर ताजा अदरक।
  • 5. चार गुणा चार (4x4) इंच साइज का पपीता का ताजा और कोमल पत्ता।
>>>>>उक्त सभी को 400 मिलीलीटर पानी में उबालें 100 मिलीलीटर शेष रहने पर रोगी को सुबह-शाम 5-7 दिन तक पिलायें। सुबह नाश्ते से 30 मिनट पहले और शाम को डिनर के 10 मिनट बाद।
>>>>> उपरोक्त के अलावा: नारियल पानी, अनार ज्यूस, सेव ज्यूस, शुद्ध पानी भी रोगी को पिलाते रहें।

*नोट:* अगर आप होम्योपैथिक या उक्त नुस्खे को रोगी को इलाज के तौर पर दे रहे हैं तो भी आप अपने एलोपैथिक डॉक्टर के इलाज को बंद न करें। उसके साथ ही इसे भी ले सकते हैं।

*नोट: किसी योग्य चिकित्सक की राय के बाद दवाईयों का सेवन करना चाहिये।*

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', आॅल लाईन स्वास्थ्य रक्षक सखा। परामर्श समय: सुबह 10 से सायं 10 बजे के बीच। हेल्थ परामर्श हेतु वाट्सएप नम्बर: 85-619-55-619 , 04.11.2017, Mobile: 9875066111
*'हाथ में डंडा लिये यह सोचा करता है कि किस के सिर पर मारूं?'*
*होम्योपैथी के जरिये ऐसे गुस्सेल लोगों पर काबू पाया जा सकता है।*

*लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'*
मैं एक ऐलोपैथ डॉक्टर के पास गया तो उनके पास एक रोगी बैठा था। जिसके बारे में उसके परिवार के लोग बता रहे थे कि यह व्यक्ति हमेशा लोगों से झकड़ा करता रहता है। डॉक्टर साहब ने मजाक में मुझ से पूछा कि क्या आपकी होम्योपैथी में इसका कोई इलाज है? मैंने तपाक से हां कहा तो सभी को आश्चर्य हुआ। डॉ. साहब बोले मजाकर कर रहे हो या फिर...? मैंने कहा, मजाक नहीं, ऐसा हो सकता है।

इस सन्दर्भ में पाठकों की जानकारी के लिये बताना उचित होगा कि होम्योपैथी में गुस्से या क्रोधपूर्ण स्वभाव को मानसिक विकारों में शामिल किया गया। यहां तक कि यदि किसी व्यक्ति के शारीरिक रोगों में कोई महत्वपूर्ण मानसिक लक्षण भी प्रकट होता हो तो हम शारीरिक के बजाय मानसिक लक्षणों को आधार मानकर औषधि निर्णय करने से इलाज करते हैं। इससे शारीरिक रोग के समूल नाश में शीघ्र-सफलता मिलती है। क्रोध/गुस्सा से जुड़े ऐसे ही कुछ मानसिक या स्वभावगत लक्षण यहां प्रस्तुत हैं। इन लक्षणों का और रोगी की अन्य शारीरिक बीमारियों का होम्योपैथिक दवाईयों के जरिये में उपचार किया जा सकता है।
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समाज में कुछ लोग ऐसे मिलेंगे। जो शारीरिक-विकास में फिसड्डी, लेकिन मानसिक-विकास आगे होते हैं। ऐसे दुबले-पतले शरीर में तीक्ष्ण बुद्धिमता का निवास होता है। जो बड़े नाजुक (Sensitive) होते हैं। जरा-सी बात पर ही उनका पारा चढ़ जाता है। उनके बारे में कहा जा सकता है कि अत्यन्त धैर्यहीन, असंतुष्ट और किसी पर भी विश्वास न करने वाले। इनके बारे में लोगों को पता होता है कि ऐसे लोग खुद दूसरे लोगों से आगे से झगड़ा मोल लिया करते हैं।

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ये लोग दूसरे पर हावी होना चाहते हैं, हर बात में नुक्स निकालना इनकी आदत होती है। इनका मिजाज तेज होता है। यदि गलती से कोई ऐसे लोगों की बात को काटे तो उनको सहन नहीं होता। ऐसे लोगों की तुलना ऐसे व्यक्ति से की जाती है जो हाथ में डंडा लिये यह सोचा करता है कि किस के सिर पर मारूं!

ऐसे लोगों में यह भी देखा जाता है कि अकसर वे लोभी, कंजूस, लालची, और लड़ाकू किस्म के होते हैं।

ऐसे लोगों में से कुछ में एक विचत्र लक्षण पाया जाता है। उनको एकान्त से डर भी लगता है और वो एकान्त भी चाहते हैं। जिसका अभिप्राय यह है कि ऐसा व्यक्ति एक छोटे-से कमरे में एकान्त में रहना पसन्द करता है, परन्तु वह यह भी चाहता है कि उसके पास एक दूसरा भी कमरा भी हो जिसमें कोई उसका जान-पहचान का व्यक्ति रहे।

यही नहीं ऐसा भी देखा गया है कि ऐसा व्यक्ति उन्हीं लोगों के पास रहना चाहता है जो सदा उसके साथ रहते आये हैं और अपरिचितों से वह दूर रहना चाहता है। इस प्रकार वह एकान्त चाहता भी है, और एकान्त से डरता भी है।

ऐसा व्यक्ति जिन्हें दूसरे लोग क्रोधी के नाम से जानते हैं, वही व्यक्ति झट से रो भी देता है-जब कभी उसका कोई आत्मीय मित्र मिलता है, तो उसकी आखों में आँसू आ जाते हैं। यदि उसे कोई व्यक्ति कुछ उपहार भेंट करें तो धन्यवाद देने के साथ-साथ उसकी आंखें से आँसू टपक पड़ते हैं। वह जरा-सी खुशी के अवसर पर भी रो देता है। इस प्रकार क्रोधी होने के साथ-साथ वह अत्यंत भावुक भी होता है।

*ऐसे व्यक्तियों में से अनेक के चित्त में अजीब तरह के बुरे-बुरे खयाल आते रहते हैं। जैसे अगर दुनिया का नाश हो जाये तो? अगर घर के सब लोग मर जायें तो? अगर घर को आग लग जाये तो? कार में चलते वक्त दुर्घटना हो जाये तो? अपने और अपने परिवार के भविष्य के बारे में इस तरह के विचारों को सोचते-सोचते अनेक बार ऐसे लोगों को पागलपन आ जाता है।*

यदि शुरूआत में ऐसे लोगों को किसी योग्य और अनुभवी होम्योपैथ को दिखाया जाये तो सभी मानसिक विकारों से मुक्ति दिलायी जा सकती है!

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, आॅल लाईन स्वास्थ्य रक्षक सखा। परामर्श समय: सुबह 10 से सायं 10 बजे के बीच। केवल हेल्थ परामर्श हेतु वाट्सएप नम्बर: 8-5619-5-5619, 01.11.2017

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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
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अरणी Clerodendrum Phlomidis
‌‌‌पर्यायवाची नाम:

कर्नाटकी - नरूबल।
गुजराती - अरणी।
तेलगू - तिक्कली, चट्टु, निलिचेट्टु।
पंजाबी - अगेधु।
बंगाली - गनीर, आगगन्त।
मराठी - एरंण, ताकली, टाकली।
लैटिन - ‌‌‌क्लेरोडेंड्रम फ्लोमिडिस (Clerodendrum phlomidis)।
संस्कृत - अरनी, अगेधु गनियार।
‌‌‌हिन्दी - अग्तिमंद, गाणिकारिका, तकीर्ण।


स्वाद: ‌‌‌इसका स्वाद कड़वा होता है।

‌‌‌पौधे का स्वरूप: ‌‌‌अरणी शुष्क मैदानों की कम ऊँचाई पर उगने वाली झाड़ीनुमा 1.5-3.0 मीटर ऊँचा पौधा है। ‌‌‌अरणी की दो प्रजातियां होती हैं - छोटी व बड़ी।

पत्ते: ‌‌‌इसके पत्ते हरे, गोल और खरपरे होते हैं। बड़ी अरणी के पत्ते नोकदार और छोटी अरणी के पत्तों से छोटे होते हैं। छोटी अरणी के पत्तों से सुगन्ध आती है।






फूल: ‌‌‌इसके फूल सफेद होते हैं।

फल: ‌‌‌इसके फल छोटे, करोंदे के फूलों के समान होते हैं।

‌‌‌विशेष: लोग इसकी चटनी और सब्जी भी बनाते हैं। श्वासरोग वाले लोगों को अरणी सब्जी अवश्य खानी चाहिए।





स्वभाव: गर्म प्राकृति।

‌‌‌औषधीय गुण:

‌‌‌बडी अरणी का पेड़: यह तीखा, गर्म, मधुर, कड़वा, फीका और पाचन शक्तिवर्द्धक होता है। यह वायु, जुकाम, कफ, सूजन, बवासीर, आमवात, मलावरोध, अपच, पीलिया, विषदोष और आंवयुक्त दस्त आदि रोगों में लाभदायक है।


‌‌‌

छोटी अरणी का पेड़: छोटी अरणी, बड़ी अरणी के समान ही गुणकारी है, परन्तु लेप करने, पट्टी बांधने और सूजन विशेषकर वात-द्वारा उत्पन्न हुई सूजन का नाश करता है।

दुग्धस्रावी: छोटी अरणी की सब्जी बनाकर प्रसूता महिलाओं को खिलाने से उनके स्तनों में दूध की वृद्धि होती है।

‌‌‌जोड़ों का दर्द: अरणी के पत्तों का काढ़ा बनाकर पिलाने से गठिया का दर्द ठीक होता है। अरणी के पंचांग - जड़, तना, पत्ती, फल और फूल का 100 मि.ली. काढ़ा सुबह-शाम पिलाने से गठिया और स्नायु की वात पीड़ा मिटती है।

कब्ज: अरणी के पत्ते और हरड़ की छाल का 100 मि.ली. काढ़ा करके सुबह-शाम 30 मि.ली. की मात्रा में पिलाने से बद्धकोष्ठता मिटती है।

‌‌‌रक्तशोधक: अरणी की जड़ का काढ़ा 100 मि.ली. पीने से खून साफ होता है। अरणी के पत्तों के रस में शहद मिलाकर पिलाने से भी खून साफ होता है।

‌‌‌दर्द व सूजन: सूजन पर अरणी को पीसकर, लेप करें और इसी का पाउडर 1-2 ग्राम सुबह-शाम चटाएं।
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अरणी के बारे में डॉ. धर्मपाल राणा जी का अनुभव
लिंक:http://singleherbs.blogspot.in/2010/07/clerodendrum-phlomidis.html
Clerodendrum phlomidis अग्निमंथ, अरणी
Wednesday, July 21, 2010

मैं इसकॊ निम्नलिखित रोगों मे प्रयोग करता हुँ:-
1. आगन्तुज शोथ में इसके क्वाथ से अवगाहन स्वेद करने से तुरंत लाभ मिलता है।
2. हृदय रोग (कफ़ज) में इसके क्वाथ और शिलाजीत का सेवन बहुत ही उपयोगी है।
3. आमवात और आंत्रिक ज्वर में इसका प्रयोग विषतिन्दुक वटी के साथ करने से फ़ायदा मिलता है।
4. मधुमेह में इसके पत्रस्वरस का प्रयोग किया जाता है।
5. विभिन्न विस्फ़ोट युक्त ज्वरों की अवस्था मे इसके क्वाथ या स्वरस का प्रयोग किया जाता है।

इसका बहुवर्षायु क्षुप होता है जो कि झुण्ड बनाकर बड़ता है, पत्र लट्वाकार और अभिमुख होते है। पुष्प सफ़ेद होते है। इसको वृहद अग्निमंथ के आभाव में प्रयोग किया जाता है। यह लगभग सारे उत्तर भारत मे पाया जाता है ।
इसके गुण और प्रयोग: उष्ण, दीपन, सारक, बल्य, रसायन, शोथहर होता है। कफ़ वात शामक, बल्य, रसायन, शोथहर।
*फैटी लीवर/Fatty Liver कारण एवं निवारण*
छाती के दाँये ओर की पसलियों के नीचे की हड्डी के नीचे और पेट के ऊपरी भाग में लीवर/यकृत नामक अंग होता है। इसी को अंग्रेजी में लीवर कहा जाता है। फैटी लीवर/Fatty Liver से आशय लीवर में चर्बी जमा होने से है। यह समझने वाली बात है कि शरीर में लीवर एक महत्वपूर्ण अंग होता है। यह स्वस्थ अवस्था में हमारे शरीर में तकरीबन ढाई सौ से अधिक प्रकार से फंक्शन करता रहता है। लीवर का आकार बढ जाने अर्थात फैटी लीवर हो जाने से लीवर की कार्यकुशलता अर्थात कार्य/फंक्शन करने की गति कम हो जाती है। परिणामस्वरूप फैटी लीवर/Fatty Liver से अनेक प्रकार की परेशानियां उत्पन्न हो जाती हैं।











*फैटी लीवर/Fatty Liver के लक्षण:*
सबसे दु:खदायी स्थिति यह होती है कि सामान्यत: शुरूआत में फैटी लीवर का पता नहीं चल पाता है। इस कारण रोगी की स्थिति अधिक बिगड़ सकती है। यद्यपि जैसे-जैसे लीवर बढना शुरू होता है, वैसे-वैसे इसके लक्षण प्रकट होने लगते हैं। जिन लोगों का फैटी लीवर/Fatty Liver होता है, उनमें आमतौर पर निम्न लक्षण प्रकट होते देखे जा सकते हैं:-
1. भूख की कमी।
2. पेट दर्द और उबकायी।
3. थकान एवं वजन में कमी।
4. भ्रमावस्था/कंन्फ्यूजन।
5. अन्य अनेक कारण।


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*फैटी लीवर/Fatty Liver का पता कब चलता है?*
आमतौर पर स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं रहने वाले लोगों को 40 की आयु पार करने पर फैटी लीवर का पता चलता है। लेकिन तब तक स्थिति नियंत्रण से बाहर जा चुकी होती है या स्थिति अधिक पीड़ादायक हो चुकी होती है। लीवर को अधिक क्षति हो चुकी होती है। अनेक लोगों को लीवर सिरोसिस/Cirrhosis, पीलिया/Jaundice, हेपैइाईटिस/Hepatitis आदि से पीड़ित होते देखा जा सकता है।

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*फैटी लीवर/Fatty Liver के मुख्य कारण:*
1. शराब का अधिक सेवन करना।
2. लम्बे समय तक अपच और कब्ज।
3. आधुनिक दवाईयों के सेवन का दुष्प्रभाव।
4. रोड-छाप बाजारू तला-भुना-गरिष्ठ भोजन।
5. जंक फूड और डिब्बाबंद भोजन का सेवन।
6. आठ घंटे से अधिक सोने की आदत।
7. अधिक मात्रा में आईरन का सेवन।
8. उच्च कोलेस्ट्रोल तथा डायबिटीज से पीड़ित लोगों को फैटी लीवर का खतरा बढ जाता है।
9. मोटापा: मोटापे के कारण लीवर के फैटी होने का खतरा बढ जाता है।
10. फैट प्रोटीन का उच्च स्तर: शरीर में फैट प्रोटीन का उच्च स्तर भी फैटी लीवर का जनक हो सकता है।
11. अनुवांशिक कारण: जिनके माता-पिता में से किसी एक या दोनों का फैटी लीवर होता है, उनको फैटी लीवर होने का खतरा बढ जाता है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग विवाह करते समय इस बात का ध्यान रखते हैं।
12. रोटी, आलू और कार्बोहाईड्रेट्स की उच्च मात्रा से युक्त भोजन की आदत।
13. लीवर में रक्त की मात्रा अधिक हो जाना।
14. हृदय या फेफड़ों के रोगों से ग्रस्त होना।
15. अन्य विविध कारणों से भी यकृत/लीवर बढ़ जाता है।

*फैटी लीवर/Fatty Liver से बचाव के उपाय:*

1. स्वस्थ, सुपाच्य और ताजा भोजन का सेवन करें।
2. अधिक समय तक भूखे नहीं रहें।
3. संतुलित भोजन करें।
4. भोजन में विटामिन-डी एवं ई तथा ओमेगा 3 फैडी एसिड जैसे पोषक तत्वों को शामिल करें।
5. चीनी का सेवन बहुत जरूरी होने पर ही करें।

*फैटी लीवर/Fatty Liver का आयुर्वेदिक उपचार:*

1. भूई आंवला।
2. मकोय।
3. शरपुंखा।
4. पुनर्नवा।
5. हरसिंगार।
6. गिलोय।
7. अपामार्ग।
8. श्योनाक।
9. बथुआ।
10. कालमेघ।
11. द्रोणपुष्पी।
इत्यादि।

फैटी लीवर/Fatty Liver के उपचार के लिये उक्त दवाईयों में से एक या एकाधिक की मात्रा और खुराक का निर्धारण रोग तथा रोगी की स्थिति के अनुसार योग्य डॉक्टर द्वारा ही किया जा सकता है।
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, आॅल लाईन स्वास्थ्य रक्षक सखा। परामर्श समय: सुबह 10 से सायं 10 बजे के बीच। वाट्सएप नम्बर: 8-5619-5-5619, 20.10.2017

NOTE: यहां पर सभी लेखों में लिखी गयी दवाईयों का विवरण जनहित में स्वास्थ्य और बीमारियों के बारे में जागरूकता के लिए लिखा गया है। पाठक कृपया स्वयं अपना इलाज करने का खतरा मोल नहीं लें। कृपया अपने चिकित्सक के परामर्श के बिना, सुझाई गयी (किसी भी प्रकार की) दवा का सेवन नहीं करें। [Please Do not take any (kind of) suggested medicine, without consulting your Doctor.] हमारे 95 फीसदी रोगियों को व्यक्तिगत रूप से हम से आकर मिलने की जरूरत नहीं पड़ती। यद्यपि रोगियों की संख्या अधिक होने के कारण, आपको इन्तजार करना पड़ सकता है। कृपया धैर्यपूर्वक सहयोग करें।
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विरह वेदना का उपचार करवाने में संकोच क्यों?

''यदि हम उदर वेदना, सिरो वेदना, दंत वेदना, कर्ण वेदना आदि का उपचार करवाने में संकोच नहीं करते तो फिर विरह वेदना का उपचार करवाने में ही संकोच क्यों?'' डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' जी के उक्त शब्दों ने मुझे अन्दर तक झकझोर दिया।

मेरी बहिन को उसके पति के सहकर्मी से प्यार हो गया था। इतना प्यार कि वह उस प्रेमी के बिना जीने की कल्पना ही नहीं करना चाहती थी। पता चलने पर उसके पति ने उसकी खूब मारपीट की, भलाबुरा कहा। हम सभी भाईयों ने और हमारे माता-पिताजी ने भी उसे खूब भला-बुरा कहा और तरह-तरह से समझाया भी, लेकिन उस पर इसका कोई असर नहीं हुआ।

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हमारे जीजाजी बहुत सज्जन इंसान होने के कारण, हमारी बहिन को माफ करने को सहमत हो गये। लेकिन वह अपने प्रेमी को भूलने और छोड़ने को तैयार ही नहीं हो रही थी। एक 2 साल का बेटा होने और जगहंसाई के डर से हम सभी अन्दर ही अन्दर घुट रहे थे। मगर हमारी बहिन किसी न किसी तरह से मौका निकालकर अपने प्रेमी से मिलने का अवसर निकाल ही लेती थी। जिसके कारण हमारे जीजाजी और बहिन में आये दिन घृहक्लेश रहने लगा। कुछ लोगों ने जादू-टोने, तंत्र-मंत्र आदि की सलाह दी। हमने सब-कुछ करवाकर देख लिया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। 

थक-हारकर इंटरनेट पर इसका कोई समाधान तलाशना शुरू किया। तो डॉ. निरंकुश जी की निम्न पंक्ति पढने को मिली:-

''*विरह वेदना/प्रेम विछोह अर्थात् जुदाई और वियोग में रोते/तड़फते रहने वाले प्रेमियों की मनोदशा का उपचार किया जाता है।*''

मैंने तुरंत डॉ. साहब को काल किया और सारी बात बतायी और पूछा कि क्या मेरी बहिन का कोई इलाज सम्भव है? इस पर डॉ. साहब ने कहा कि-

''यदि हम उदर वेदना, सिर वेदना, दंत वेदना, कर्ण वेदना आदि का उपचार करवाने में संकोच नहीं करते तो फिर विरह वेदना का उपचार करवाने में ही संकोच क्यों?'' डॉ. साहब ने कहा कि विरह वेदना का होम्योपैथी में सफलतापूर्वक उपचार सम्भव है!

इसके बाद मैंने अपनी बहिन की डॉ. साहब से मोबाईल पर बात करवाई। एक महिने के उपचार के बाद मेरी बहिन की स्थिति बदलने लग गयी। तीन महिने में वह अपने प्रेमी के वियोग से मुक्त हो चुकी है और अब वह अपने पति के साथ पूरी तरह से खुश है। इसके लिये मैं और हमारे सभी परिवारजन डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' जी के दिल से अहसानमंद और ऋिणी हैं।-विनोद कुमार बदला हुआ नाम, इन्दौर, मध्य प्रदेश।

डॉक्टर टिप्पणी: 'विरह वेदना का उपचार सम्भव है।' यह बात बहुत से लोगों को अटपटी सी सग सकती है, लेकिन सच में विरह वेदना उपचार योग्य है। समस्या यह है कि हम में अधिकांश परम्परागत ज्ञान और सोच से हटकर सोचने के लिये सहमत ही नहीं होते हैं। होम्योपैथी में इस प्रकार के चमत्कारिक परिणाम सामने आने पर लोगों का आश्चर्य होता है।*-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, आॅल लाईन स्वास्थ्य रक्षक सखा। परामर्श समय: सुबह 10 से सायं 10 बजे के बीच। वाट्सएप नम्बर: 85-619-55-619, 19.10.2017*

NOTE: यहां पर सभी लेखों में लिखी गयी दवाईयों का विवरण जनहित में स्वास्थ्य और बीमारियों के बारे में जागरूकता के लिए लिखा गया है। पाठक कृपया स्वयं अपना इलाज करने का खतरा मोल नहीं लें। कृपया अपने चिकित्सक के परामर्श के बिना, सुझाई गयी (किसी भी प्रकार की) दवा का सेवन नहीं करें। [Please Do not take any (kind of) suggested medicine, without consulting your Doctor.] हमारे 95 फीसदी रोगियों को व्यक्तिगत रूप से हम से आकर मिलने की जरूरत नहीं पड़ती। यद्यपि रोगियों की संख्या अधिक होने के कारण, आपको इन्तजार करना पड़ सकता है। कृपया धैर्यपूर्वक सहयोग करें।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
आॅन लाईन स्वास्थ्य रक्षक सखा
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--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!

--->--->श्रीमती जानकी पुरुषोत्तम मीणा जिनका 08 अप्रेल, 2012 को असमय निधन हो गया!
सभी के स्वस्थ एवं सुदीर्घ जीवन की कामना के साथ-मेरे प्यारे और दुलारे तीन बच्चों की ममतामयी अद्वितीय माँ (मम्मी) जो दुखियों, जरूतमंदों और मूक जानवरों तक पर निश्छल प्यार लुटाने वाली एवं अति सामान्य जीवन जीने की आदी महिला थी! वह पाक कला में निपुण, उदार हृदया मितव्ययी गृहणी थी! मेरी ऐसी स्वर्गीय पत्नी "जानकी मीणा" की कभी न भुलाई जा सकने वाली असंख्य हृदयस्पर्शी यादों को चिरस्थायी बनाये रखते हुए इस ब्लॉग को आज दि. 08.08.12 को फिर से पाठकों के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

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